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सोमवार, 25 सितंबर 2017

ब्रह्मोत्सव की स्मृतियाँ

तिरुमला स्थित भगवान वेंकटेश्वर के वार्षिक ब्रह्मोत्सव -2017 की अविस्मरणीय झाँकी
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ब्रह्मोत्सव का पहला दिन
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22 सितंबर, 2017। आज सुबह मैं तिरुपति पहुँचा। स्टेशन से लगे हुए विशाल भवन 'विष्णु निवासं' में ठहराया गया। शाम को सामान सहित कार से तिरुमला ले आया गया और एसपीटी कॉटेज में टिका दिया गया। यात्रा सुखमय रही। खाली पेट रहा और अवोमिन ले ली थी; यों उल्टी नहीं हुई - जिसके डर से कई साल से यहाँ आना टल रहा था। इस बार भगवान का बुलावा आया तो मैंने सोचा कि भविष्य का किसे पता है इसलिए चलता हूँ। फिर भी कल तक मन टालमटोल कर रहा था कि तबीयत बिगड़ जाए तो क्या होगा। पर भगवान की इच्छा और आज्ञा मानकर आ गया तथा हर प्रकार स्वस्थ रहा।

कहा जाता है कि तिरुपति (श्रीपति) भगवान कृष्ण जी का ऐश्वर्य रूप है और  विट्ठल बाल रूप। भगवान तिरुपति ने ब्रह्मा जी को आश्वासन दे रखा है कि कलियुग के अंत तक यहाँ निवास करेंगे। यह आश्वासन मिलने पर ब्रह्मा जी ने शारदीय नवरात्र में उत्सव मनाया था, इसीलिए इसे ब्रह्मोत्सव कहते हैं।

इस पौराणिक मान्यता के अलावा, वैसे सन 977 ईस्वी से इस पर्व के यहाँ निरंतर मनाए जाने के प्रमाण शिलालेखों में मिलते हैं।

आज इस वर्ष का ब्रह्मोत्सव आरंभ हुआ। मुझे इसके हिंदी में सजीव प्रसारण का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज भगवान के सेनापति विश्वक्सेन की शोभायात्रा निकली जो संपूर्ण व्यवस्था के निरीक्षण और समस्त जगत को आमंत्रित करने का प्रतीक है। इसके बाद यज्ञशाला में मिट्टी का संग्रह करके नवग्रहों के प्रतीक नौ प्रकार के धान्य (नवधान्य) का बीजारोपण किया गया जिसका प्रसारण नहीं किया जाता है। आज के इस पूरे विधिविधान को सेनाधिपति उत्सव और अंकुरारोपण (अंकुरार्पण) कहा जाता है।

उल्लेखनीय है कि 108 वैष्णव दिव्य क्षेत्रों में से केवल इस एक अर्थात श्रीवेंकटेश्वर मंदिर - तिरुमला- में ही वैखानस आगम के अनुसार अर्चना आदि का विधान है; जबकि अन्यत्र पंचरात्र आगम का पालन होता है।

कल अर्थात दूसरे दिन 3 बजे ध्वजारोहण होगा। उसके सजीव प्रसारण में भी सम्मिलित रहने का सौभाग्य प्रभु ने प्रदान किया है। अगले दिन हैदराबाद प्रस्थान...

!!ॐ नमो वेंकटेशाय!!
ब्रह्मोत्सव का दूसरा दिन
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24 सितंबर, 2017 । आज मैं हैदराबाद  लौट आया हूँ।
कल अर्थात सितंबर, 2017 (शनिवार) को मुझे 3 बजे से श्री वेंकटेश्वर भक्ति चैनल के तिरुमला स्थित नियंत्रण कक्ष (कैंप) में उपस्थित रहना था - ब्रह्मोत्सव के दूसरे दिन के हिंदी में सजीव प्रसारण के वास्ते। ... और किस्सा यूँ हुआ कि मेरे आग्रह पर दोपहर 12 बजे वाले स्लॉट में मुझे भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन हेतु 'विशेषों' में पंक्तिबद्ध कर दिया गया; समय पर कैंप में आ उपस्थित होने के कठोर निर्देश के साथ।

भारी भीड़ के बावजूद अच्छे से दर्शन हुए  - 2.30 बजे। ...और मैं बगटुट दौड़ा। लड्डू प्रसाद भी नहीं ले सका। अभी तक अपराधबोध है; पर मुझे दिए गए समय का पालन करने की सदा से सनक रही है। भीड़ के रेले के साथ बहता हुआ बाहर आया तो जमकर वर्षा हो रही थी। कइयों के सतर्क करने पर भी मैं भीगता हुआ भाग लिया। ...

अब सुनिए कि मुझे बचपन से ही रास्ते याद नहीं रहते। बहुत बार अपने गाँव और ननिहाल से लेकर पहाड़ पर, समुद्र किनारे और महानगर तक में खोया हूँ! सो, भागा तो दिशा भूल गया। जहाँ 5 मिनट में पहुँच सकता था, भटकता हुआ आधे घंटे में पहुँचा। पूरी तरह तरबतर। सराबोर। पर संतोष यह कि समय पर पहुँच गया।
वर्षा के कारण प्रसारण में विलंब हुआ - वह अलग बात है।

संस्कृत विद्यापीठ के युवा अध्यापक केशव मिश्र ने श्री वेंकटेश्वर के वार्षिक ब्रह्मोत्सव के दूसरे दिन के कार्यक्रम के सजीव प्रसारण के हिंदी में विवरण देना आरंभ किया और आगे मैंने सूत्र थाम लिया। बारी-बारी से दोनों अपनी बात कहते रहे। ...

दूसरे दिन का पहला कार्यक्रम था - स्वर्ण तिरुच्ची उत्सव। यह कार्यक्रम ब्रह्मोत्सवम में 2015 से ही सम्मिलित हुआ है। इसके अंतर्गत श्री वेंकटेश्वर भगवान की उत्सव मूर्ति ( भगवान मलयप्पा) की दोनों देवियों (आह्लादिनी शक्ति श्रीदेवी तथा प्रकृति शक्ति भूदेवी) समेत जगमगाते सोने के रथ पर विराजित करके चारों वीथियों में भव्य शोभायात्रा का किया गया।  स्वर्ण रथ में 30 फुट की भव्य स्वर्णिम पीठ पर स्थापित भगवान की छवि सचमुच नयनाभिराम ही नहीं, दृष्टि को धन्य करने वाली थी। इस सुदृढ रथ को अनेक भक्त अपने कंधों पर ढोकर जीवन की कृतार्थता पा रहे थे। साथ ही निरंतर चल रहा था - वैदिक ऋचाओं का उच्चार, भक्तिपूर्ण स्तोत्रों का वाचन और गोविंदा-गोविंदा का आनंदघोष।
मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करता रथ जब अलग अलग वीथियों की अलग अलग दिशाओं में पहुँचता; तो सब ठहर जाते। अर्चकगण हर दिशा में विधिवत कलश से पवित्र जल छिड़कते हुए वैखानस आगम के अनुसार मंत्रों के साथ पूजा करते; और तब फिर रथ को आगे बढ़ाया जाता। लगभग 1 घंटे से अधिक यह स्वर्ण रथ उत्सव चला। वर्षा भी चलती रही। कभी रिमझिम तो कभी झमाझम। इसी बीच रथयात्रा सोत्साह संपन्न हुई।

इसके बाद लगभग सवा पाँच बजे सायं से आरंभ हुआ ध्वजारोहण का सजीव प्रसारण।

ब्रह्मोत्सव के अंतर्गत प्रतिदिन भगवान बालाजी अलग-अलग वाहन पर आरूढ़ होकर तिरुमला की वीथियों में भ्रमण करते हैं। इसके पूर्व इस उत्सव के विधिवत श्रीगणेश के एक और विधान के रूप में गरुड़-ध्वजा फहराई जाती है। गरुड़ भगवान के वाहन तो हैं ही, उनकी पताका पर भी विराजते हैं। निश्चित मुहूर्त में एक शुद्ध वस्त्र को हल्दी में डुबाकर रँगा जाता है। इस पीत वस्त्र को धूप में सुखाकर इस पर गरुड़ और भगवान कृष्ण की आकृतियाँ रेखांकित की जाती हैं। ऋचाओं, सूक्तों और स्तोत्रों के पाठ के साथ अर्चक इस ध्वजा को पुष्पमालाओं के साथ लपेटकर ध्वजस्तंभ पर फहराते हैं। इस अवसर पर आठों दिशाओं के देवताओं सहित समस्त ब्रह्मांड को ब्रह्मोत्सव के दुर्लभ आयोजन में आमंत्रित किया जाता है और संपूर्ण सृष्टि की मंगलकामना की जाती है। यह समस्त उत्सव अत्यंत अनुशासनपूर्वक  समग्र तन्मयता के बीच संपन्न हुआ।  कमेंटेटर के रूप में इस आनंदोत्सव का साक्षी बनकर धन्यता और प्रभुकृपा की अनुभूति हुई।
!!ॐ नमो वेंकटेशाय!!

 श्री वेंकटेश्वर ब्रह्मोत्सव, तिरुमला, तिरुपति : 2017 : आरंभिक 2 दिन

https://photos.app.goo.gl/KSvr7vdQcAQ5dNiy1

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

''दीवार में आले'' का लोकार्पण वक्तव्य : ऋषभदेव शर्मा


23 जुलाई 2017 को हिंदी भवन, नई दिल्ली के सभागार में 
कवि श्री रामकिशोर उपाध्याय के कविता संग्रह ''दीवार में आले'' के 
लोकार्पण के अवसर पर 
मुख्य वक्ता डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा दिया गया बीज वक्तव्य.

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

बुधवार, 2 अगस्त 2017

(भूमिका) वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी



राजौरिया, शिवकुमार (2017). वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी. भारत, नई दिल्ली : अद्वैत प्रकाशन.
आईएसबीएन : 978-93-82554-87-5. रु. 595/- 296 पृष्ठ. सजिल्द 

भूमिका 

विभिन्न हाशियाकृत समुदायों के मानवाधिकारों की चिंता के बीच इधर कुछ दशकों से विश्व भर में उत्तर आधुनिक संदर्भ में वृद्धों की समस्याएँ एकदम नए रूप में सामने आई हैं. परिवार की पहले जैसी संकल्पना तो अब भारत तक में नहीं बची है. यों, वृद्धों को अनुत्पादक (?) होते ही घर और समाज दोनों में ही हाशिये में फेंकना आम बात हो गई है. जबकि अब तक हाशिये में रखे गए समुदाय अब केंद्र पर बाकायदा काबिज़ हो रहे हैं, वृद्धों का हाशियाकरण किसी न किसी बहाने निरंतर जारी है. 58-60 साल की उम्र तक केंद्रीय भूमिका में रहने के बाद जब आदमी को वरिष्ठ नागरिक और सेवानिवृत्त होने के तमगों के साथ परिधि पर बाँध दिया जाता है तो शारीरिक समस्याओं से अधिक मानसिक समस्याएँ अपने जटिल रूपाकार में उस पर हमला करती हैं. इस अनुभवी समुदाय को आगे भी समाज के लिए उपयोगी बनाए रखने की चिंता, बदले हुए परिवेश में इसके मानवाधिकारों की स्वीकृति और इसके पुनर्वास के प्रश्न से ही वृद्धावस्था विमर्श की शुरूआत होती है. 

हिंदी कहानी में यों तो आरंभ से ही वृद्ध स्त्री-पुरुष पात्रों और उनकी समस्याओं को दिखाया जाता रहा है तथा वृद्धावस्था से जुडी असहाय मनोदैहिक दशाओं को काफी कारुणिक ढंग से उभारने वाली भी काफी कहानियाँ मिल जाती हैं. लेकिन ग्लोबल फिनोमिना के रूप में वृद्धावस्था विमर्श का विशेष और सचेत उभार पिछले लगभग बीस वर्षों की कहानी की निजी उपलब्धि है. डॉ. शिव कुमार राजौरिया ने इस दिशा में अत्यंत परिश्रमपूर्वक अनुसंधान करके अपने इस ग्रंथ ‘’वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी’’ का प्रणयन किया है. इस विषय के प्रति उनकी गहरी अनुरक्ति और आसक्ति ने उन्हें स्वयं भी वृद्धों की जीवन दशा, मानसिकता और जिजीविषा पर केंद्रित कथा लेखन के लिए प्रेरित किया. अनुसंधान के दौरान उन्होंने ऐसी बीसियों कहानियाँ लिख कर वृद्धावस्था विमर्श को अपने लेखकीय सरोकार के रूप में रेखांकित करने में सफलता पाई है. 

यह ग्रंथ इस दृष्टि से अग्रणी अध्ययन माना जाएगा कि लेखक ने हिंदी में वृद्धावस्था विमर्श की विधिवत सैद्धांतिकी खड़ी की है. वृद्धों की दशा और समस्याओं को लेकर कुछेक छिटपुट पुस्तकों और ‘वागर्थ’ के विशेषांक के अलावा सुसंगठित रूप में इस विमर्श को पुष्ट करने वाली सामग्री के तौर पर उन्होंने सिमोन द बुआ की महाकाय कृति ‘ओल्ड एज’ को आधारभूत ग्रंथ के रूप में ग्रहण किया तथा उसके आलोक में वृद्धावस्था विमर्श के अपने आयाम निधारित किए. वृद्ध मनोविज्ञान और वृद्धावस्था विमर्श की दृष्टि से आगे अनुसंधान करने वालों के लिए इसीलिए यह ग्रंथ अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा. 

डॉ. शिव कुमार राजौरिया ने आरंभिक कहानी से लेकर आज की कहानी तक से अपनी अध्येय सामग्री चुनी है और इस ग्रंथ को प्रामाणिकता प्रदान करने में सफलता पाई है. शरीर का क्षय कैसे मानसिक परिवर्तन का कारण बनता है, कैसे वरिष्ठ नागरिकों के प्रति घर और समाज का नजरिया बदलता है, कैसे बदलते मूल्यों के संदर्भ में अपने जीवनमूल्यों से बँधा वृद्ध व्यक्ति अप्रासंगिक होता जाता है, कैसे बढती हुई आयु के साथ आत्मनिर्भरता घट जाती है और परनिर्भरता कैसे कुंठा में बदलती है, कैसे असुरक्षा, आशंका, अनिश्चितता और अकेलेपन के भाव सारे व्यवहार को असामान्य बना देते हैं, कैसे स्मृतियों की जुगाली करता मनुष्य मृत्यु की ध्रुवता तथा जीने की इच्छा के तुमुल संघर्ष को दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर झेलता है, युवा जगत द्वारा वृद्ध जगत की उपेक्षा कैसी समस्याओं को जन्म देती हैं और कैसे वृद्धों को सम्मानजनक जीवन का अधिकार प्राप्त हो सकता है – यह ग्रंथ हिंदी की वृद्धावस्था संदर्भित कहानियों को इन तमाम सवालों की कसौटी पर रखकर परखता है. इस प्रकार यह ग्रंथ वृद्धावस्था विमर्श के साहित्यिक समीक्षाधारों का निर्माण भी करता है और उनके अनुप्रयोग की प्रविधि भी दर्शाता है.

विश्वास किया जाना चाहिए कि वृद्धावस्था विमर्श के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, साहित्यिक और समाजभाषावैज्ञानिक आयामों को उद्घाटित करने वाले इस अंतरविद्यावर्ती अध्ययन का हिंदी जगत में व्यापक स्वागत होगा. इसके प्रकाशन के अवसर पर मैं लेखक और प्रकाशक को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ. 

इति विदा पुनर्मिलनाय ...

-ऋषभ देव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद
आवास : 208 – ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स 
गणेश नगर, रामंतापुर, 
हैदराबाद -500013 (तेलंगाना) 
4 मई, 2017
हैदराबाद : 4 जुलाई,2017 : (बाएँ से) डॉ. शिवकुमार राजौरिया, डॉ. ऋषभ देव शर्मा एवं वुल्ली कृष्णा राव