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बुधवार, 6 जुलाई 2016

भूमिका : मलयालम कवि सेबास्टियन की कविताएँ

अदृश्य तंबुओं की खोज में (सेबास्टियन की चुनिंदा कविताएँ)

भूमिका

अग्रणी समकालीन मलयालम कवि सेबास्टियन व्यापक सरोकारों और गहरे सौंदर्यबोध के कवि हैं. उनकी कविताओं से गुजरने पर मलयालम कविता का उत्तरआधुनिक चेहरा सहज ही उभरकर सामने आ जाता है. वस्तु विन्यास से लेकर अभिव्यंजना शिल्प तक एक खास तरह की विरलता उन्हें दूसरों से अलग व्यक्तित्व प्रदान करती है. 

एक ऐसे समय में जब आदमी के हाथ से आदमीयत छूटी जा रही है और जीवन मूल्य मुट्ठी में बंद रेत की तरह रिसते जा रहे हैं, सेबास्टियन आम आदमी की ‘सफरिंग’ का पाठ रचते हैं. एक ऐसे समय में जब सब ओर से हमला करता हुआ बाजार भावनाओं के संसार को निगलने में व्यस्त है, सेबास्टियन की कविताएँ राहत देती हैं क्योंकि वे खाँटी संवेदनाओं को शब्दबद्ध करती हैं. आज जब हम एक ऐसे ठंडे संसार में जीने को विवश हैं जिसमें बड़ी से बड़ी दुर्घटनाएँ भी सनसनीखेज समाचार से अधिक महत्व नहीं रखतीं – जिनका श्रोता समाज न तो विचलित होता है, न बौखलाता है, न गुस्साता है; ऐसे वक्त में सेबास्टियन का कवि-मन छोटी-छोटी चीजों से द्रवित हो जाता है, साधारण दीखने वाली घटनाओं से विचलित हो उठता है और दैनिक जीवन की जड़ताओं से असंतुष्ट होकर, असहमत होकर, कभी व्यंग्य करता है तो कभी अपनी समानांतर दुनिया खड़ी करता है – फैंटसी की दुनिया. इस कवि के लिए काव्य सृजन कुएँ की तह में डुबकी लगाकर अभिव्यक्ति की तलाश करने जैसा है – ‘आकाश में/ एक कुंआ प्रकट हुआ/ धरती से इसका पानी/ नीला नजर आया/ बाल्टी और रस्सी के/ नीचे उतरने पर/ गरारी ने आवाज की/ आश्चर्य की बात है/ मैंने रस्सी को पकड़/ जल्दबाजी में खींचा/ कुएँ की तह में पड़ी/ कविता बाहर निकली...’ 

यदि यह कहा जाए कि सेबास्टियन का काव्य संसार दैनिक सामान्य जीवन से उठाए गए बिंबों का संसार है, तो अनुचित न होगा. वे एक ऐसे काव्यशिल्पी हैं जिन्हें ‘परिचित’ चीजों के नए संयोजन द्वारा ‘अद्भुत’ की सृष्टि करने में महारत हासिल है. इस कविता संग्रह की शीर्षक पंक्ति ‘अदृश्य तंबुओं की खोज में’ जिस कविता से ली गई है वह भी इस तथ्य को प्रमाणित करती है. ‘भूख’ शीर्षक यह कविता सीधे-सीधे भूख को संबोधित है – ‘भूख!/ तेरा घर व पता/ मुझे नहीं मालूम.’ और इस न-मालूम होने का कारण है आख्याता की वह संपन्नता जिसके कारण वह दिन में तीन-तीन बार खाकर अघा चुका है. ऐसा व्यक्ति भूख और उसकी यातना से भला कैसे परिचित हो सकता है! लेकिन सूखे और अभाव के दिनों में जब उसका साक्षात्कार मृत्यु की ओर अग्रसर उन गरीबों से होता है जो किन्हीं अदृश्य तंबुओं की खोज में निकले हुए हैं तो उसके स्मृतिकोश से गरीबी और भूख के वे अनुभव सहसा बाहर आकर साधारणीकृत होते हैं जिन्हें भोगते हुए कभी साधनहीनता के बीच उसके दादा की मृत्यु हुई थी. इस प्रकार यह कविता ध्वनित करती है कि संपन्नता शाश्वत नहीं है, उसके पीछे भी विपन्नता का इतिहास है. यदि यह इतिहास याद रहे तो भूख से परिचय बना रह सकता है. इस प्रकार अपरिचय से आरंभ हुई कविता परिचय के साथ समाप्त होती है. लकड़ी के ढेर में दीमक-खाया दिवंगत दादा का चित्र इस परिचय का माध्यम बनता है – ‘वहाँ मैंने अनजाने में/ तेरा घर व पता/ पा लिया.’

इसी प्रकार - घिसी हुई चप्पल सीता हुआ मोची, शवपेटिका में लिटाई जाती हुई माँ को पहली बार जूता पहनाते हुए रिश्तेदार, केरल का नीली नसों वाला मानचित्र देखता हुआ बेटा, हथेली में खेती करने वाला किसान, खेत में गूँजती हुई सारस और मेंढक की आवाजें, रेल यात्रा में तीव्र गति से परिवर्तित होता हुआ बाहर का परिदृश्य, सूने घर की दीवार पर टंगा किसान का फटा हुआ चित्र, चट्टान पर बैठ पानी पीता एक छोटा मेंढक, चारों ओर से पानी की दीवारों के बंदीगृह में कैद व्यक्ति, वेश बदलकर साँप बनता हुआ प्रेमी, एक दूसरे को ढूँढ़ते हुए घर और गृहस्वामी, रास्ते में पाँव रखते ही बनते हुए गड्ढे और हर गड्ढे से बाहर निकलती काली बिल्ली, बाण की नोक से सिली जाती हुई फटी धरती, सीमेंट की बेंच पर बैठे हुए स्त्री और पुरुष, जाल में फँसी नदी को सुखाता मछुआरा, धूप में लाल झंडे सी बहती नदी, खिड़की के काँच पर दस्तक देता बारिश का मौसम, प्रतीक्षा में क्रमशः पेड़ में तब्दील होता हुआ व्यक्ति, रात भर गीले मैले कपड़े से थोडा-थोडा कर अंधेरे को पोंछता हुआ मनुष्य, सात भागों में फैली हुई इंद्रधनुष की स्याही, गले में अटका शब्द का काँटा और उससे घायल होता हुआ गला – ये सेबास्टियन की इन कविताओं में निर्मित कुछ बिंब हैं. इन्हें एक नजर देख लेने भर से कवि के विस्तृत अनुभव जगत और उतने ही विराट कल्पना संसार के वैभव का सहज ही अनुमान किया जा सकता है. 

यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सेबास्टियन की कविताओं में यथार्थ का पर्याप्त आग्रह दिखाई देता है. इस आग्रह के कारण ही उनकी प्रेम कविताएँ भी पर्याप्त ठोस प्रतीत होती हैं. कुछ स्थलों पर रहस्य और अध्यात्म के संस्पर्श के साथ सेबास्टियन की प्रेम कविताएँ यथार्थमूलक फैंटेसी के रूप में मूर्त होती हैं. कवि जब प्रेमिका की दिगंबर देह का शब्दचित्र बनाने को उद्यत होता है तो चिड़िया, हवा, मेघ, नारियल का पेड़ और बारिश मिलकर अंगडाई ले रहे स्वयं उसके शरीर पर प्रेमिका के शरीर के सौंदर्य और गंध को लिख डालते हैं. (शरीर पर लेखन). कवि को विश्वास है कि नदी की खामोशी, लहरों के रुदन और धूप की प्रतीक्षा में सुबह की बेला में प्रेम जागेगा. (निर्मलता). यह ठीक है कि प्यार के दिनों की किताबें दीमक ने चाट ली हैं, फिर भी कभी न कभी तो दीमक ‘मैं’ नामक पुस्तक को पढ़ेगी. (आठ प्रेम कविताएँ). यह प्रेम कविता को एक ऐसी पारदर्शी कमीज बना देता है जिसके पार से सच्चाई झलकती है – ‘कविता भी एक कमीज है/ पारदर्शी/ हर कोई इसे पहन नहीं सकता/ कुलीन पहनेंगे तो/ इनकी नग्नता दिखायी देगी.’ (आठ प्रेम कविताएँ). 

सेबास्टियन की कविता में केरल केवल समुद्र, मछली और बारिश के ही रूप में नहीं आया है बल्कि आज के आदमी की इस विवशता के रूप में भी आया है कि – ‘सागर की रेलगाड़ी गुजर रही है/ मेरे पास काँटा नहीं है/ इसलिए मैंने खुद को उसमें लटका कर/ खिड़की से बाहर फेंका जोर से...’ (मत्स्यन). ‘ग्लोबल’ के दबाव में लुप्त होते ‘लोकल’ के प्रति कवि विशेष रूप से चिंतित हैं – ‘सब कुछ हटा दिया/ लेकिन चिमनियाँ बाकी हैं/ *** / हर दिन तीन बार काली चिमनियों में घुसकर/ दीवारों पर जीभ से चाटकर/ सारे गुणों का अनुभव करें/ कोई भी राज्य पेटेंट के लिए न आए/ स्थानीय लोग व रिश्तेदार इसमें शामिल न हो.’ (चिकित्सार्थ). अभिप्राय यह है कि बाजारीकरण के इस दौर में केरल की अपनी स्थानीय रंगत लुप्त होने के कगार पर है. प्रकृति और संस्कृति दोनों पर ही मंडराते हुए खतरे से आगाह करता हुआ कवि कहता है – ‘आंगन में/ कोई नहीं है/ फूलों के पेड़ नहीं है/ न कुंआ है/ न भरा हुआ/ पानी का घड़ा/ न/ नन्हों का पदचिह्न/ न लोरी/ दृष्टि के उस पार/ कुछ भी नहीं है/ आंगन में साफ़ जमीन है/ जिसमें से सब कुछ/ अलग कर दिया गया...’ (आंगन). 

कवि सेबास्टियन की इन समर्थ और सुंदर कविताओं से हिंदी जगत को परिचित कराने का श्रेय इनके अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्स को जाता है. डॉ. संतोष अलेक्स की मातृभाषा मलयालम है और उन्हें हिंदी, अंग्रेजी और तेलुगु पर भी इतना अधिकार प्राप्त है कि वे निरंतर इन सब भाषाओं में मौलिक सृजन और अनुवादकर्म करते आ रहे हैं. मैं उनके द्वारा अनूदित इन मलयालम कविताओं के प्रकाशन पर उन्हें और मूल कवि सेबास्टियन को हार्दिक बधाई देता हूँ. 

4 जुलाई, 2016                                                                                                         - ऋषभदेव शर्मा

बुधवार, 15 जून 2016

संपादकीय : 'वृद्धावस्था विमर्श' (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद) : नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे

नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे

अस्तित्ववादी दार्शनिक सिमोन द बुआ (9 जनवरी, 1908 -14 अप्रैल, 1986) को स्त्री-विमर्शकार के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त है। उन्होंने उपन्यास, निबंध, जीवनी, आत्मकथा और व्यक्तिचित्र आदि विधाओं में दार्शनिक, राजनैतिक और सामाजिक विमर्शमूलक प्रभूत लेखन किया। 1949 में प्रकाशित ‘द सेकंड सेक्स’ (स्त्री : उपेक्षिता) ने उन्हें वैश्विक स्त्री मुक्ति आंदोलन का पुरोधा बना दिया। इस कृति के प्रभामंडल ने उनके शेष कृतित्व को मानो अंतर्धान कर रखा है। अन्यथा 1970 में प्रकाशित उनकी शोधपूर्ण कृति ‘ला विएलेस्से’ (फ्रेंच) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ‘ला विएलेस्से’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘ओल्ड एज’ 1977 में आया। यह कृति वस्तुतः सिमोन की भविष्योन्मुखी विश्वदृष्टि का प्रमाण है और ‘वृद्धावस्था विमर्श’ की गीता है। इसके प्रकाशित होते ही दार्शनिक और सामाजिक हलकों में ‘वृद्धावस्था’ पर सर्वथा नई दृष्टि से बहस छिड़ गई। यह भी कहा जाता है कि सिमोन द बुआ के लेखन में आयु और लिंग विषयक विमर्श परस्पर संबंधित हैं। अथवा ‘सेकंड सेक्स’ और ‘ओल्ड एज’ ऊपर से भिन्न प्रतीत होते हुए भी मूलतः सिमोन के अस्तित्ववादी चिंतन के दो परस्पर गुंथे हुए आयाम हैं जिनका संबंध क्रमशः ‘स्त्री’ और ‘वृद्ध’ को परिवार और समाज की प्राथमिक नागरिकता से वंचित रखने के षड्यंत्र के प्रत्याख्यान से है जबकि ये दोनों ही समाज के अस्तित्व की धुरी हैं। इन दोनों कृतियों के माध्यम से सिमोन ने क्रमशः स्त्री और वृद्ध से जुड़े मिथों की शल्य परीक्षा की है क्योंकि इन मिथों के कारण ही आज भी बड़ी सीमा तक स्त्री और वृद्ध सामाजिक पराएपन के शिकार हैं।
सिमोन ने विश्व भर के विभिन्न समाजों में वृद्धावस्था से संबंधित रूढ़ियों और वृद्धों की दशा तथा उनके प्रति व्यवहार का अलग-अलग दृष्टियों से अध्ययन किया। उन्होंने यह भी देखा कि इन ‘वरिष्ठ नागरिकों’ की शारीरिक और मानसिक क्षमताओं तथा इच्छाओँ, आकांक्षाओं और सपनों की दशा और दिशा क्या होती है। दरअसल वरिष्ठ नागरिकों अथवा वृद्धों के संबंध में समाज का चरित्र व्यापक स्तर पर दोगलेपन का शिकार रहा है। एक ओर तो नित्य उनका आशीर्वाद लेने की बात की जाती है तथा दूसरी ओर उन्हें बोझ समझा जाता है। समाज, साहित्य और संस्कृति में सदा उपस्थित रहने के बावजूद वृद्धों की अवस्थिति केंद्र की अपेक्षा परिधि पर ही अधिक रही है। बुढ़ापा आने का अर्थ ही है व्यक्ति का केंद्र से उखड़कर परिधि की ओर जाने के लिए विवश होना। केंद्र से अपदस्थ होते ही व्यक्ति समाज की उपेक्षा का पात्र बन जाता है और यदि उसका सही ‘पुनर्वास’ न हो तो उसे अपना अस्तित्व ही अभिशाप लगने लगता है। इस प्रकार परिधि पर धकेले गए एक समुदाय के रूप में वृद्ध समुदाय दुनिया का बहुत बड़ा उपेक्षित जन समुदाय है जिसकी जनसंख्या में 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तीव्रता से वृद्धि हुई है और 21वीं शताब्दी में और भी वृद्धि सुनिश्चित है क्योंकि इधर जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही घट रही हैं तथा चिकित्सा विज्ञान ने आदमी की औसत आयु बढ़ा दी है। वृद्धावस्था विमर्श इस उपेक्षित समुदाय की दृष्टि से - अथवा वृद्धावस्था को केंद्र में रखते हुए – समाज, साहित्य और संस्कृति की नई व्याख्या करने वाला विमर्श है। वृद्ध होने पर वानप्रस्थ और संन्यास की व्यवस्था की पुनर्व्याख्या की आज बड़ी जरूरत है ताकि वरिष्ठ नागरिकों के समुदाय को अपना अस्तित्व अनुपयोगी और अभिशाप प्रतीत न हो। वृद्धावस्था विमर्श वस्तुतः सामाजिक संबंधों को इन बदली हुई परिस्थितियों में नए ढंग से समझने की जरूरत पर बल देता है। शारीरिक अशक्यता, मानसिक समस्याएँ, परनिर्भरता, मूल्य परिवर्तन, आर्थिक संकोच, जीवनसाथी की मृत्यु, निराश्रित होने की आशंका, भविष्य की अनिश्चितता, संबंधों की निरर्थकता का बोध, राग-विराग का द्वंद्व, पराएपन और अलगाव की स्थिति, बचपन और युवावस्था की यादों से जुड़ा अतीत प्रेम, काम और क्रोध जैसी वृत्तियों का उदात्तीकरण न कर पाने से जुड़ी समस्याएँ और आध्यात्मिक विभ्रम जैसे अनेक पक्ष वृद्धावस्था विमर्श के विचारणीय बिंदु हैं।
दरअसल सिमोन द बुआ की अंतश्चेतना में कहीं-न-कहीं वृद्धावस्था और मृत्यु से जुड़े हुए प्रश्न बराबर उपस्थित थे। यही कारण है कि वे अपने सृजन और चिंतन दोनों में अस्तित्व की नश्वरता पर विचार करती दिखाई देती हैं। 1946 में आए अपने उपन्यास ‘ऑल मेन आर मोर्टल’ में उन्होंने फोस्का नामक अपने कथानायक की अमर होने की इच्छा के माध्यम से मनुष्य की नश्वरता और मरणशीलता की अनिवार्यता पर अस्तित्ववादी नजरिए से विचार किया। इसके बाद 1964 में ‘ए वेरी ईजी डेथ’ में उन्होंने मरने की प्रक्रिया का खुलासा तो जोर देकर किया ही, अपनी माँ की मृत्यु का भी चित्रण किया। ‘ओल्ड एज’ (1970) में तो यह विषय उठाया ही गया है – वृद्धावस्था मृत्यु की तैयारी का समय है! यही नहीं 1981 में अपने संस्मरण लिखते हुए भी उन्होंने ज्याँ पाल सार्त्र के अंतिम दस वर्षों का जो यथार्थ अंकन किया है उसमें उनकी बीमारी, दैहिक क्षरण और वृद्धावस्था का वर्णन शामिल है। अभिप्राय यह है कि सिमोन ने वृद्धावस्था पर केवल सैद्धांतिक चिंतन नहीं किया बल्कि अनुभूति के गहन धरातल पर उन्होंने उसे लंबे समय तक जिया भी। किसी को भले ही अविश्वसनीय और विस्मयकारी लगे मगर यह सच है कि मात्र 36 वर्ष की आयु में युवती सिमोन द बुआ ने अपने आपको वृद्ध होते महसूसना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं इस संवेनशील विदुषी ने 13 वर्ष की आयु से ही यह महसूस करना शुरू कर दिया था कि ‘समय गुजर रहा है’। काल की सापेक्षता में आयु का गुजरना महसूस करने के कारण ही वे अस्तित्व विषयक दर्शन की ओर मुड़ीं। बुढ़ापा शारीरिक है या मानसिक अथवा दोनों – मनोदैहिक? यह प्रश्न अपनी जगह है। लेकिन यह सच है कि मृत्यु और बुढ़ापे का साक्षात्कार मनुष्य को किसी भी आयु में नचिकेता, विदेह और तथागत बनाने के लिए पर्याप्त है। उसी ने सिमोन को सिमोन बनाया।
हमारे यहाँ यों तो वृद्धावस्था से जुड़े प्रश्नों पर विचार की पुरानी परंपरा रही है लेकिन इस अवस्था से जुड़ी समस्या का जो रूप आज हमारे सामने है वह पहले कभी ऐसा न था। भारत में जरा-चिकित्सा (जेरियाट्रिक्स) के अध्ययन का इतिहास अभी आरंभिक अवस्था में है। अध्येता वार्धक्य और आयु संबंधी समस्याओं के पहलुओं को आधुनिक, उत्तरआधुनिक, स्त्रीवादी, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टियों से समझने-समझाने की कोशिश कर रहे हैं। आज हमारी चिंता का विषय विशाल वृद्ध जन समुदाय के जीवन को सुखमय बनाने से संबंधित है – चाहे वे पुरुष हों या स्त्री। यही कारण है कि वृद्धावस्था से जुड़े सेवामुक्ति से लेकर वृद्धाश्रम तक के, अथवा देह से लेकर आयु तक के क्षीण होने के, मुद्दे चिंतन और सृजन के विविध मंचों पर छाए हुए हैं। यदि यह कहा जाए कि आज का मनुष्य बुढ़ापे और मौत से कुछ ज्यादा ही आतंकित है तो भी शायद गलत न होगा।
सिमोन द बुआ कृत ‘ओल्ड एज’ को पहली बार देखने-पढ़ने का मौक़ा मुझे 2010 में मिला और मैं दीवानों की तरह अपने सब दोस्तों से इस किताब का जिक्र करने लगा। मेरे अभिभावकतुल्य वरिष्ठ मित्र श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (7 अप्रैल, 1942 - 13 सितंबर, 2012) ने मेरी यह दीवानगी देखी तो ‘ओल्ड एज’ उठा ले गए। उन दिनों वे ब्लॉग लेखन की दुनिया में बहुत सक्रिय थे। मुझसे चर्चा करने के बाद उन्होंने अपने ब्लॉग ‘कलम’ (cmpershad.blogspot.in) पर उस पुस्तक का सार-संक्षेप लिखना आरंभ किया। इस सार-संक्षेप की पहली किस्त 18 अगस्त, 2010 को तथा अंतिम (दसवीं) किस्त 30 दिसंबर, 2010 को प्रकाशित हुई। ‘कलम’ ब्लॉग के पाठकों ने इसे बहुत पसंद किया; सराहा। अभी हम लोग इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करने की योजना बना ही रहे थे कि काल ने अकाल ही चंद्रमौलेश्वर जी को हमसे छीन लिया!
इस पुस्तक को कई वर्ष पूर्व प्रकाशित हो जाना था, पर यह अब आ पा रही है। इसके लिए मेरा प्रमाद ही उत्तरदायी है। अब भी यदि श्री अमन कुमार त्यागी (परिलेख प्रकाशन) और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने न जगाया होता, तो मैं तो सोता ही रहता।
सिमोन की तो हम नहीं जानते, लेकिन चंद्रमौलेश्वर प्रसाद आत्मा की अमरता में विश्वास रखते थे। यह पुस्तक – उनकी अपनी पुस्तक – श्रद्धांजलि के रूप में उन्हें समर्पित है।
1 जनवरी, 2016                                                           
                                              -  ऋषभदेव शर्मा          




शुक्रवार, 25 मार्च 2016

[व्याख्यान] हिंदी भाषा की संस्कृति

1. भाषा एक साथ बहुत कुछ है. 
वह-
संप्रेषण की एक बहुमुखी व्यवस्था है,सोचने-विचारने का माध्यम है,सर्जनात्मक अथवा साहित्यिक अभिव्यक्ति का कलात्मक साधन है,एक सामाजिक संस्था है,
राजनैतिक विवाद का सार्वकालिक मुद्दा है तो
किसी देश को एकता के सूत्र में बांधने और उसके विकास का जरिया भी है.
                                           .[दिलीप सिंह, भाषा का संसार, पृष्ठ 9]

2. भाषा = एक विशिष्ट मानव व्यवहार : संप्रेषण के निमित्त 
संप्रेषण : भाषा का प्रयोग करके क्या करना चाहते हैं/ परपज. क्यों / नीड. प्रसंग/ रेफरेंस, कॉन्टेक्स्ट. मनोदशा /मूड. विषय / थीम, टॉपिक . [हैलिडे]

3.  मनुष्य 
= सामाजिक प्राणी
= बोलने वाला प्राणी
= बातचीत करने वाला प्राणी /होमोलोगन
= लिखने वाला प्राणी

4. .सर्जनात्मक वृत्ति : शैली 
सहवाग ने पांच चौके जड़े / मारे.
धोनी ने रनों की झड़ी लगा दी / ढेर सारे रन बनाए.
मोहन की बात में दम था/ ठीक थी.
वह मुँह बाए देखता रहा / कुछ नहीं समझा.

 5. अर्थ : प्रतीक और बिंब 
अर्थ शक्यता / मीनिंग पोटेंशियल
कमल-पंकज = सौंदर्य/ कोमलता/ शुभ
धुआँ = निराशा/ अनिश्चय
बादल= अनुभूति की सघनता/ वेदना
लालिमा = क्रोध/ लज्जा

6. भाषा : लचीलापन 
संभावनाओं का पुंज
- पारिस्थितिक संदर्भ/ कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ सिचुएशन
- सांस्कृतिक संदर्भ / कल्चरल कॉन्टेक्स्ट

7.  पराभाषाविज्ञान / पैरालिंग्विस्टिक्स
         - मुद्रा/आसन :
टेबल पर पैर पसारना [दीवार]/
आगे झुकना/
पीछे टिकना/
कोहनी टेबल पर/
ओंठ बिचकाना/
आँख मिलाना 
- अंगविक्षेप/ जेस्चर :
तेजी से बदलाव : नैनन ही सों बात 
- काकु/ उतार-चढ़ाव :
 फुसफुसाकर/
भर्राई आवाज़/
 जोर से/
 कलपते हुए/
 झल्लाते हुए/
 क्क्क्कक्क्क किरन

8.  भाषा प्रकार्य / फंक्शन्स : हैलिडे
1. साधनपरक INSTRUMENTAL : चाहिए/ चाहता हूँ/ करूँ/ देखूं/ इच्छा है कि...
2. नियंत्रक REGULATORY : देखो, दौड़ो, खाओ, पकड़ो, चलो.
स्वामित्व- दूसरों की चीज़ नहीं छूनी चाहिए.
धमकी – अगर फिर गाली दी तो पीटूंगा.
नियम – सिगरेट पीना मना है.
चेतावनी – घास पर न चलें.
सुझाव- अधिक से अधिक भाषाएँ सीखनी चाहिए
.3. अंतःक्रियात्मक INTERACTIONAL : बातचीत, मज़ाक, हँसी उड़ाना, मनाना, तर्क करना, सहमति-असहमति जताना.
4. व्यक्तिगत PERSONAL : निजता: भाव, विचार, आकांक्षा
5. अन्वेषणात्मक  HEURISTIC : जानना, समझना, प्रश्न-उत्तर
6. कल्पनात्मक IMAGINATIVE : अपनी दुनिया अपना परिवेश – रचना/ कहानी, कविता, अनुमान, प्रतीक
.7. प्रतिनिधानात्मक REPRESENTETIONAL : प्रयोजनमूलक : कार्यालय, विज्ञान, समाचार, विज्ञापन.... 

9.  संस्कृति 
1. मानव के द्वारा सृजन – साहित्य, संगीत, कला, ...
2. भाषा, प्रथा, संस्कार : शिष्टाचार, आचरण, धर्म, सदाचार, मूल्य-व्यवस्था.

 10.  भाषा और संस्कृति
जॉन लायंस : क्योंकि भाषा समाज-संदर्भित होती है, इसलिए भाषा व्यवहार को उस भाषा की विशिष्ट सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में संदर्भित किए बिना स्पष्ट नहीं किया जा सकता . 
लोक संस्कृति : हिंदी/ मणिपुरी/ अरुणाचली/ पंजाबी/ तमिल/ तेलुगु...
धर्म और संस्कृति : हिंदू/ मुस्लिम ....
राष्ट्रीय संस्कृति : भारतीय/ चीनी/ ब्रिटिश......

11.  सर्वनाम प्रयोग
पद, अवस्था और अधिकार का सूचक
आयु और लिंग के अनुसार भी परिवर्तन
परस्पर मेलजोल, घनिष्ठता, भावनात्मक एकता, औपचारिकता का द्योतक
मैं/ हम : रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं और नाम है शहंशाह!
तू/ तुम/ आप : पहले जाँ, फिर जाने जाँ, फिर जाने जानाँ हो गए !
 माँ/ भगवान : माँ! तू कहाँ गई थी? /
हे भगवान! अब तू ही रक्षा कर.
 आप : नाराजगी, व्यंग्य
आदरसूचक [ये] : यह/ये/वह/वे/वो  : ये तो घर पर नहीं हैं./ तुम बड़े वो हो!/

12. रिश्ते-नाते 
विविध स्तर : रक्त संबंध, विवाह संबंध, वंश संबंध
पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन
संयुक्त परिवार
निर्भरता और दायित्व

13.  संबोधन : शिष्टाचार 
औपचारिक संबोधन : स्तर भेद : अपरिचय : स्त्री-पुरुष
आत्मीय संबोधन : कहाँ के हो, भैया?/ गोरखपुर का, अम्मी!/ मेरा बेटा जिंदा होता तो तुम्हारे जैसा ही हुआ होता, भैया! आज तुमने अम्मी कहा तो लगा मेरा बेटा ही पुकार रहा है. [ रामदरश मिश्र, दूसरा घर]
अति आत्मीय संबोधन : पगली/ जी- एजी/ हुज़ूर-सरकार/
जातिपरक संबोधन : मिश्रा जी, मौलवी साहब
व्यवसायपरक संबोधन : मास्टर जी, नेता जी,
प्रथम नाम/ उपनाम

14.  अभिवादन और आशीर्वाद 
चरण स्पर्श/ पालागीप्रणाम/ नमस्ते/ नमस्कार/ दंडवत प्रणाम/ करबद्ध प्रणाम / सलाम
हाथ मिलाना/ आलिंगन : प्यार की झप्पी
आशीर्वाद / सिर सूंघना/ पीठ थपथपाना / सिर छूना
जीते रहो/ चिरंजीवी भव/ पुत्रवती भव/ सौभाग्यवती भव/ विजयी भव/ खुश रहो/ शुभकामना......

 संदर्भ – 
गुर्रमकोंडा, नीरजा : 2015 : अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख : दिल्ली : वाणी

सिंह, दिलीप : 2007 : भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण: दिल्ली : वाणी

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

नेट की तैयारी : ज़रूरी बातें

उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद : द्विदिवसीय कार्यशाला - दूसरा दिन : ऋषभदेव शर्मा  # 25 फरवरी,2016

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-         अर्हता : एम ए – 55% - 28 वर्ष [जे आर एफ]
-         83 विषय – 88 केंद्र – 3 प्रश्नपत्र  - बहुविकल्पी वस्तुनिष्ठ
-         द्वितीय – 100 अंक – 50 x 2 – 1 ½ घंटे
-         तृतीय – १५० अंक – 75 x 2 – 2 ½ घंटे-         NO NEGATIVE MARKING.
 ++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++ 1.         3-4 महीने पहले से तैयारी करें.2.        तृतीय सत्र से ही....3.       नेट के निर्धारित पाठ्यक्रम को परीक्षक की दृष्टि से पढ़ें.4.       पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र/ अभ्यास मालाएं/ MOCK टेस्ट्स – अधिकाधिक ...5.       रटने/उगलने की अपेक्षा अवधारणाओं/ संकल्पनाओं को समझें.6.       पाठ्यक्रम को बहुविकल्पी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के निर्माण की संभावना की दृष्टि से पढ़ें.7.       सतत अभ्यास द्वारा उत्तर देने की अपनी गति सुधारते रहें,8.       और...और...पढ़ें. मुख्य बिंदु नोट करें. सरलता से दोहराने का मानसिक अभ्यास करें. तथ्यों को वर्गीकृत करें.9.       विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करें.
10.    अपनी याददाश्त और एकाग्रता को बढाएं –                                 i.            दोहराएं  :  स्मृति – 24 घंटे में 18% और 1 महीने में 5% शेष.                                ii.            पढने और दोहराने की गति बढाएं.
                              iii.            थकने पर केवल 3 मिनट का विश्राम.
                              iv.            तथ्यों के अंतर्संबंध पहचानकर काल्पनिक चित्र/कथा बनाएं.                               v.            शृंखलाबद्ध करें [ लर्निंग सेक़ुएन्केस].                              vi.            आत्मनिरीक्षण करके अपनी आदतें बदलें.                            vii.            प्रतिदिन कम से कम 6 घंटे स्वाध्याय करें.                           viii.            निरंतरता बनाए रखें.                              ix.            सकारात्मक रहें.-