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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

[पुस्तक] 'कविता के पक्ष में' : अनुक्रमणिका

कविता के पक्ष में 
ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा
आईएसबीएन - 9788179652596
2016

तक्षशिला प्रकाशन,
98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज,
नई दिल्ली - 110002
376 पृष्ठ, सजिल्द
750 रुपए
अनुक्रम

भूमिका 

खंड 1 
गगन मंडल में ऊँधा कूवा 

1. ऐसे मन लै जोगी खेलै : गोरखनाथ 
2. गोरी रत्तउ तुव धरा तूं गोरी अनुरत्त : चंदबरदायी 
3. चु मन तूतिए-हिंदम : अमीर खुसरो 
4. देख-देख राधा रूप अपार : विद्यापति 

खंड 2 
सुरसरि सम सब कहँ हित होई 

1. कहत कबीर सुनो भई साधो! : कबीर 
2. यह तो घर है प्रेम का : कबीर 
3. हम न मरैं मरिहै संसारा : कबीर 
4. खुरासान खसमाना कीआ हिंदुस्तान डराइआ : नानक 
5. नयन जो देखा कँवल भा : जायसी 
6. प्रेम बंध्यो संसार प्रेम परमारथ पैये : सूरदास 
7. सूरदास प्रभु राधामाधव ब्रज बिहार नित नई नई : सूरदास 
8. मातु-पिता जग जाइ तज्यौ : तुलसीदास 
9. बैर न कर काहू सन कोई : तुलसीदास 
10. रामहि केवल प्रेमु पिआरा : तुलसीदास 
11. नहिं दरिद्र सम दुःख जग माहीं : तुलसीदास 
12. मीराँ की हरि पीर मिटे जब वैद साँवरिया होय : मीराँ 
13. यारो, यारी छोड़िए, वे रहीम अब नाहिं : रहीम 

खंड 3  
ज्यों नावक के तीर 

1. भरे भौन में करत हैं, नैनन ही सों बात : बिहारी 
2. न डरौं अरि सौं जब जाइ लरौं : गोबिंद सिंह 

खंड 4 
हम कौन थे, क्या हो गए हैं 

1. पै धन बिदेश चलि जात : भारतेंदु 
2. कवियो! उठो अब तो अहो : मैथिलीशरण गुप्त 
3. कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ : बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ 

खंड 5 
बीती विभावरी जाग री

1. हिमाद्रि तुंग शृंग से : जयशंकर प्रसाद 
2. यह विश्व कर्म रंगस्थल है : जयशंकर प्रसाद 
3. नित्य नूतनता का आनंद : जयशंकर प्रसाद 
4. रँग गई पग-पग धन्य धरा : निराला 
5. वियोगी होगा पहला कवि : सुमित्रानंदन पंत 
6. बालिका मेरी मनोरम मित्र थी : सुमित्रानंदन पंत 
7. ऐसा पक्षी जिसमें हो संपूर्ण संतुलन : पंत 
8. छाया सरस वसंत विपिन में : महादेवी वर्मा 
9. यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है : बच्चन 
10. पीड़ा में आनंद जिसे हो : बच्चन 

खंड 6  
कलम देश की बड़ी शक्ति है 

1. होश करो, दिल्ली के देवो, होश करो : दिनकर 
2. मानवों का मन गले पिघले अनल की धार है : दिनकर 
3. मेरी भी आभा है इसमें : नागार्जुन 
4. काश, मैं भी फूलता, मेरे भाई अनार : केदारनाथ अग्रवाल 
5. भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है : त्रिलोचन 
6. मिट्टी गल जाती पर उसका विश्वास अमर हो जाता है : शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 

खंड 7 
भेद खोलेगी बात ही 

1. लेकिन बहुत सादा सांवलापन : शमशेर 
2. दुःख सबको माँजता है : अज्ञेय 
3. तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब : मुक्तिबोध 
4. केवल थोड़ी-सी हरकत ज़रूरी है : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 
5. जान बूझकर चीखना होगा ज़िंदा रहने के लिए : रघुवीर सहाय 
6. माटी को हक दो : केदारनाथ सिंह 

खंड 8 
भाषा में आदमी होने की तमीज़ 

1. मैं कबीरदास नहीं, दासों का दास कवि हूँ : राजकमल चौधरी 
2. और विपक्ष में सिर्फ कविता है : धूमिल 
3. लिखने का मतलब है नरक से गुज़रना : श्रीकांत वर्मा 
4. मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ : दुष्यंत कुमार 

खंड 9 
आपसे क्या कुछ छिपाएँ 

1. यहाँ आने से पहले अपने जूते बाहर उतार कर आना : राजेश जोशी 
2. शब्द को पत्थर सरीखा आजमाने का समय है : देवराज 
3. इसलिए कि मेरी नाभि में कस्तूरी थी : अरुण कमल 

खंड 10 
‘हम’ भी मुँह में ज़बान रखते हैं 

1. कुर्सी हाय हाय हाय : जगदीश सुधाकर 
2. छाले हैं छालों के भीतर : अनामिका 
3. मेरे शब्द सीख जाएँ असहमति में सिर हिलाना : ओमप्रकाश वाल्मीकि 
4. चाहती हूँ मैं, नगाड़े की तरह बजें मेरे शब्द : निर्मला पुतुल 

बुधवार, 13 जनवरी 2016

[पुस्तक] कविता के पक्ष में







 '' कविता के पक्ष में/ 
ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा/ 
आईएसबीएन -
9788179652596 / 
2016/ 
तक्षशिला प्रकाशन,
 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, 
नई दिल्ली - 110002 / 
376 पृष्ठ, सजिल्द/ 
750 रुपए",





पुस्तक के बारे में 

कविता जीवन के सर्वाधिक निकट स्थापित वह प्रकाशपुंज है, जिससे मनुष्य को सदा संचेतना मिलती रही है. युग जीवन को अपने में समेटना, समय के सत्य को पकड़ना, मनुष्य को बिना किसी लाग-लपेट के संबोधित करना, प्रकाश और उष्णता की संघर्षशील संस्कृति की स्थापना करना और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दायित्व बोध का विकास करके क्रांति की भूमिका तैयार करना – कविता का लोकतांत्रिक दायित्व है. जिस युग की कविता इससे अलग भूमिका स्वीकार कर लेती है, वह युग अव्यवस्था से भर उठता है. ठीक है कि मनोरंजन भी कवि का धर्म है लेकिन गौण.

हिंदी कविता को विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखने पर यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि अनेक उतार चढ़ावों से भरी होने के बावजूद वह हर काल में मानवता की सुरक्षा चट्टान बनकर जीवन मूल्यों की रक्षा करती रही है. ‘’कविता के पक्ष में’’ शीर्षक इस पुस्तक का केंद्रीय विचार हिंदी कविता के इसी जीवन केंद्रित, जन पक्षधर और मूल्यनिष्ठ स्वरूप की पहचान कराना है. तमाम तरह की मृत्यु-घोषणाओं के बावजूद आज भी कविता मनुष्यता की मातृभाषा है और उसके सौंदर्यबोध को परिष्कृत तथा मनोवृत्तियों को उदात्त बनाने का सामर्थ्य रखती है.

एक हजार बरसों से अधिक के हिंदी कविता के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसकी प्राणधारा सूख गई हो. लोक से लगाव ने कभी उसे पूरी तरह निष्प्राण नहीं होने दिया – कभी उसका पाट ग्रीष्म ऋतु की नदी की तरह सिकुड़ भले ही गया हो. उसने कभी अपने चरम लक्ष्य अर्थात मनुष्य को दृष्टि से ओझल नहीं ही होने दिया. निश्चय ही हिंदी कविता की कालजयी प्रासंगिकता  के पक्ष में यही सबसे बड़ा तर्क है. इस पुस्तक में बड़ी सहजता से और बिना किसी वाद-विवाद के, हिंदी कविता की इस केंद्रीय शक्ति को उभारा गया है.

दस खंडों में सुनियोजित रूप से प्रस्तुत यह पुस्तक आदि काल से लेकर आज तक की हिंदी कविता के ऊर्जा-बिंदुओं की पहचान सरल-सुबोध भाषा-शैली में कराती चलती है. पहले खंड में नाथ-सिद्ध साहित्य, रासो साहित्य, लौकिक साहित्य और भक्ति व शृंगार की पूर्वापर परंपरा की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया गया है. आगे की तमाम वस्तुगत और शिल्पगत प्रवृत्तियां इस काल में बीज रूप में दीख जाती हैं जिनके विकास को दूसरे और तीसरे खंडों में क्रमशः भक्ति और रीतिकालीन कवियों के संदर्भ में विवेचित किया गया है.

पुस्तक के चौथे खंड में आधुनिक काल के भारतेंदु और द्विवेदी युग की कविता की नवजागरण जनित प्रवृत्तियों को तथा पांचवें खंड में छायावाद से नाभिनालबद्ध राष्ट्रीय पहचान की खोज की गांधीयुगीन प्रवृत्तियों को रेखांकित करने के लिए इन युगों के प्रतिनिधि कवियों के प्रदेय की पड़ताल की गई है. इसके बाद हिंदी कविता ने प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता, समकालीन कविता, जनपक्षीय कविता और विमर्शीय कविता के जो नए नए अवतार ग्रहण किए उनके सरोकारों की समीक्षा छठे से दसवें खंडों तक की गई है.


इसमें संदेह नहीं कि पाठकों को हिंदी कविता के विकास के विविध चरणों और प्रमुख कवियों के योगदान को समझने के लिए ‘’कविता के पक्ष में’’ बेहद पठनीय और ज़रूरी किताब प्रतीत होगी  क्योंकि इसमें वादमुक्त चिंतन, वस्तुनिष्ठ विवेचन और काव्यभाषा के माध्यम से कविता के मर्म तक पहुँचने का सफल प्रयास निहित है.      


लेखकों के बारे में 




गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

हिंदी की महत्ता और इयत्ता की पहचान कराता ग्रंथ 'हिंदी भाषा के बढ़ते कदम' - प्रो. अरुण

भास्वर भारत 
दिसंबर 2015
पृष्ठ 52-53 


हिंदी की महत्ता और इयत्ता की पहचान कराता ग्रंथ ‘हिंदी भाषा के बढ़ते कदम’
- डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ 

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में वर्षों तक हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में पूर्णतः मनोयोग से समर्पित रहे, चर्चित अक्षर-साधक एवं विद्वान डॉ. ऋषभदेव शर्मा (1957) द्वारा लिखित छह खंडों में सुनियोजित किए गए निबंधों के संग्रह ‘हिंदी भाषा के बढ़ते कदम’ (2015) को मैंने मनोयोगपूर्वक देखा और पढ़ा है. मैं बेझिझक और हार्दिक विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि डॉ ऋषभदेव शर्मा ने अपने इन निबंधों में हिंदी भाषा को लेकर अपना जो सुदीर्घ चिंतन दिया है, वह हिंदी और हिंदी की अस्मिता से जुड़े अनेक प्रश्नों के समाधान तलाशने में जिज्ञासुओं की भरपूर मदद करेगा.

उत्तर भारत के छोटे से कस्बे खतौली, जनपद मुज़फ्फर नगर, उत्तर प्रदेश से लगभग तीन दशक पूर्व, दक्षिण भारत में हिंदी के शिक्षण की अपनी महत्वपूर्ण यात्रा पर निकले, तत्कालीन ‘तेवरी-आंदोलन’ के सूत्रधार, हिंदीसेवी डॉ. ऋषभदेव ने अपने इन निबंधों में उन अनेक भ्रांतियों का तर्कपूर्ण निवारण किया है, जिन्हें उत्तर और दक्षिण भारत में संभवतः ‘राजनैतिक साज़िश’ के तहत निरंतर फैलाया जाता रहा है और हिंदी को फलने-फूलने से रोक जाता रहा है.

‘हिंदी भाषा के बढ़ते कदम’ शीर्षक से लिखे गए इस निबंध संग्रह के कुल 43 निबंधों को लेखक ने छह खंडों में रखा है – (1) 'हिंदी का हिंडोला' खंड में 12 निबंध, (2) 'दखिन पवन बहु धीरे' में 07 निबंध, (3).. 'संप्रेषण की शक्ति' में 10 निबंध, (4) 'भाषा प्रौद्योगिकी' में 06 निबंध, (5) 'संरक्षण के निमित्त' में 04 निबंध, (6) 'भाषा चिंतन' में कुल 04 निबंध. 

इस प्रकार विद्वान लेखक डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने अपने सुदीर्घ अनुभवों और भाषागत-चिंतन को अपने इस ग्रंथ में बड़े ही करीने से संजोया है और उनका यह मूल्यवान ग्रंथ समग्र भारत के उन जिज्ञासुओं की चिंताओं और जिज्ञासाओं का समाधान कर सकेगा, जो राजनैतिक कारणों से फैले भ्रमों के कारण उनके हृदयों में घर कर चुकी हैं. 

इस ग्रंथ के प्रथम खंड ‘हिंदी का हिंडोला’ के सभी बारह निबंधों में डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने 'हिंदी' के ऐतिहासिक और भाषागत महत्व को अपने चिंतन का आधार बनाया है. 'हिंदी भाषा का महत्व: समसामयिक परिप्रेक्ष्य' में लेखक ने अत्यंत कुशलता से सप्रमाण यह सिद्ध किया है कि 'हिंदी' समग्र भारत राष्ट्र में सहज स्वीकार्य भाषा है. वे लिखते हैं “कोई भी भाषा तभी महत्वपूर्ण और सर्वस्वीकार्य होती है, जब वह अपने आपको निरंतर संस्कृति से जोड़ कर नए-नए प्रयोजनों (फंक्शन्स) के अनुरूप अपनी क्षमता प्रमाणित करे. इसमें संदेह नहीं कि हिंदी ने अपना यह सामर्थ्य पिछले दशकों में सिद्ध कर दिखाया है कि वह विश्व मानव के जीवन व्यवहार के समस्त पक्षों को अभिव्यक्त करने वाली सर्वप्रयोजनवाहिनी भाषा है!" (पृष्ठ 20)

अपने ग्रंथ के इसी महत्वपूर्ण खंड के एक अन्य सुंदर और विचारोत्तेजक निबंध ‘जनभाषा की अखिल भारतीयता’ भी मेरी इस धारणा को संपुष्ट करता है और पाठकगण भी इसे पढ़ कर यह अनुभव करेंगे कि विद्वान लेखक हिंदी के 'अखिल भारतीय' महत्व को किस तार्किक दृष्टि से रखते हैं कि सारी की सारी भ्रांतियों का निराकरण स्वतः ही हो जाता है तथा हिंदी के अखिल भारतीय स्वरूप को स्वीकार करने में सहज ही कोई बाधा शेष नहीं बचती. 

इस ग्रंथ का ऐसा ही विचारोत्तेजक और प्रेरक एक निबंध है ‘इंग्लिश हैज़ नो प्लेस’, जिसमे डॉ ऋषभदेव शर्मा ने व्याकरणिक आधार के साथ-साथ अन्य दृष्टियों से भी ‘अंग्रेज़ी’ की असमर्थता और अधूरेपन को उजागर किया है. यह निबंध तो निश्चय ही सबके लिए 'आँखें खोलने वाला' और अनिवार्यतः पढ़ा जाने वाला निबंध है.

डॉ. ऋषभदेव के इस मूल्यवान ग्रंथ का दूसरा खंड ‘दखिन पवन बहु धीरे’ तो निस्संदेह बेहद प्रासंगिक और अर्थवान है, जिसमें उन्होंने जहाँ 'दक्षिण' भारत में हिंदी की स्वीकार्यता और बढ़ते कदमों का प्रामाणिक विवेचन और विश्लेषण किया है, वहीं ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषा-वैज्ञानिक आधारों पर हिंदी तथा दक्षिण भारतीय भाषाओं के अंतर-संबंधों को भी बखूबी परखने का प्रयास किया है. दक्खिनी हिंदी की भाषिक और साहित्यिक उपलब्धि की विवेचना करने वाले निबंध इस खंड को दस्तावेजी महत्व प्रदान करते हैं.

इस निबंध संग्रह के तीसरे खंड ‘संप्रेषण की शक्ति’ में संकलित निबंधों में जहाँ हिंदी की ‘प्राण-शक्ति’ अर्थात "सम्प्रेषण-शक्ति" की विवेचना हुई है, वहीं आधुनिक दृष्टि और वैश्विक परिदृश्य के अनुसार हिंदी की उपयोगिता को रेखांकित करने का सजग प्रयास देखा जा सकता है. इस खंड के सभी निबंधों में हिंदी को वर्तमान "बाज़ारवाद" के सन्दर्भ में देखने का जो प्रयास किया गया है, उसके आधार पर डॉ ऋषभ देव शर्मा का यह कार्य स्तुत्य ही माना जाएगा, क्योंकि इन निबंधों से हिंदी को 'कंप्यूटर' के साथ-साथ, आधुनिकतम संचार माध्यमों के लिए 'सक्षम' सिद्ध करने में वे नितांत सफल रहे हैं. मैं तो दावे से कह सकता हूँ कि इस खंड के निबंधों को पढ़ कर आज के तथाकथित 'कम्प्यूटरविद' भी हिंदी के मुरीद हो जाएंगे. ‘बाज़ार-दोस्त भाषा हिंदी’ शीर्षक से लिखा गया निबंध विशेष उल्लेखनीय है, चूंकि इस में अनेक भ्रांतियों का सप्रमाण समाधान लेखक ने किया है - "हिंदी भी नए व्यावसायिक प्रयोजन के रूप में उपस्थित विज्ञापन की चुनौती के अनुरूप नए रूप में निखर कर ऊपर उठ आई है और इस तरह उसने स्वयं को बाज़ार-दोस्त भाषा सिद्ध कर दिया है!"(पृष्ठ 184). इस संदर्भ में डॉ. ऋषभदेव ने पृष्ठ. 186 से 189 तक कई प्रकार के लोकप्रिय विज्ञापनों की भाषा का विश्लेषण करके अपनी बात को प्रमाणित भी किया है.

‘हिंदी भाषा के बढ़ते कदम’ ग्रंथ के चौथे खंड ‘भाषा प्रौद्योगिकी’ के सभी छह निबंधों को मैं लेखक की सारगर्भित सोच के साथ-साथ चुनौती भरा प्रयास भी मानता हूँ, क्योंकि इन निबंधों में लेखक सर्वथा कई नई और विलक्षण स्थापनाएं देता है. 'हिंदी में वैज्ञानिक लेखन की परंपरा' के बाद ‘प्रौद्योगिकी और हिंदी’ शीर्षक से लिखे निबंध में डॉ ऋषभ देव वर्मान युग की प्रबलतम चुनौती को स्वीकार करते हैं. उनका निष्कर्ष आज सबको स्वीकार्य है- "इसमें संदेह नहीं कि यूनिकोड की सुविधा प्राप्त होने के बाद अब इंटरनेट और उस से जुड़े विविध कार्यक्षेत्रों में पूर्ण क्षमतापूर्वक हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि का प्रयोग विस्तार पा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फिल्म उद्योग, विज्ञापन उद्योग, मोबाइल, लैपटॉप, आई-पॉड, टेबलेट और सोशल मीडिया तक हिंदी की बहार आ रही है!" (पृष्ठ 129 -130)

डॉ ऋषभदेव के इस ग्रन्थ का पांचवां खंड ‘संरक्षण के निमित्त’ निस्संदेह आज के संदर्भों में बेहद प्रासंगिक हो गया है. जिस प्रकार राजनेता और शासन-प्रशासन में हिंदी की उपेक्षा हम ने निरंतर देखी है, तब तो ये निबंध और भी आवश्यक लगते हैं. "भाषा की मर्यादा की रक्षा के लिए" निबंध सचमुच आज पूरे समाज के लिए चुनौती ही प्रस्तुत करता है- "हिंदी भाषा के उज्ज्वल स्वरूप का भान कराने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी गुणवत्ता, क्षमता, शिल्प-कौशल और सौंदर्य का सही-सही आकलन किया जाए." (पृष्ठ 259)

‘हिंदी भाषा के बढ़ते कदम’ के अंतिम छठे खंड के चार निबंध ‘भाषा चिंतन’ के रूप में डॉ. ऋषभदेव शर्मा के सुदीर्घ अध्यापन और अध्ययन के विस्तृत अनुभवों का निचोड़ ही है. इन निबंधों में कृष्णा सोबती, आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया के भाषा चिंतन को आधार बना कर उन्होंने हिंदी भाषा की समृद्धि के साथ-साथ व्यापक संप्रेषण-शक्ति को भी सप्रमाण सिद्ध कर दिया है!

अंत में इस ग्रंथ की भूमिका के लेखक, दक्षिण भारत में हिंदी की ध्वजा को निरंतर ऊँचा रखने वाले विद्वान डॉ एम. वेंकटेश्वर के शब्दों से मैं अपनी सहमति व्यक्त करना चाहूँगा- "लेखक की प्रस्तुत रचना भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के गंभीर अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है!" 

मुझे पूर्ण आशा और विश्वास है कि डॉ ऋषभ देव शर्मा के इन सुचिंतित निबंधों का हिंदी-जगत में भरपूर स्वागत होगा और इनसे हिंदी की अभिवृद्धि भी निश्चित रूप से होगी. मैं अपनी हार्दिक मंगल कामनाओं के साथ डॉ. ऋषभदेव शर्मा का अभिनंदन करता हूँ!

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हिंदी भाषा के बढ़ते कदम/ लेखक : डॉ. ऋषभदेव शर्मा/ प्रकाशक : तेज प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली/ 2015/ पृष्ठ. 304/ मूल्य 650 रु. 

डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ 
पूर्व प्राचार्य एवं हिंदी विभागाध्यक्ष
74/3, न्यू नेहरू नगर
रूड़की-247667 
मोबाइल : 09412070351
ईमेल : ynarun@gmail.com

[भास्वर भारत] अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख


भास्वर भारत / दिसंबर 2015 / पृष्ठ 52-53

पुस्तक समीक्षा : ऋषभदेव शर्मा

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख

मनुष्यों द्वारा विचारों और मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के शास्त्र को भाषाविज्ञान कहा जाता है. सामान्य भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा के उद्भव और विकास पर विचार किया जाता है. सैद्धांतिक भाषाविज्ञान भाषा अध्ययन और विश्लेषण के लिए सिद्धांत प्रदान करता है. वह मूलतः इस प्रश्न पर विचार करता है कि भाषा क्या है और किन तत्वों से बनी हुई है. इसके चार क्षेत्र हैं – ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, वाक्य विज्ञान और अर्थ विज्ञान. आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भाषाविज्ञान सैद्धांतिकी से आगे बढ़कर विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयुक्त हो रहा है और भाषा-उपभोक्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान विकसित हुआ है. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा शिक्षण, शैलीविज्ञान, कोशविज्ञान, भाषा नियोजन, वाक् चिकित्सा विज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, अनुवादविज्ञान आदि अनुप्रयोग के क्षेत्र शामिल हैं. हिंदी में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संक्रियात्मक भूमिका पर केंद्रित गंभीर पुस्तकों का लगभग अभाव-सा है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (1975) की पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ (2015) इस अभाव की पूर्ति का सार्थक प्रयास प्रतीत होती है.



‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ में कुल 29 अध्याय हैं जो इन 7 खंडों में विधिवत संजोए गए हैं – अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषा शिक्षण, अनुवाद विमर्श, साहित्य पाठ विमर्श (शैलिवैज्ञानिक विश्लेषण), प्रयोजनमूलक भाषा, समाजभाषिकी और भाषा विमर्श में अनुप्रयोग. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अग्रणी विद्वान प्रो. दिलीप सिंह का निम्नलिखित कथन इस पुस्तक की प्रामाणिकता का सबसे अधिक विश्वसनीय प्रमाणपत्र है – 
“पुस्तक का प्रत्येक खंड एवं संबद्ध आलेख बड़ी ही तन्मयता के साथ लिखे गए हैं. इस तन्मयता का ही परिणाम है कि हिंदी भाषा के साहित्यिक और साहित्येतर पाठों के विश्लेषण में यह सफल हो सकी है और इस तथ्य को उजागर कर सकी है कि कोई भी भाषा (इस अध्ययन में हिंदी भाषा) अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों और प्रयोजनों में अलग-अलग ढंग से बरती ही नहीं जाती, बल्कि भिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होते समय अपनी अकूत अभिव्यंजनात्मक क्षमता को भी अलग-अलग संरचनाओं में ढाल कर अलग-अलग तरीकों से सिद्ध करती है.”

लेखिका ने पहले खंड में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के स्वरूप और क्षेत्र पर सैद्धांतिक चर्चा की है. इसके बाद दूसरे खंड में मातृभाषा, द्वितीय भाषा और अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर चर्चा की है. तीसरे खंड में अनुवाद सिद्धांत, अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन पर सोदाहरण प्रकाश डाला गया है. पुस्तक का चौथा खंड साहित्यिक पाठ विमर्श के लिए शैलीविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाता है. यहाँ एक निबंधकार (प्रताप नारायण मिश्र), एक उपन्यासकार (प्रेमचंद) और दो कवियों (शमशेर तथा अज्ञेय) के साहित्यिक पाठ निर्माण, बनावट और बुनावट का विश्लेषण किया गया है. यह खंड पाठ विश्लेषण के क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए विशेष उपयोगी है. पाँचवे खंड में अखबारों से लेकर टीवी तक विविध संचार माध्यमों द्वारा समाचार से लेकर प्रचार तक के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली हिंदी भाषा के लोच भरे गंभीर और आकर्षक रूप की सोदाहरण मीमांसा की गई है. इसके पश्चात छठा खंड समाजभाषाविज्ञान पर केंद्रित है. जहाँ एक ओर तो सर्वनाम, नाते-रिश्ते की शब्दावली, शिष्टाचार, अभिवादन और संबोधन शब्दावली पर हिंदी भाषासमाज के संदर्भ में तथ्यपूर्ण विमर्श शामिल है तथा दूसरी ओर दलित आत्मकथाओं और स्त्री विमर्शीय लेखन की भी गहन पड़ताल की गई है. यह खंड साहित्य पाठ विमर्श वाले खंड के साथ मिलकर पाठ विश्लेषण के विविध प्रारूप सामने रखता है. पुस्तक का अंतिम खंड है – ‘भाषाविमर्श में अनुप्रयोग’. यहाँ विदुषी लेखिका ने महात्मा गांधी, प्रेमचंद, अज्ञेय, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, विद्यानिवास मिश्र और दिलीप सिंह जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों के भाषाविमर्श पर सूक्ष्म विचार-विमर्श किया है. इतना ही नहीं यह खंड इन भाषाचिंतकों के भाषाविमर्श की केंद्रीय प्रवृत्तियों को भी रेखांकित करता है. लेखिका ने प्रमाणित किया है कि महात्मा गांधी के भाषाविमर्श के केंद्र में संपर्कभाषा या राष्ट्रभाषा का विचार है, प्रेमचंद के भाषाविमर्श में सर्वाधिक बल हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी जैसी साहित्यिक शैलियों के रचनात्मक समन्वय पर है तो अज्ञेय का भाषाविमर्श उनकी साहित्यिक शैली के प्रति जागरूकता के इर्दगिर्द निर्मित होता है. प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव को डॉ. जी. नीरजा ने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के सजग प्रहरी सिद्ध किया है तो विद्यानिवास मिश्र को आधुनिक भाषाशास्त्रीय चिंतन की पीठिका का भारतीय संदर्भ खड़ा करने का श्रेय दिया है. उनके अनुसार दिलीप सिंह का भाषाविमर्श अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संपूर्ण पड़ताल के लिए कटिबद्ध और प्रतिबद्ध है. उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक प्रो. दिलीप सिंह को ही समर्पित भी है. 

अंत में, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन विभाग के आचार्य डॉ. देवराज के शब्दों में यह कहना समीचीन होगा कि “डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर भरपूर सामग्री तैयार की है जो अन्य लोगों के लिए रचनात्मक स्तर पर चुनौती बना हुआ है. उनकी अध्ययनशीलता और संकल्पशीलता के लिए मेरी शुभकामनाएँ!”

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अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख/ गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2015/ वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली/ पृष्ठ - 304/ मूल्य – रु. 495/- 

- प्रो. ऋषभदेव शर्मा 
(पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा)

208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स
गणेश नगर, रामंतापुर 
हैदराबाद – 500013
मोबाइल – 08121435033
ईमेल – rishabhadeosharma@yahoo.com