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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

जनसंघर्ष की पक्षधर कहानियाँ




भारतीय साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन ने साहित्य की कसौटी को बदलने का काम किया तथा सामान्य जन के संघर्ष को विशिष्ट अभिजन की गाथाओं से अधिक महत्व दिया. खास तौर पर कहानीकारों ने इस दिशा में विशिष्ट भूमिका निभाई और साहित्य को आम आदमी के सुख-दुःख के साथ जोड़ा बाहर नहीं बल्कि उसकी मुक्ति का माध्यम भी बनाया. ओड़िया कहानी भी इसका अपवाद नहीं है. ओड़िया कहानीकारों ने आरंभ से ही उत्कल जनजीवन के प्रामाणिक चित्रण पर बल दिया. और किसान-मजदूर को अपनी विषय वस्तु के केंद्र में रखा. 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ, ओड़िशा की स्थापना के बाद इसे एक सुनिश्चित जुझारू चरित्र प्राप्त हुआ. प्रांतीयता और भारतीयता के बीच बड़ी समझदारी के साथ प्रगतिशील ओड़िया कहानीकारों ने सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनैतिक सरोकारों का जनपक्षीय स्वरूप अपनी कहानियों के माध्यम से खड़ा किया.

कथ्य और शिल्प की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और वैविध्यपूर्ण कहानी संसार में से चुनकर डॉ. अरुण होता ने 25 प्रतिनिधि रचनाओं का हिंदी अनुवाद अपनी कृति ‘ओड़िया की प्रगतिशील कहानियाँ’ (2013) के माध्यम से प्रस्तुत किया है. डॉ. अरुण होता (1965) पूर्वोत्तर भारत में हिंदी अध्ययन-अध्यापन-अनुसंधान से जुड़े हुए चर्चित लेखक व समीक्षक है. वे अपने अनुवादों और समीक्षात्मक आलेखों के लिए हिंदी जगत में सुपरिचित हैं. यह संग्रह उन्होंने अत्यंत श्रमपूर्वक तथा प्रतिबद्ध दृष्टि से अनूदित और संपादित किया है. कहानियों के आरंभ में एक संक्षिप्त आलेख में उन्होंने प्रगतिशील ओड़िया कहानी की संमृद्ध परंपरा का सुविचारित आकलन प्रस्तुत किया है. इन कहानियों के बारे में यह कहना सच को दुहराना ही है कि इनमें शोषण के विरुद्ध बहुआयामी संघर्ष को सर्वहारा के प्रति सहानुभूति के साथ इस तरह चित्रित किया गया है कि एक तरह तो शोषक शक्तियों का जन विरोधी चरित्र नंगा होता है तथा दूसरी ओर कहानीकारों की जनपक्षधरता उभरकर सामने आती है. 

इसमें संदेह नहीं कि अरुण होता द्वारा प्रस्तुत यह अनुवाद आधुनिक भारतीय साहित्य के समशील चरित्र को ही रेखांकित करता है. 

· ओड़िया की प्रगतिशील कहानियाँ/ संकलन एवं अनुवाद - अरुण होता/ 2013/ क्लासिक पब्लिशिंग कंपनी, 28 शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, कर्मपुरा, नई दिल्ली – 110 015/ पृष्ठ – 240/ मूल्य – रु. 600







सूरदास प्रभु राधा माधव ब्रज बिहार नित नई नई


वैष्णव धर्म के मूल में एक बड़ी समन्वय चेष्टा निहित है. इसके अंतर्गत वैदिक विष्णु, द्रविड़ मूल के नारायण और वृष्णि जनजाति के देवता वासुदेव कृष्ण का समाहार हुआ तथा भक्ति को लोकधर्म के रूप में स्वीकृति प्राप्त हुई. भक्ति और निष्ठा भारतीयों की जीवन शैली के ऐसे मूल्यों के रूप में उभरीं जिन्होंने वैविध्यपूर्ण समाज को एक सूत्र में बाँधने का बड़ा काम किया. यह वैष्णव भक्ति ही मध्यकाल में जागरण और आंदोलन के रूप में पूरे भारत में छोटे मोटे नाम भेद के साथ प्रचारित-प्रसारित हुई. विष्णु के अवतारों में विशेष रूप से राम और कृष्ण परात्पर ब्रह्म के रूप में इस भक्ति आंदोलन के केंद्र में रहे – निर्गुण भी सगुण भी. राम का लोक रक्षक और कृष्ण का लोक रंजक रूप भक्तों को बहुत भाया. इन रूपों का लीला गायन जिन भक्त कवियों ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक किया उनमें सूरदास अपनी तरह के अनोखे कवि हैं.

सूरदास 15वीं-16वीं शताब्दी में हुए. यह ऐसा समय था जब नाथ पंथियों के प्रभाव से समाज में लोक विमुखता और आत्मकेंद्रिकता जड़ें जमा रही थीं. इस लोक विरोधी प्रवृत्ति को निशाने पर रखकर सूरदास ने गोपियों के कृष्ण प्रेम के सहारे लोक सम्मत प्रेमाभक्ति का आदर्श समाज के सामने रखा. प्रेमाभक्ति का यह आदर्श सूरदास को महाप्रभु वल्लभाचार्य से प्राप्त हुआ था. कहा जाता है कि सूरदास ने जब आगरा और मथुरा के बीच यमुना तट पर स्थित गउघाट पर महाप्रभु वल्लभाचार्य को विनय के दो पद सुनाए तो महाप्रभु ने उन्हें हरी लीला वर्णन करने का आदेश दिया. सूर के असमर्थता जताने पर उन्होंने उन्हें भागवत का दिव्य ज्ञान दिया. इस ज्ञान बीज का अपनी कल्पना शक्ति से विस्तार करते हुए सूर ने कृष्ण की बाल लीलाओं और प्रेम लीलाओं का वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के अनुरूप भक्तिपगा मधुर वर्णन किया. यहाँ यह याद रखना होगा कि वल्लभाचार्य को दार्शनिक परंपरा में शुद्धाद्वैतवाद और भक्ति परंपरा में रागानुगा, प्रेमा, माधुर्य भक्ति की स्थापना करने का श्रेया है. उनकी भक्ति पद्धति को पुष्टिमार्ग के नाम से जाना जाता है. सूरदास को ‘पुष्टिमार्ग का जहाज’ कहा जाता है जो इस तथ्य का द्योतक है कि शुद्धाद्वैत दर्शन को रसपूर्ण काव्य के रूप में ढालने में सूरदास अद्वितीय है. प्रायः विचार या दर्शन कविता का शत्रु होता है, अतः किसी दर्शन को कालजयी काव्य के रूप में लोकग्राह्य बनाकर प्रस्तुत करना बहुत बड़ी चुनौती का काम है. सूर ने इस चुनौती को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि यह दिखा दिया कि कोई रससिद्ध कवि किसी दर्शन को रचा पचाकर किस प्रकार सहज संप्रेषणीय काव्य की रचना कर सकता है.

उल्लेखनीय है कि पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य के चार और उनके पुत्र विट्ठलनाथ के चार प्रधान शिष्यों को अष्टछाप के नाम से जाना जाता है. अष्टछाप में सूरदास के अलावा कुम्भनदास, कृष्णदास, परमानंद दास, गोविन्द दास, छीतस्वामी, नंददास और चतुर्भुज दास जैसे उत्कृष्ट कवि कीर्तनकार सम्मिलत थे जो इस संप्रदाय के इष्ट देव श्रीनाथ जी की सखा भाव से प्रेमाभक्ति में अनुरक्त थे. इन्हें अष्टसखा भी कहा जाता है. इनमें से सूरदास ने हजारों पदों में कृष्ण लीला का गायन किया जिसे पुष्टिमार्ग ने शास्त्र के रूप में मान्यता प्रदान की. डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा ने लिखा है कि सूरदास के पदों द्वारा पुष्टिमार्ग का जितना विशद परिचय होता है उतना किसी अन्य स्रोत से संभव नहीं है. वे कहते हैं कि आश्चर्य यह है कि सूरदास ने प्रत्यक्षतः पुष्टिमार्गीय भक्ति पद्धति पर कुछ भी नहीं लिखा, यहाँ तक कि उन्होंने गुरु की प्रशंसा में भी पद रचना नहीं की. इसके बावजूद उनके काव्य में पुष्टिमार्ग की सभी मान्यताओं का कृष्ण लीला के माध्यम से सहज समावेश आज भी भक्तों और सहृदयों को मोहित और चमत्कृत करता है.

वल्लभाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद को निरस्त करते हुए शुद्धात्वैदवाद का प्रवर्तन किया. इस सिद्धांत में ब्रह्म को माया संबंध से रहित अर्थात शुद्ध माना गया है. माया रहित ब्रह्म ही वह अद्वैत तत्व है, सारा जगत जिसकी लीला का विकास है. उन्होंने अपने दर्शन का आधार प्रमाण चतुष्टय को बनाया जिसमें वेद (उपनिषद सहित), गीता, ब्रह्म सूत्र और भागवत सम्मिलित हैं. वल्लभाचार्य ने ब्रह्म को सत्-चित-आनंद रूप माना, जीव को सत्-चित रूप तथा जगत को सत् रूप. वे जगत को माया नहीं मानते बल्कि ब्रह्म के सत् अंश का प्रकट रूप मानते हुए उसे भी ब्रह्म ही कहते हैं. जीव भी उनके मतानुसार ब्रह्म का ही रूप है – बस आनंद की कमी है. इस आनंद को पाते ही वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है. आनंद की उपलब्धि परम प्रेमरूपा भक्ति द्वारा संभव है और भक्ति की प्राप्ति स्वयं ब्रह्म के अनुग्रह से ही होती है. यह अनुग्रह ही पोषण अथवा पुष्टि है – पोषणम् तदनुग्रहे.


कृष्ण को वल्लभ ने परब्रह्म, ईश्वर या परमात्मा माना. वे सविशेष हैं पर निर्विशेष भी हैं; सगुण हैं पर निर्गुण भी हैं. अणु हैं पर महान भी हैं. चल हैं पर अचल भी हैं. गम्य हैं पर अगम्य भी हैं. वे विरुद्ध गुणों के आश्रय हैं. उनके सभी गुण उनसे स्वभावतः अभिन्न हैं – वे उनकी शक्ति या माया नहीं हैं. आचार्य वल्लभ ने ब्रह्म के तीन रूप माने हैं – परब्रह्म, अंतर्यामी और अक्षरब्रह्म. इनमें अक्षरब्रह्म को अनेक जीवन और जगत का उसकी प्रकार स्रोत माना गया है जैसे अग्नि अनेक चिंगारियों का स्रोत है. इस प्रकार सब कुछ को विशुद्ध ब्रह्म का ही लीला विलास मानने वाले इस मत में परब्रह्म के अनुग्रह पर विशेष बल दिया गया है. ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग को कठिन मानते हुए वल्लभ ने सर्वसुलभ भक्ति के रूप में पुष्टिमार्ग की शिक्षा दी.

महाप्रभु वल्लभाचार्य मानते हैं कि जीव तीन प्रकार के हैं. जो जीव निरुद्धेश्य जीवन बिताते हैं और कभी ईश्वर का चिंतन नहीं करते वे प्रवाह जीव हैं. जो वेद विहित मार्ग से ईश्वर की पूजा करते हैं वे मर्यादा जीव हैं. जिन जीवों पर ईश्वर कृपा करता है, अपनी शरण में लेता है और जो ईश्वर से अनन्य प्रेम करते हैं वे पुष्टि जीव हैं. इनकी भक्ति में ईश्वर प्रेम ही सारे आध्यात्मिक कार्यकलापों का सार और लक्ष्य है. इस भक्ति में भगवान से अमित प्रेम करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं किया जाता. भगवान के द्वारा भक्त में स्थापित की जाने वाली और भक्त का सर्वस्व बन जाने वाली इस भक्ति को शुद्धपुष्टि भक्ति कहा गया है.

शुद्धपुष्टि भक्ति के उदाहरण के रूप में गोपियों की भक्ति उल्लेखनीय है.  उनके लिए योग मार्ग से लेकर सायुज्य मुक्ति तक भी त्याज्य है. उनके लिए तो भगवान की रासलीला में भाग लेना ही परम मुक्ति है. पुष्टिमार्ग में परब्रह्म कृष्ण रस, आनंद और सुंदर हैं. वे सभी रसों को प्रकाशित करते हैं. उनमें भी शृंगार का विशेष स्थान है. अपने भक्तों के संबंध में कृष्ण संयोग और विप्रलम्ब दोनों की अभिव्यक्ति करते हैं. इन्हीं पर ध्यान करना पुष्टिमार्ग का लक्ष्य है. आचार्य वल्लभ ने बाल कृष्ण और उनकी सखी राधा की उपासना का विधान बनाया क्योंकि रासलीला भगवान के इसी रूप में विशेष है. यही कारण है कि सूरदास ने अनेकानेक पदों में तन्मयतापूर्वक गोपी भाव से रासलीला, बाललीला, गोकुल वर्णन, यशोधा के वात्सल्य, गोपियों के साथ कृष्ण की अनेक लीलाओं और भ्रमरगीत प्रसंग का विशद वर्णन किया है. जैसा कि डॉ. हाजारी प्रसाद द्विवेदी ने लक्ष्य किया है कि सूरदास ने लीलागान में भी प्रेम को अपना मुख्य कथ्य बनाया. उनका सूरसागर माता के प्रेम, पुत्र के प्रेम, गोप-गोपियों के प्रेम, प्रिय और प्रिया के प्रेम तथा पति और पत्नी के प्रेम जैसी बातों से भरा पड़ा है. यह प्रेम संयोग के समय सोलह आना संयोगमय है और वियोग के समय सोलह आना वियोगमय. ऐसा प्रतीत होता है कि भक्त सूरदास एक निश्चल बालक का हृदय लेकर सारी कृष्ण लीला का वर्णन कर रहे हैं. बालक का यह हृदय अपने प्रिय के क्षणिक वियोग में भी अधीर हो जाता है और क्षणिक मिलन में ही सब कुछ भूलकर किलकारियां मारने लगता है. द्विवेदी जी तो यहाँ तक मानते हैं कि सूर द्वारा निरूपित राधा और कृष्ण का सारा प्रेम व्यापार बालकों का प्रेम व्यापार है. वही चुहल, वही लापरवाही, वही मस्ती, वही मौज. न तो इस प्रेम में कोई पारिवारिक रसबोध ही है और न आमुष्मिक (जिसका फल परलोक में मिले) संबंध ही. सारी लीला साफ़, सीधी और सहज है. जैसा कि उनके गुरु वल्लभाचार्य ने बताया है, लीला का कोई प्रयोजन नहीं है बल्कि लीला ही स्वयं प्रयोजन है. सूरदास इस लीला को ही चरम साध्य मानते हैं.

सूर की राधा भी सरल बालिका ही हैं. उन्हें चंडीदास की राधा की तरह सास-ननद का डर नहीं सताता, उनमें विद्यापति की राधिका जैसी चतुराई नहीं है. है तो बस बाल सुलभ प्रेम की सरलता, निश्चलता, निष्कलुषता. अविगत गति और निर्गुण के देश को जानने के मार्ग को असहज पाकर ही सूर ने पुष्टिमार्ग की सरलता को स्वीकार किया. पुष्टिमार्ग में ‘पूजा’ के स्थान पर ‘सेवा’ पर बल दिया जाता है. व्रजाधिप श्री कृष्ण की निरपेक्ष भाव से सेवा ही पुष्टिमार्ग का सार है. इस मार्ग में यह माना गया है कि लौकिक तथा वैदिक सिद्धि प्रभु कृपा से ही प्राप्त होती है – अनुग्रहेणैव सिद्धिःलौकिकी यत्र वैदिकी. इस मार्ग में लोक और वेद से प्राप्त होने वाले किसी भी फल की कामना नहीं की जाती बल्कि जहाँ केवल ‘तत्सुख’ (प्रभु के सुख) की प्रधानता है. वही शुद्धपुष्टि मार्ग है – सापेक्षता स्वामिसुखे पुष्टिमार्गःस कथ्यते. यही कारण है कि वल्लभाचार्य ने श्रीनाथ की आठ प्रहर की सेवा की विधिवत व्यवस्था मंगला से लेकर शयन तक के लिए की थी. इन सेवाओं के समय अनुराग, खंडिता भाव, दधिमंथन, बालरूप, सख्य भाव, गोचारण, माखन चोरी, ऐश्वर्य माधुरी, क्रीड़ा माधुरी, वेणु माधुरी, विग्रह माधुरी और गोपी भाव से निकुंज लीला के पदों के गायन की व्यवस्था की. सूरदास ने इन सभी लीलाओं के पद रचे हैं और वात्सल्य, प्रेम तथा भक्ति के रूप में संपूर्ण जीवन को काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है. गोपी भाव की चरम उपलब्धि कृष्ण से भेंटने में है. यह भेंट भौतिक या दैहिक भेंट नहीं है बल्कि ऐसी आध्यात्मिक भेंट है जिसमें दैहिक रूप से दूर रहकर भी गोलोक में निरंतर राधा माधव नितनूतन रासलीला रचाते हैं –
राधा माधव भेंट भई.
राधा माधव माधव राधा कीट भृंग गति ह्वै जु गई.
माधव राधा के रंग राँचे राधा माधव रंग रई.
माधव राधा प्रीती निरंतर रसना करि सो कहि न गई.
बिहँसि कह्यौ हम तुम नहिं अंतर यह कहिकै उन ब्रज पठई.
सूरदास प्रभु राधा माधव ब्रज बिहार नित नई नई.  




जीवनेच्छा और लोक लगाव के गीतकार ईश्वर करुण

बिहार में जन्मे ईश्वर करुण (1957) लगभग तीस वर्ष से चेन्नै में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे हैं. उन्होंने गीत और नवगीत की पुनः प्रतिष्ठा के लिए बहुत काम किया है और अपने गीतिकाव्य द्वारा साहित्यिक मंचों व पत्र-पत्रिकाओं में एक सुनिश्चित स्थान प्राप्त किया है. ईश्वर करुण के गीतों में वैयक्तिक अनुभूतियों की गहराई और जीवनराग के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर हुए हैं. वे जनकल्याण में आस्था रखने वाले और वैश्विक मानवता की प्रतिष्ठा चाहने वाले ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने कॉरपोरेट जगत की चकाचौंध के पीछे दौड़ते उत्तरआधुनिक मनुष्य को साधारणत्व के सुख की महिमा बतानी चाही है और कहा है कि जब भी स्वार्थ का व्याकरण घायल करे तो तुम भूखे नंगे फकीरों को चूम लो. गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भरे हुए धूर्त वातावरण की पहचान वे कटाक्ष और व्यंग्य के साथ करते हैं और ध्यान दिलाते हैं कि झूठ और सच, ज्योति और तम तथा दान और धन के बीच खतरनाक गठबंधन के युग में रिश्ते नाते हाथ से छूटते जा रहे हैं. परंतु अपराजेय जीवनेच्छा से भरा कवि इस सब के बीच जब यह कहता है कि ‘चलते चलते चरण जब भी घायल करें साथ के राहगीरों को तुम चूम लो’ तो सहज ही उसकी यह मुद्रा ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ का ही नया पाठ रचती प्रतीत होती है.

सहयात्रियों से प्रेम का यह दर्शन कवि करुण को प्रकृति और मनुष्य दोनों से गहरा लगाव देता है. उनके गीतों में एक खास तरह की सम्बोध्यता है जिसके तहत कवि एक हद तक फकीराना अंदाज में पाठक को सतर्क करता है कि नेह के नगर में विश्वास की धरोहर को लुटने से बचाना तुम्हारी अपनी जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी के तहत रागात्मक संवेदनाओं का संरक्षण और संपोषण भी शामिल है. यह तभी संभव है जब हम लोक से जुड़े रहें. लोक का जुड़ाव करुण के गीतों में कहीं काँटों के सकुचाने, सन्नाटों के सोहर गाने, गुलमोहर और अमलतास द्वारा बंजरों में वसंत लाने के लिए उपासना करने के रूप में तो कहीं प्रेमिका के टेसू और प्रेमी के हरा आंवला बनने के रूप में अभिव्यक्ति प्राप्त करता है. कहने की ज़रूरत नहीं कि इन अभिव्यक्तियों में ताजगी और टटकापन है जो पाठक और श्रोता और बाँधने में समर्थ है. 

ताजगी और टटकापन करुण के गीतों में अभिनव प्रतीक योजना व शब्दों के नए सह-प्रयोगों द्वारा भी आता है. कई बार तो वे शरारतपूर्ण सह-संयोजन से ऐसा कटाक्ष करते हैं कि बस क्या कहिए! प्रेम की यात्रा का चाँद के पार तक जाना, परंपरा विहित प्रयोग हो सकता है, लेकिन जब कवि साँसों को अभियान देने की बात कहता है और अस्तित्व के कल्पना चावला की तरह विलीन होने की भविष्यवाणी करता है तो सारा शब्द व्यापार सही रूप में रमणीय अर्थ का प्रतिपादक बन जाता है. इसी प्रकार चंडीगढ़ और अबोहर के एक साथ प्रेम की हवा में जीने से जुड़ी ध्वनि का राजनैतिक प्रसंगगर्भत्व गीत के फलक को समकालीनता से जोड़ता है. इतना ही नहीं, विहंसते कल की उज्ज्वल संभावना को हर गाँव के मनोहर रामराज्य के स्वप्न के रूप में अंकित करते हुए करुण जी जब यह कहते हैं कि ‘पीढ़ियों के पुण्य को प्रपंच घेर पाए ना / कान्हा की बांसुरी को कंस टेर पाए ना’ – तो वे प्रकारांतर से जन-गण को जागरण और संघर्ष का सन्देश देते प्रतीत होते हैं. इस संदर्भ में कवि का यह मानुष अहं प्रत्येक सवतंत्रचेता नागरिक का प्रण होना चाहिए – ‘’ईश ने जीवन दिया जब,/ ताप मैंने वर लिया तब,/ घर्ष से उत्कर्ष लूंगा,/ मैं न कोई दान लूंगा.’’

ईश्वर करुण की रचनाएँ उनके ‘तूती चुप मत रहना’, ‘पंक्तियों में सिमट गया मन’, ‘एक और दृष्टि’, ‘ईश्वर करुण के लोकप्रिय गीत’ और ‘चुप नहीं है ईश्वर’ शीर्षक संग्रहों में सम्मिलित हैं. यहाँ हम ‘भास्वर भारत’ के पाठकों के लिए उनके कुछ चुनिंदा गीत प्रस्तुत कर रहे हैं.

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया का भाषाचिंतन : काव्यभाषा का संदर्भ *


प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया
डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया 

जन्म तिथि : 2.2.1926  ('अभिनव प्रसंगवश' के विशेषांक में डॉ. कमल सिंह ने सूचना दी है कि डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया की 86वीं वर्षगाँठ 2.2.2012 को मनाई गई)  अथवा 6.11.1927 (प्रमाणपत्रों में).

निधन  : 21.11.2013.
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काव्यभाषा विषयक अध्येय ग्रंथ :
हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ, कैलाश चंद्र भाटिया,
1983, तक्षशिला प्रकाशन
// कुल 22 निबंध//

प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया का भाषाचिंतन : काव्यभाषा का संदर्भ 

काव्यभाषा के अध्ययन का निजी मॉडल

आधार = अनुभूति और अभिव्यक्ति की अन्योन्याश्रयता
              ऐतिहासिक भाषाविज्ञान
              हिंदी भाषा का विकास : वर्तन बिंदु (turning points).
 वैशिष्ट्य :
1. साधारणता की ओर : तद्भवता और देशजता की प्रवृत्ति
2. हर निबंध में सूत्र रूप में निर्भ्रांत लेखकीय स्थापनाएँ  (शब्दों की मितव्ययिता)
3. काव्यभाषा में प्रतीक
4. काव्यभाषा में विशेषण
[1] हिंदी भाषा का विकास : तद्भवता / साधारणता की ओर प्रस्थान

काव्यभाषा के विकास में हिंदी के सभी उप-रूपों ने – खड़ीबोली, ब्रजभाषा, अवधी आदि – पूरा पूरा योग दिया है. काव्यभाषा के रूप में जनभाषा ही समय समय पर अपनाई गई जिसको अधिकांश कवियों ने ‘भाषा’ ही कहा. मध्यदेश के ही नहीं, भारतवर्ष के सभी अंचलों ने इसको आगे बढ़ाया है. (अपनी बात)
रोड़ा कृत राउलवेल :

निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पश्चिमी रूपों की बहुलता के कारण यह रचना पश्चिमी हिंदी का पूर्व रूप है जिस पर अन्य प्रादेशिक रूपों की यत्र तत्र छाया है. (11 वीं शती)

Ø प्राकृत अपभ्रंश काल में व्यंजनों का लोप
हंसगइ (हंसगति), सरउ-जलय (शरद-जलद), रोमराइ (रोमराजि), रयणि (रजनी),

Ø हकार का प्राधान्य
सोह (शोभा), नाह (नाथ), मुह (मुख), पहिरणु (परिधान)

पृथ्वीराज रासो :

13 वीं शती
तत्कालीन ब्रजभाषा (पश्चिमी हिंदी)

चंदायन :
पुरानी अवधी

विद्यापति :

पदावली की भाषा ‘देशी’ ठहरती है = मैथिली = तत्कालीन जनभाषा
विद्यापति की भाषा जन जन की भाषा थी. तब ही तो ‘देसिल बअना’ का प्रयोग किया गया जो उन दिनों लोकजीवन में प्रचलित जनसाधारण की भाषा थी और आज की हिंदी का आदि रूप.

कबीर :

भाषा का अन्नकूट रूप – पूर्वी, खड़ीबोली, पंजाबी, ब्रजभाषा, राजस्थानी
वस्तुतः कबीर द्वारा प्रयुक्त पंचमेली सुधुक्कडीभाषा ही उस समय की जन जन की भाषा थी जिसमें पूर्वी रूपों की अपेक्षा पश्चिमी रूपों, ब्रजभाषा तथा खड़ीबोली की प्रधानता थी.

जायसी : पद्मावत :

ठेठ अवधी = जो बोली लोक में समझी जाती थी. (जनभाषा)
मानस की अवधी से भिन्न
कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार

तुलसी :

मुख्य समस्या = संस्कृत बनाम लोकभाषा = दुशाला बनाम कमली
का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए सांच
काम जु आवे कामरी, का लै करिज कुमांच
सार्थक शब्द चयन :
हनुमान = वानर, मरकट, कपि, बंदर (उत्पात), मारुत सुत, पवन कुमार, पवन सुत (सम्मान), प्रभंजनजाया (पराक्रम की पराकाष्ठा)

सूर :

सूर शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता

किसी भाषा की श्रेष्ठता का मानदंड केवल यह है कि उस भाषा में हम सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों को व्यक्त कर सकें
= सूर और सूर की ब्रजभाषा दोनों समर्थ

देखना क्रिया :

अंग्रेजी = see, behold, look, perceive, watch, take notice

सूर = देखि, विलोक, निरखि, पलक, भुलोन, चितवति, दृष्टि रही, देख्यो, नैन भुलाने, झांकति, दर्शन, झखति आदि + नैन व्यापार पर 250 मुहावरे

v लोकोक्ति, मुहावरे – सैंकडों
ऊधो अब कुछ कहत न आवे /
सिर पर सौति हमारे कुबिजा /
चाम के दाम चलावे.

मीराँ :

तद्भव शब्दावली – 70-75%
सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक शब्दावली

बिहारी :

सूर, नंददास आदि अष्टछाप के कवियों ने जिस ब्रजभाषा को काव्य में चलते रूप में प्रयुक्त किया उसे बिहारी ने सुष्ठु एवं परिमार्जित किया.

गुरु गोबिंद सिंह :

टकसाली ब्रजभाषा + शैलीगत भेद : पंजाबी की विशेष छटा
चंडीचरित्र में पंजाबीपन तो इतना नहीं है पर खड़ीबोली की झलक स्थान स्थान पर अवश्य है जिसे कवि ने ‘रेखती शैली’ नाम दिया.
भाखा सुभ समकर हो घरि हो कृत्ति में
(ऐसी भाषा जो सबके लिए शुभ हो - का प्रयोग मैं अपनी कृति में कर रहा हूँ)
भाषा/ भाखा का आधार तद्भव शब्दावली है – पुरख, कालुख, बरखा, सीख, सिख, पुरुखत कुरुखेत
लोकोक्ति, मुहावरे
युद्ध वर्णन में सूदन, भयानक व रौद्र में भूषण, लालित्य में देव, अनुप्रास में पद्माकर, अभिव्यक्ति में घनानंद की भाषा का सा आनंद.

घनानंद :

लाक्षणिक उक्तियों और अभिव्यंजना कौशल के कारण रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि
सूर ने जिस ब्रजभाषा को काव्य का माध्यम अपनाया उसी को घनानंद ने व्यवस्थित रूप दिया.

तद्भव प्रियता – अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बांक नहीं
लोक शब्दावली – घनानंद के हाथों में आकार साहित्यिक बन गई
§ सल (ज्ञान, मालूम), संजोअे (संध्या का अंतिम भाग), लघेरि (लपेटकर), उजैना (उद्यापन करना), न्यार (चारा), पैछर (पैर की आवाज), झारां (सब के सब), ओटपाय (उपद्रव), टेहुले (शुभावसर के अनुष्ठान), गरैंठी (पूरे भरे पात्र से कुछ कम) आदि

मुहावरे, कहावतें =जीवित भाषा के प्राण
घनानंद सिद्धहस्त उस्ताद हैं.

ब्रज की टकसाली भाषा के समर्थक.

मैथिलीशरण गुप्त :

आपने खड़ीबोली के खड़ेपन, कर्कशता तथा परुषत्व को दूर कर उसे मधुरता और कोमलता प्रदान की.
शुद्ध परिष्कृत काव्योचित  बनाया
बोलचाल की सामान्य शब्दावली के साथ संस्कृत शब्दावली अपनाकर काव्य भाषा को समृद्ध किया.
लड़खड़ाती भाषा मिली थी – सौष्ठवमय बना दिया

सियारामशरण गुप्त :

एक साथ पद्य तथा गद्य में समान अधिकार रखने वाले सियारामशरण जी जैसे साहित्यकार कम हैं.
गद्य साहित्य में भी उनका कवि रूप छलका है.

जयशंकर प्रसाद : 

तद्भव शब्दावली के प्रयोग से यदि भावाभिव्यक्ति में सरलता होती है तो आप तत्सम के स्थान पर तद्भव का प्रयोग ही अच्छा समझते थे.
परस (स्पर्श), नखत (नक्षत्र), किरन (किरण), पीर (पीड़ा), थिर (स्थिर), साँझ (संध्या), तीख (तीक्ष्ण), सपना (स्वप्न), निबल (निर्बल), सुहाग (सौभाग्य), रात (रात्रि), नाच (नृत्य) आदि

प्रारंभिक कृतियों में ब्रजभाषा
बाद में बनारसी प्रयोग अधिक.

निराला : 

भावानुसार भाषा
भाषा का चलता रूप

लोक प्रचलित मुहावरों से युक्त भाषा प्रयोग में उनका व्यक्तित्व झांकता है
निराला की भाषा एक आदर्श भाषा है जिसने हिंदी के परिनिष्ठित रूप के विकास में पर्याप्त योग दिया.

अज्ञेय : 

नई कविता की भाषा के लक्षण -
साधारण बोलचाल की भाषा
मुहावरे और पद विन्यास
सीधे जीवन से ली हुई तद्भव शब्दावली
देहात की भाषा का मुहावरा
तद्भव प्रयोग – दुःख सबको माँजता है (माँजना)

[2] निर्भ्रांत सूत्रात्मक लेखकीय स्थापनाएँ

रोडाकृत राउलवेल : शिलांकित काव्य – 11 वीं शती :
राजकुल विलास = राजभवन की रमणियों का वर्णन
हिंदी भाषा का विकास पथ और भी अधिक स्पष्ट करने में सहायक
विचारणीय प्रश्न = किस प्रदेश विशेष की भाषा
सर्वाधिक बाहुल्य पश्चिमी और मध्यवर्ती रूपों का. (पछाहीं अपभ्रंश का प्रभाव – शिवप्रसाद सिंह)

चंदवरदाई : पृथ्वीराज रासो – 13 वीं शती :

 तत्कालीन ब्रजभाषा (पश्चिमी हिंदी) = प्राचीन ब्रजभाषा = पिंगल
प्राचीन प्राकृताभास शब्दों की बहुलता + अरबी फारसी का मिश्रण

मौलाना दाऊद चंदायन - 14 वीं शती :

पाठ संपादन से जुड़े रहे
चंदायन की भाषा पुरानी अवधी है जिस पर पश्चिमी हिंदी का प्रभाव है.

रत्नाकर : उद्धव शतक :
भाषा की कारीगरी

जयशंकर प्रसाद : 

निराला के गीत संग्रह ‘गीतिका’ के प्रारंभ में प्रसाद ने काव्यभाषा की चार विशेषताएँ बताईं –
(1) नई पद योजना = वर्णों का भास्वर प्रयोग
(2) नई शैली = मूर्तिमती व्यंजना + नए प्रतीक
(3) नया वाक्य विन्यास = अपूर्ण वाक्य
(4) आभ्यंतर भावों के लिए शब्दों की नई भंगिमा - 
शब्दों के नवीन सार्थक प्रयोग
अनेकार्थवाची शब्दों में से समुचित शब्द का प्रयोग
शब्दों के सटीक प्रयोग – संज्ञा, विशेषण, क्रिया आदि.
छायामयी वक्रता के लिए ‘सर्वनाम’ का प्रयोग
समुचित उपनामों का प्रयोग
वैदग्ध्यमयी वाग्भंगी जिसके द्वारा अर्थवैचित्र्य और चमत्कार की सृष्टि की जाती है.

निराला : 

संस्कृत की तत्समप्रियता
सभी प्रकार की शैली में काव्य प्रणयन का अभ्यास
अनुप्रासमयता
चित्रमयता
ध्वन्यात्मकता

पंत : 

भाषा में स्वरों का महत्व
स्वर = काव्य संगीत का मूल तंतु

पर्याय चयन
पहली बार बड़ी गंभीरता से पंत जी ने पर्यायों की अर्थछटाओं पर विचार किया
भ्रू = क्रोध की वक्रता
भ्रकुटि = कटाक्ष की चंचलता
भौंह = स्वाभाविक प्रसन्नता, ऋजुता 
अनिल = कोमल शीतल वायु
वायु = निर्मल हवा
पवन, प्रभंजन = तेज हवा

प्रमुख विशेषता : समुचित शब्द चयन
पंत जी को खड़ीबोली अव्यवस्थित, क्षीण और दुर्बल रूप में मिली.
उन्होंने खड़ीबोली को संस्कृत के शब्द देकर खड़ा किया

खड़ीबोली काव्यभाषा को आर्द्रता, कोमलता, स्निग्धता, प्रांजलता, सहजता, मधुरता, रागात्मकता प्रदान करने का श्रेय पंत को है.

महादेवी : 

खड़ीबोली हिंदी के स्पष्ट दो रूप –
(1) संस्कृतनिष्ठ हिंदी – प्रिय प्रवास,
(2) संस्कृत के शब्दों से युक्त होते हुए भी बड़े बड़े संधि समास से मुक्त रूप जिसमें समुचित तद्भव शब्दावली का प्रयोग भी = छायावादी युग की काव्यभाषा

छायावादी युग में सूक्ष्म एवं अमूर्त की अभिव्यंजना के साथ शैली अवश्य दुरूह हो गई
पर भाषा की शक्ति और सौंदर्य में विकास हुआ.

प्रतीकात्मकता
मुक्त प्रयोग
विविधता
अनेकार्थता
भाषा को सौष्ठव, साथ ही गांभीर्य प्रदान करने की दृष्टि से महादेवी जी का विशेष महत्व है.

दिनकर : 

प्रारंभ से ही भाषा के प्रति सतर्क
छायावादी युग के प्रयोगों से शिक्षा
आक्रोश के लिए बलयुक्त भाषा
बलाघात के लिए ‘ही’ का प्रयोग -
मैं ही न हाय पहचान सकी
यह बात प्रभु पहले से ही कहते हैं
तुम्हें देखते ही मुझ में अजब भाव जगता
हम ही तुम्हें साकार नहीं तो छिपे हुए हैं
भाषा उनका चरम लक्ष्य था

अज्ञेय : 

संस्कारी भाषा के पोषक
अर्थवान शब्द की समस्या

कवि उसी भाषा का प्रयोग करता है जिसे वह रोज जीता है. जब हम बोलचाल में संकर भाषा का प्रयोग करते हैं, सारा समाज संकर भाषा में जीता है तब कविता में उसे क्यों प्रवेश नहीं मिलेगा (जोग लिखी)

सांस्कृतिक बिंब-
दिन का आरंभ = द्वार पर पड़े हल्दी रंगे पत्र
धरती = सवत्सा काम धेनु
संध्या के बादल = कपूर और सिंदूर की गाँठ
भोर की पुकार = रात के रहस्यमय स्पंदित तिमिर की भेदती कटार-सी
नदियाँ = रंभाती हुई धेनुएँ

आज के युग की देन – विसंगति, अकेलापन, कुंठा, यांत्रिक जीवन आदि -
के अनुकूल भाषा तैयार करने में जहां अज्ञेय सफल रहे हैं
वहाँ प्रतीकों, बिंबों, अभिप्रायों आदि को प्रस्तुत करने में अद्वितीय.

[3] काव्यभाषा में प्रतीक विधान

कबीर :

प्रतीकात्मक भाषा : जनभाषा : लोक प्रचलित प्रतीकों का प्रयोग
चरखा = जो चरखा जरि जाय बड़ेया ना मरे/ मैं कातों सूत हजार चर्खुला जिन जरे
कुम्हार और मिट्टी
कुंआ और पनिहारिन
कोई शब्द निरर्थक नहीं : नाम के साथ विशेषण का प्रयोग : प्रतीक
हंस कबीर = मुक्तावस्था,
कह कबीर = स्वोक्ति,
कहै कबीर = अन्य व्यक्ति की उक्ति,
दास कबीर = ईश्वर का उपासक,
कबीरा = अज्ञानी
जयशंकर प्रसाद :
ज्योत्स्ना = प्रफुल्लता
स्वच्छंद सुमन = आकंक्षा, उन्मुक्त अभिलाषा
किरण = उत्साह, स्फूर्ति
बासी फूल = म्लान भाव
रजनी का पिछला प्रहर = किशोरावस्था के बाद का समय
मतवाली कोयल = हृदय का उल्लास
कलियाँ = नवीन भाव
ऊषा की लाली = यौवन
सोने के सपने = आनंदमय जीवन
ज्योत्स्ना निर्झर = अपार सौंदर्य
झंझा/ आंधी = हलचल/ क्षोभ
मरु ज्वाला = अनंत पीड़ा
पंत : 
ऊषा = दिव्य माधुर्य
कली = नारी का बाल्यकाल
रजत = रूप, चंचलता/ चपलता
द्रौपदी के दुकूल = विरह की अनन्तता
घन = चिंताएं
गर्जन = वेदना
प्रभात = शैशव
बसंत = सुख
स्वर्ण = दीप्तिमान मानसिक सत्ता
गुलाब = जीवन एवं जगत
संध्या उषा = दुःख-सुख
दोपहर = यौवन
चांदनी = शीतलता

महादेवी : 
अँधेरा (विषाद),
वर्षा (करुणा),
ग्रीष्म (क्रोध),
वसंत (आनंद),
पतझर (निराशा),
मकरंद (आँसू),
मधुशाला (विश्व),
लू (प्रेम का अंत),
बुद्बुद(क्षण)

[4] काव्य भाषा में विशेषण प्रयोग

घनानंद

विशेषण का सम्यक प्रयोग.
नेत्र व्यापर की विभिन्न अवस्थाएँ
छके दृग = प्रेम के मद से मस्त
ललित लाल चख = प्रेम के मद से मस्त होने के कारण लाल नेत्र
तृषित चखन = रूप जल के प्यासे नेत्र
अंखियानी निपेटिन की = पेटू या अत्यधिक खाने वाली!
                                      रूपरस माधुर्य का पान करने की अत्यधिक अभिलाषी आँखें
अन्य :
‘आँखिन बानि अनोखी,
प्रीति पगी अंखियानि,
अँखिया दुखियानि कुबानि परी,
दीठि थकी अनुराग छकी,
लाजनि लपेटी चितवनि भेद भय भरि’ आदि

पंत : 

विशेषणों का सम्यक प्रयोग -
उन्मन गुंजन,
महासंगीत
वन अकलुष,
अमृत सत्य
स्वप्निल मन,
अमृत प्रीति
तंद्रिल तन
श्यामल छवि
नील = नील विहग, नील गगन, नील जलज
मधु = मधु पत्र, मधुक्षण, मधुरस
स्वर्ण = स्वर्ण किरण, स्वर्णहंस, स्वर्णिम स्पर्श

दिनकर : 

विशेषणों का सटीक प्रयोग / शोध की संभावना
भीगी तान, दहकती वायु, मीठी उमंग, चकित पुकार, तरंगित यौवन, अस्फुट यौवन, मीठी धूप, शीतल सुधा, शुचि स्मिति, मृदु स्मिति
रंग विशेषण –
शुभ्रमेघ, श्वेत फूल, सफ़ेद किरण,
नीलांतरिक्ष, नीले अँधियाले, नील कुसुम
विशेषण पदबंध –
इच्छा बहरे नयन,
कजरारे लोचन,
गले पिघले अनल,
व्यग्र व्याकुल प्राण,
अगम उत्ताल उच्छल सागर,

अज्ञेय : 

विशेषणों का सम्यक प्रयोग -
तारों सजा फूहड़ निलज आकाश (इत्यलम)
लंबी अंधियाली किसी घाटी में (इंद्रधनु रौंदे हुए ये)
फुटकी की लहरिल उड़ान (इंद्रधनु रौंदे हुए ये)
मरोड़ी हुई देह वल्ली (आँगन के पार द्वार)
छरहरे पेड़ की नई रंगीली फुनगी (आँगन के पार द्वार)
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की (हरी घास पर क्षण भर).

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* हम अपने ही भंडार से अवगत नहीं हैं.
आज आवश्यकता है कि हम साहित्य और लोक में बिखरे भाषा संबंधी इस खजाने को पहचानें. [सूर]

* तुलसी की भाषा का रूप समन्वयात्मक है.
कहीं उसे किसी शब्द से घृणा नहीं.
आज के लिए अनुकरणीय. [तुलसी]
* मौन तथा व्यंजना  - 
मौन भी अभिव्यंजना है:/ जितना तुम्हारा सच है/ उतना ही कहो. [अज्ञेय]'
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* 29-30 मार्च 2014 को बेलगाम (कर्नाटक) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी 'पुण्य स्मरण' में  दूसरे  दिन डॉ. दिलीप सिंह की अध्यक्षता में संपन्न डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया पर केंद्रित विचार सत्र में प्रस्तुत डॉ. ऋषभ देव शर्मा के व्याख्यान की आधार-सामग्री.