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रविवार, 19 जुलाई 2015

हिंदी में आदिवासी साहित्य : डॉ. इसपाक अली

हिंदी में आदिवासी साहित्य /
डॉ.इसपाक अली 09845432221, 09902964647 /
साहित्य संस्थान, ई-10/ 660, उत्तरांचल कॉलोनी,
निकट - संगम सिनेमा
लोनी बॉर्डर, गाज़ियाबाद - 201102 /
2014 / 272 पृष्ठ /  सजिल्द/ 154 रुपये
/  


शुभाशंसा

धरती के असली मालिक वे नहीं हैं जो इसका दोहन और उपभोग करने को सबसे बड़ा पराक्रम मानते हुए स्वयं को अहंकारपूर्वक वीर घोषित करते हैं बल्कि वे आदिवासी हैं जो धरती को अपनी माँ मानते हैं और अपने पूरे जीवन को धरती माता के प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं. तथाकथित आधुनिक सभ्य समाजों और आदिवासी समुदायों के बीच धरती से संबंध मानने का यह अंतर ही दो अलग-अलग जीवन दृष्टियों को जन्म देता है. सभ्यता के उच्च शिखरों का स्पर्श करता हुआ मनुष्य प्रकृति से दूर होता जाता है और इस तरह केवल भूमंडल ही नहीं समग्र पर्यावरण तथा स्वयं मनुष्य के अस्तित्व को खतरे में डालता चला जाता है. दूसरी ओर वे समुदाय हैं जिन्हें हम जनजाति कहते हैं – वे अबाध उपभोग की दौड़ लगाने वाली सभ्यता की दृष्टि से भले ही हाशिए पर रह गए हों लेकिन उन्होंने धरती सहित संपूर्ण प्रकृति के साथ अपना रागात्मक संबंध टूटने नहीं दिया है. जल, जंगल और जमीन के साथ बंधे अपने अदृश्य स्नेहसूत्र की रक्षा की खातिर वे आज भी अपनी जान पर खेल जाने को तत्पर रहते हैं. इन निसर्गजीवी सीधे सच्चे आनंदमय प्राणियों को सही अर्थों में संस्कृति के जन्मदाता माना जाना चाहिए – इन्होंने ही लोक की सारी सांस्कृतिक संपदा को आज भी सहेज-संभाल कर रखा हुआ है. इनके मौखिक साहित्य में वे तमाम जीवन मूल्य संरक्षित हैं जो सही अर्थ में मनुष्य की आत्मा के उन्नयन के लिए आवश्यक होते हैं. तथाकथित सभ्य समाज इन जनजातियों और आदिवासियों को या तो रहस्य रोमांच की दृष्टि से देखने का आदी रहा है या इनके श्रम और प्रेम का शोषण करने का अभ्यस्त रहा है या फिर इन्हें अपराधी और गुलाम बनाकर इनका नाश करने पर उतारू रहा है. इसमें इतिहास और संस्कृति पर शोध करने वालों का भी कम हाथ नहीं रहा है. कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उन्होंने ही सहज मानवों के इन समूहों की बर्बर और जंगली छवि गढ़ने में मुख्य भूमिका निभाई है और इन्हें हाशिए पर पड़ा रहने को विवश किया है. राजनीति का भी इस षड्यंत्र में बराबर का हाथ रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. आदिवासी विमर्श मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास में जबरदस्ती अनुपस्थित दर्ज किए गए आदिवासियों और जनजातीय समूहों की उपस्थिति को रेखांकित करने वाला विमर्श है – भले ही इसके लिए आपको अपने अब तक के पढ़े-लिखे इतिहास को सिर के बल खड़ा करना पड़े. 

डॉ. इसपाक अली ने ‘हिंदी में आदिवासी साहित्य’ शीर्षक प्रस्तुत ग्रंथ के माध्यम से एक तरफ तो यह दर्शाया है कि हिंदी के साहित्यकार हाशियाकृत आदिवासी समाजों के प्रति असंवेदनशील नहीं रहे तथा दूसरी ओर यह प्रतिपादित किया है कि मौखिक साहित्य या लोक साहित्य के रूप में प्रस्फुटित होने वाली आदिवासी जन की सहज अभिव्यक्तियाँ अब लिखित साहित्य के रूप में भी प्रकट होकर आ रही हैं, पाठक जगत को विस्मित कर रही हैं और आदिवासी अस्मिता का नया चेहरा निर्मित कर रही हैं. सहज भाषा-बानी में ढली हुई आदिवासी अभिव्यक्तियाँ आदिवासी समाजों की रीति-नीति और मूल्यबोध की प्रामाणिक जानकारी देने में समर्थ हैं. स्वयं जिए हुए जीवन की यह प्रामाणिकता आदिवासी साहित्य को परम विश्वसनीयता तो प्रदान करती ही है, उसकी पीड़ा और यातना का प्रभावी पाठ भी रचती है. यह पाठ उस साहित्य के पाठ के पुनर्पाठ का भी निकष बनता है जिसकी रचना दलित रचनाकारों से पहले के हमारे संवेदनशील साहित्यकार करते रहे हैं. अभिप्राय यह है कि आदिवासी विमर्श किसी भी प्रकार उन साहित्यकारों को खारिज नहीं करता जिन्होंने स्वयं आदिवासी समूह का सदस्य न होते हुए भी आदिवासी समाज और जनजातियों के जीवन यथार्थ को साहित्य का विषय बनाया. कहना ही होगा कि ये दोनों गोलार्ध मिलकर ही आदिवासी विमर्श के पूरे मंडल का निर्माण करते हैं. 

प्रस्तुत ग्रंथ में विद्वान लेखक ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक भारतीय आदिवासी समुदायों के जीवन की विशेषताओं को सामने रखते हुए उनकी समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया है. यह ग्रंथ इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में आदिवासी साहित्य के विविध संदर्भों को खोजकर यहाँ विवेचित किया गया है. लेखक ने आदिवासी और दलित साहित्यों के अंतर को भी तर्कपूर्वक समझाया है और आदिवासी साहित्य के नवोन्मेष के संदर्भ में उसके मूल्यों और सरोकारों को सोदाहरण स्थापित किया है. 

संभवतः यह ग्रंथ विस्तार से आदिवासी जीवन केंद्रित हिंदी उपन्यासों और कहानियों का विवेचन-विश्लेषण करने वाला अपनी प्रकृति का पहला ग्रंथ है जिसमें आज तक प्रकाशित कृतियों की खोजखबर शामिल है. इसमें संदेह नहीं कि आदिवासी विमर्श का यह खजाना डॉ. इसपाक अली ने गहरे पानी पैठकर खोजा है. आदिवासी जीवन केंद्रित हिंदी कविताओं विषयक सामग्री इस दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन पड़ी है. इसीलिए निस्संदेह यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के विमर्शकारों, अध्येताओं, शोधकर्ताओं, अध्यापकों और पाठकों, सभी के लिए बहुआयामी उपयोगिता वाला ग्रंथ सिद्ध होगा. 

आदिवासी विमर्श पर इस उत्तम ग्रंथ के प्रकाशन के लिए मैं लेखक और प्रकाशक दोनों को हार्दिक बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि इससे उनके यश में वृद्धि होगी. 

शुभकामनाओं सहित

15 नवंबर 2013                                                                                                            - ऋषभ देव शर्मा

मंगलवार, 2 जून 2015

एक पवित्र स्वच्छ दिशा की ओर

डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी के काव्य 'उर्वरा' की भूमिका



डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी साहित्य सृजन, पत्रकारिता और समाजसेवा के हलकों में हैदराबाद की चर्चित शख्सियत हैं. उन्होंने अपने जीवन काल की विविध अवस्थाओं में अनेक कविताएँ रची हैं और कलम के माध्यम से मानवीय जीवन की चरितार्थता खोजने का प्रयास किया है. उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर निजी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति निहित है, वहीं दूसरी ओर वे सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों तथा समस्याओं पर भी अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करके अपने कवि की सार्थकता तलाशते हैं,
कवि विद्यार्थी अपने मन को पहचानने की पहल करते हैं तो सबसे पहले उनका सामना अस्तित्व के प्रश्नों से होता है. अस्तित्व को नकारात्मक परिभाषाओं  के आधार पर चीन्हने की आध्यात्मिकता को अस्वीकार करके वे अहम् और अस्मिता की स्वीकृति चाहते हैं – भले ही उसकी सीमाएँ हों. दूसरी और उन्हें जीवन और मृत्यु का चक्र भी भ्रामक प्रतीत होता है. वे चाहते है कि प्रकृति माँ अब इस अस्तित्व के भार को बार-बार लपेटना छोड़ दे. उन्हें इसकी परवाह नहीं कि जीवन यात्रा भटकाव की दिशा में अग्रसर है या सहारा मिलने की, अथवा अस्तित्व बहाव में है या किनारे पर; वे तो निष्काम कर्मयोगी की तरह मौन के अर्थ स्वयं ढूँढने और अनंत गहराइयों को स्वयं नापने का संकल्प संजोए हुए हैं और फल की इच्छा से निस्पृह रहकर आत्मनिवेदन करते दिखाई देते हैं – ‘’भटकाव में हूँ या सहारे पर/ बहाव में हूँ या किनारे पर/ तुम ही जानो- / बस मेरा समर्पण स्वीकार करो...’’

अपने इस कविता संकलन ‘’उर्वरा’’ में कवि हरिश्चंद्र विद्यार्थी आध्यात्मिक प्रश्नों से भी टकराते दिखाई देते हैं. ‘उस’ रहस्यमय के विषय में कवि की सहज जिज्ञासा द्रष्टव्य है – ‘’शून्य बादलों से मौन गुमसुम/ किस माया के परिवेश में आच्छादित तुम!/ समय की दिशाओं सी बदलती करवटें/ तुम और तुम्हारा व्यक्तित्व, भीतरी आवास/ का रूप बदलता प्रशिक्षण,’’ इस विरत की तुलना में मनुष्य का लघु अस्तित्व घुटन और कुंठाओं से दबा-दबा मौन प्रतीक्षा की घड़ियाँ गिनता है. इस प्रक्रिया में वह कई प्रकार के अनुभवों को  आयत्त करता है. यथा – माटी के काछे घड़े ज्यों फूटते हैं सभी / हम और आप सभी प्यार करने वाले बिन जल के मीन से जलचर हैं. पाप-पुण्य का द्वंद्व भी कवि मन को घेरता है. कवि को यह अहसास है कि प्यार को न समझने वाले विश्व की कसौटी पर सहज समर्पण को भी दोष माँ लिया जाता है. तभी तो ‘’मेरा दोष इतना ही है/ और मैं अपराधी हुआ भी कि नहीं/ कि तुम्हें अपना प्यार बांटता रहा.’’ दुनियावी कसौटियों की निरर्थकता इस प्रेमी को इस आत्मस्वीकृति के लिए प्रेरित करती है ‘’कि और विकृत न हो जाएं/  मेरे विकार – मुझे डँसें / कि – सदा सदा के लिए/ मैं स्वत्व को समर्पण कर दूं/ स्वाह-आहुति में/ मेरे शेष सपने न रहें/ कि दूषित मन से किसी को प्यार करता रहूँ.’’ कवि की दृष्टि में प्यार गंगा के जल सा स्वच्छ है और उसकी परिभाषा केवल आकाश की विराटता के रूप में की जा सकती है.

हमारे समय की बड़ी विडम्बना यह है कि व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों ही सन्दर्भों में हम प्रेमहीन और प्रेमविरुद्ध समय में जीने के लिए विवश हैं. आदमी के हाथ से आदमी का हाथ छोतता जा रहा है और हम असहाय से खड़े देख रहे हैं. सिकंदर हों या अशोक, सभी की विस्तार लिप्सा आदमी और आदमीयत का खून पीकर बलवती होती है. आज भी तरह तरह की भोगवादी और साम्राज्यवादी शक्तियां धर्म से लेकर राज्य तक के नाम पर धरती को हिंसा रूपी दैत्य के जबड़ों में पीस रही हैं. काश ये शक्तियां भी सत्ता की भंगुरता के सच को कवि की तरह देख पातीं – ‘’लाशों के ढेर ढहाए/ अपनी पताका लहलहाए/ गीत विजय अगीत गाए/ पर उनका अहम् का स्तूप-दीप/ आज अब मेरे नयनों के सम्मुख/ बुझा हुआ, धूल धूसरित विकृत.’’

ऐसी स्थिति में कवि का अपने प्रभु के समक्ष अपलक प्रार्थना में खड़े होना स्वाभाविक है क्योंकि पीड़ित-कलुषित ब्रह्माण्ड की शांति का यही एक उपाय बचा है. कवि को दुःख है कि विश्व कलह चक्र बन गया है, चर-अचर/ चेतन-अचेतन का भेद किए बिना अणु-अणु में ज्वालामुखी फूट पड़े हैं; मन अमन हो गया है. सृष्टि की सहज शांति के भंग होने के भय सत्य की परछाइयां तक आशंकित और आतंकित हैं. यही कारन है कि गाँव के ताल-किनारे डूबते सूरज के समक्ष कवि समग्र पर्यावरण और मानवता की रक्षा के लिए शांतिपाठ करते हैं – ‘’आओ! हृदय के कलुषित कंकाल को ढहा दो,/ और- / एक पवित्र स्वच्छ दिशा की ओर / भुजाओं को फैला दो, शायद इसी में / शांति, अमरता, मोक्ष – सभी कुछ हमें मिल जाए.’’

अंत में, इतना और कि इस संग्रह की बहुत सी कविताएँ कवि ने वयस के चौथेपन में रची हैं. ऐसी कविताओं में वृद्धावस्था जनित खास तरह की उदासी में लिपटी हुई मृत्यु की प्रतीक्षा की गहरी साँसों को महसूस किया जा सकता है. इसे आस्तिक कवि की सृजनशील जिजीविषा की विजय ही कहा जाएगा कि यहाँ मृत्यु का भय नहीं बल्कि मुक्ति का आवाहन है – ‘’प्राण! मौत के दायरों से घिरा घिरा/ हर दिशा को निहारता है;/ कि मुक्ति के लिए / कोई मर्म मिल जाए!/.....ओ दिशाओ!/ मृत्युंजयी बनकर/ मृत्यु की मधुर कल्पनाओं को संवारो/ लोकतृष्णा और मुमुक्षु / इन क्षणों पर तुषारपात/ अपराध-/ सर्वांग बंधन मुक्त कर दो!’’

इतनी अर्थपूर्ण, मार्मिक और सामयिक कविताओं के लिए इनके रचनाकार डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी का अभिनंदन करते हुए मैं इस कविता संग्रह की सफलता की कामना करता हूँ. प्रेम बना रहे!

31 मई, 2015                                                      - ऋषभदेव शर्मा

    

रविवार, 17 मई 2015

दुर्गा दत्त पांडेय के कविता संकलन 'मुस्कान' की समीक्षा

हास्य और करुणा में पकी व्यंग्य कविता 'मुस्कान' :
दुर्गा दत्त पांडेय के कविता संकलन की समीक्षा : ऋषभदेव शर्मा 
[भास्वर भारत : अप्रैल-मई 2015 : पृष्ठ 48]