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बुधवार, 21 मार्च 2018

(भूमिका) इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यास : विविध विमर्श



उपन्यास को आधुनिक युग का महाकाव्य कहा जाता है. इसका कारण यह है कि इस विधा में महाकाव्य की भाँति संपूर्ण जीवन को समेटने तथा भूत, भविष्य और वर्तमान को एक साथ संबोधित करने की महती संभावनाएँ निहित हैं. यही कारण है कि आधुनिक उपन्यास से हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि वह समकालीन जीवन और जगत की तमाम स्थूल हलचलों और सूक्ष्म धड़कनों को एक साथ समेट कर चले और साथ ही अपनी विश्वदृष्टि द्वारा यथार्थ को लोक मंगलकारी स्वरूप भी प्रदान करे. हम उपन्यासकार से आज यह अपेक्षा करते हैं कि वह हमारे संसार को हमारी नजर से देखे और औरों को दिखाए. उससे यह भी उम्मीद की जाती है कि वह वैचारिक ही नहीं, वास्तविक धरातल पर हमारे साथ खड़ा हुआ और सक्रिय दिखाई दे. 


इक्कीसवीं सदी का हिंदी उपन्यासकार अपनी रचना से की जाने वाली इन महाकाव्यात्मक अपेक्षाओं से भली प्रकार परिचित है और इनके प्रति जागरूक भी. हमारा उपन्यास अब काल्पनिक आदर्श के युग से बहुत आगे निकल चुका है. वह इस वास्तविक दुनिया की सच्चाइयों को उन लोगों के साथ खड़ा होकर भोगता और बखान करता है जो सदियों कथा-रचना के पात्र तो रहे, लेकिन उत्तम पुरुष के रूप में नहीं बल्कि अन्य पुरुष के रूप में. पिछले कुछ दशकों में उपन्यास रचना का अवलोकन वृत्त देश-दुनिया के पारंपरिक नाभिकों से हटकर उस हाशिए पर आया है जहाँ वे तमाम लोग, मुद्दे या समुदाय विद्यमान हैं जिन्हें शताब्दियों तक सभ्यता-विकास के आपाधापी भरे युगों में उपेक्षित रखा गया या कहा जाए कि निरंतर उपस्थित होते हुए भी अनुपस्थित बने रहने के लिए विवश किया गया. आज बदले हुए समय में ये लोग, मुद्दे और समुदाय अपनी उपस्थिति को जोरदार ढंग से रेखांकित कर रहे हैं और अपनी लोकतांत्रिक अस्मिता को पुन: प्रतिष्ठित कर रहे हैं. इससे साहित्य और संस्कृति की पहले से चली आ रही परिभाषाएँ और व्याख्याएँ काफी हद तक निरस्त हुई हैं या बदल गई हैं. मूल्यों को भी अब एकवचनीय केंद्र के स्थान पर बहुवचनीय हाशिए के मानवीय कोण से पुनःपारिभाषित किया जा रहा है; प्राथमिकताओं में बदलाव दृष्टिगोचर हो रहा है. 


डॉ. साहेबहुसैन जहागीरदार ने अपने प्रस्तुत ग्रंथ ‘‘इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यास : विविध विमर्श’’ में बहुत गहराई से हिंदी उपन्यास के चरित्र में आए हुए इस सकारात्मक परिवर्तन के विविध आयामों को रेखांकित किया है. उन्होंने हाशियाकृत विविध समुदायों और मुद्दों के उभार को विविध विमर्शों के रूप में पहचाना है. वे अत्यंत विस्तार से वर्तमान शताब्दी के आरंभिक डेढ़ दशक की गतिविधि और मानसिकता का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तथा देशकाल के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने वाले इक्कीसवीं सदी के उन उपन्यासों की ईमानदारी से निशानदेही करते हैं जिन्होंने विभिन्न हाशियाकृत समुदायों के अस्मिता-संघर्ष को धारदार अभिव्यक्ति प्रदान की है. इसके लिए वे विमर्श के अलग-अलग आधार निर्धारित करते हैं और दर्शाते हैं कि इस कालावधि के उपन्यासकार उत्तम पुरुष के रूप में आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, वृद्ध नागरिकों और पर्यावरण की समस्याओं साहित्य की दुनिया के केंद्र में प्रामाणिकता के साथ और प्रायः इनसाइडर के रूप में स्थापित करने में सफल रहे हैं. निस्संदेह. विमर्श के आयाम और भी हैं लेकिन या तो उनकी अन्य अनेक स्थलों पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है अतः लेखक ने उनके पिष्टपेषण से बचना चाहा है, या फिर अभी कुछ नए विमर्श क्रमशः रूपाकार ग्रहण कर रहे हैं और उनकी पड़ताल से पहले उन्हें और थोड़ा समय दिए जाने की जरूरत है. 


अंत में, मैं यह कहना आवश्यक समझता हूँ कि डॉ. साहेबहुसैन जहागीरदार स्वयं एक सक्रिय कार्यकर्ता हैं - साहित्यिक विमर्शकार से पहले. इसलिए उनका यह अध्ययन=अनुशीलन ‘रहा किनारे बैठ’ वाला नहीं बल्कि ‘गहरे पानी पैठ’ वाला है. वे केवल साक्षी-भाव से आलोचना करने वाले नहीं हैं, भोक्ता-भाव से विमर्श को जीने वाले हैं उनकी यह संलग्नता इस अध्ययन को एक विशिष्ट एवं निजी व्यक्तित्व प्रदान करती है. मुझे विश्वास है कि हिंदी जगत उनके इस वैशिष्ट्य और निजत्व को पहचानेगा और इस कृति तथा कृतिकार को प्रेमपूर्वक अपनाएगा, सराहेगा. 

शुभकामनाओं सहित ...

युगादि-2075 वि./ 18.3.2018                                                                           - ऋषभदेव शर्मा 

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, एरणाकुलम और हैदराबाद केंद्र. आवास: 208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतपुर, हैदराबाद-500013. ईमेल: rishabhadeosharma@yahoo.com

तुलनात्मक भारतीय साहित्य : अवधारणा और मूल्य


प्रो. ऋषभदेव शर्मा के कक्षा-व्याख्यानों के आधार पर डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा लिप्यंकित


तुलनात्मक भारतीय साहित्य : अवधारणा और मूल्य 

- प्रो. ऋषभदेव शर्मा 


[1]

सामान्य साहित्य


तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन करते समय तीन परस्पर निकटस्थ अवधारणाओं से टकराना पड़ता है. ये हैं – राष्ट्रीय साहित्य (National Literature), विश्व साहित्य (World Literature) और सामान्य साहित्य (General Literature). प्रो. इंद्रनाथ चौधुरी ने ‘तुलनात्मक साहित्य की भूमिका’ में इन अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए तुलनात्मक साहित्य और सामान्य साहित्य के संबंध पर सम्यक प्रकाश डाला है. 


साधारण रूप से सामान्य साहित्य का अर्थ हम किसी भी साहित्य के प्रचलित स्वरूप से लगा सकते हैं. परंतु यहाँ यह एक पारिभाषिक पद के रूप में व्यवहृत है जिसकी अलग अलग विद्वानों ने अलग अलग परिभाषाएँ दी हैं. जैसे – सामान्य साहित्य का प्रारंभिक अर्थ था काव्यशास्त्र या साहित्य सिद्धांत का अध्ययन. जेम्स मांटुगमरी ने 1833 में सामान्य साहित्य पर भाषण देते हुए इसके अंतर्गत काव्यशास्त्र अथवा सामान्य सिद्धांत पर ही चर्चा की थी. इसे प्रकार इरविन कोपेन ने तो स्पष्ट कहा है कि सामान्य साहित्य मूलतः साहित्य सिद्धांत ही है. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए हार्स्ट फ्रेंज़ ने कहा ही कि सामान्य साहित्य से तात्पर्य है साहित्यिक प्रवृत्तियों, समस्याओं एवं सिद्धांतों का सामान्य अध्ययन अथवा सौंदर्यशास्त्र का अध्ययन. यहाँ यह बात स्मरणीय है कि तुलनात्मक साहित्य भी साहित्य सिद्धांत अथवा काव्यशास्त्र का भी अध्ययन करता है. मगर उसके अध्ययन की पद्धति तुलनात्मक होती है जबकि सामान्य साहित्य इस प्रकार की किसी पद्धति का निर्धारण नहीं करता. 


दरअसल ‘सामान्य साहित्य’ पद का प्रयोग कुछ पाठ्यक्रमों में परस्पर अंतर को दर्शाने के लिए किया जाता रहा है. जैसे कि, अमेरिका में सामान्य साहित्य का प्रयोग उन विदेशी साहित्य के पाठ्यक्रमों या प्रकाशनों के लिए किया जाता है जो या तो अंग्रेज़ी अनुवादों में उपलब्ध हैं या राष्ट्रीय साहित्य के पाठ्यक्रमों के अंतर्गत स्वतंत्र अध्ययन के विषय हैं. कभी कभी अनेक साहित्यों की कृतियों के संग्रह, आलोचनात्मक अध्ययन या विवरण को भी इस वर्ग में स्थान दिया जाता है. परंतु लगभग ऐसी ही विषयों के लिए अलग अलग संदर्भों में तुलनात्मक साहित्य और विश्व साहित्य जैसे नामकरण भी कम में लिए जाते हैं. अतः कहना होगा कि सामान्य साहित्य की अवधारणा बहुत स्पष्ट नहीं है. रेनेवेलक ने भी इसे अयुक्तियुक्त और अव्यावहारिक माना है. वान्टिग्हेम ने तुलनात्मक और सामान्य साहित्य का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा है कि तुलनात्मक साहित्य दो साहित्यों के आपसी संबंधों के अध्ययन तक सीमित है जबकि सामान्य साहित्य का संबंध उन आंदोलनों और फैशनों से है जो अनेक साहित्यों में विद्यमान दिखाई देते हैं. इसमें संदेह नहीं कि यह अंतर भी बहुत सूक्ष्म अंतर है और इन दोनों प्रकार के साहित्यों की सीमाएँ एक-दूसरे पर अपनी छाया अवश्य डालती हैं. 


अंततः क्रेग के निम्नलिखित मत को यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा कि – “राष्ट्रीय साहित्य की चारदीवारी के भीतर जो अध्ययन है वह राष्ट्रीय साहित्य है और इस चारदीवारी के परे साहित्य का अध्ययन तुलनात्मक साहित्य है तथा दीवारों के ऊपर जो साहित्यिक अध्ययन है वह सामान्य साहित्य है.” 


जैसा कि, प्रो .चौधुरी ने कहा है कि पता नहीं इस प्रकार के सीमा निर्धारण से इनमें अंतर निश्चित होता पाता है या नहीं परंतु इनके पारस्परिक संबंध अपने आप में बहुत स्पष्ट है. 


[2]

राष्ट्रीय साहित्य


मनुष्य मात्र की भावनाओं, राग-विराग और संवेदनशीलता की समानता के आधार पर यह माना जाता है कि मनुष्य जाति की एक समेकित संस्कृति है. इस समेकित संस्कृति का निर्माण करने के लिए अलग-अलग देशकाल में मनुष्यों के समूहों ने जो अलग-अलग प्रयत्न किए, साधनाएँ कीं उनका समेकित रूप ‘विश्व संस्कृति’ है और यह उन मानव समूहों के अपने अपने साहित्यों के माध्यम से व्यक्त होती है. इन अलग अलग देशकाल में रचित साहित्यों के समेकित रूप का नाम ही ‘विश्व साहित्य’ है. स्मरणीय है कि अलग अलग देशकाल और जाति समूहों से संबंधित होते हुए भी अपनी मूल संवेदना में ये सारे साहित्य परस्पर अविरोधी होते हैं क्योंकि ये संबंधित जातियों के, मनुष्यों के सांस्कृतिक प्रयत्न है. इसी प्रकार किसी राष्ट्र के अलग अलग भाषा-भाषी समुदायों द्वारा अपनी संस्कृति के उत्थान और अभिव्यक्तीकरण के क्रम में रचे गए भिन्न भिन्न भाषाओं के साहित्य का समेकित रूप उस देश का ‘राष्ट्रीय साहित्य’ होता है. हम यह भी कह सकते हैं कि राष्ट्रीय साहित्य भिन्न भिन्न भाषाओं में रचे जाने के बावजूद उस राष्ट्र की सामासिक पहचान को व्यक्त करता है और विश्व साहित्य अलग अलग राष्ट्रों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों में निहित समग्र मानव चेतना का सम्पुंजन होता है. राष्ट्रीयता और वैश्विकता यहाँ परस्पर पूरक भाव से जुड़ी होती हैं, अविरोधी होती हैं अतः विश्व साहित्य, साहित्य के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र को संभव कर दिखाता है. जहाँ विभिन्न राष्ट्रीय अस्मिताएँ विश्व नागरिक की भाँति एक-दूसरे के साथ अस्तित्व में रहती हैं. 


यहाँ प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का यह कथन द्रष्टव्य है कि “भारत एक बहुभाषी देश है. यहाँ न केवल 1652 मातृभाषाएँ हैं अपितु अनेक समुन्नत साहित्यिक भाषाएँ भी हैं. पर जिस प्रकार अनेक वर्षों के आपसी संपर्क और सामाजिक द्विभाषिकता के कारण भारतीय भाषाएँ अपनी रूप रचना में भिन्न होते हुए भी आर्थी संरचना में समरूप हैं, उसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि अपने जातीय इतिहास, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक मूल्य एवं साहित्यिक संरचना के संदर्भ में भारतीय साहित्य एक है, भले ही वह विभिन्न भाषाओं के अभिव्यक्ति माध्यम द्वारा व्यक्त हुआ है.” यदि इस संकल्पना का आगे विस्तार करें और भाषा भेद की सीमा को तोड़कर मनुष्य के इतिहास और विकास के देखने का प्रयत्न करें तो विश्व साहित्य की अवधारणा सामने आती है. वास्तव में प्रत्येक भाषा के साहित्य की विषय वस्तु और रूप अभिव्यक्ति एवं उसकी मूल्य चेतना और विधा निरूपण के इतिहास का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी हुआ करता है जो उसे क्रमशः राष्ट्रीय साहित्य और विश्व साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करता है. 


वस्तुतः राष्ट्रीय साहित्य द्वारा तुलनात्मक साहित्य का आधार तैयार होता है. इसे यों भी कह सकते हैं कि तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही राष्ट्रीय साहित्य और उसमें निहित राष्ट्रीयता की तत्वों की पहचान की जा सकती है. इसीलिए आर. ए. साइसी ने तुलनात्मक साहित्य को ‘विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यों का एक-दूसरे से आश्रय से तुलनात्मक संबंधों का अध्ययन’ कहा है. इसी प्रकार गोयते ने विश्व साहित्य के संदर्भ में अपनी साहित्यिक परंपराओं से इतर दूसरी परंपराओं के बोध को अनिवार्य माना है. ऐसा करने से विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे को पहचान या समझ सकते हैं तथा अगर एक-दूसरे से प्रेम न भी कर सकें तो कम-से-कम एक-दूसरे को बर्दाश्त करना तो सीख सकते हैं. वास्तव में आपसी पहचान आदान-प्रदान द्वारा राष्ट्रीय साहित्य अपनी विलक्षणता को बनाए रख सकता है. 


जैसा कि, पहले भी कहा गया भारत जैसे बहुभाषी देश में राष्ट्रीय साहित्य का अर्थ है विभिन्न भाषाओं में राष्ट्रीय संस्कृति और मूल्यों की अभिव्यक्ति. इसके लिए तुलनात्मक पद्धति का सहारा लिया जाता है. और यह भी देखा जाता है कि किसी साहित्यिक कृति को दूसरे भाषा भाषियों द्वारा किस प्रकार ग्रहण किया जाता है. या कोई एक साहित्य दूसरे साहित्य पर किस प्रकार प्रभाव डालता है. उदाहरण के लिए, हम बंगला और तेलुगु के संबंध की चर्चा कर सकते है. बंगला के कथा साहित्य को तेलुगु में इतनी सहजता से ग्रहण किया जाता है कि बहुत से पाठक तो शरत को बंगला के बजाए तेलुगु का ही साहित्यकार समझते हैं. रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्य ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य पर जो प्रभाव डाला वह भी भारत के राष्ट्रीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण भाग है. इसी प्रकार बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर के चिंतन से प्रभावित होकर जब मराठी में दलित साहित्य का उदय हुआ तो उसका प्रभाव तेलुगु, हिंदी, उर्दू, पंजबी यहाँ तक की समकालीन संस्कृत साहित्य पर भी पड़ा – यह भारतीय साहित्य की समस्वरता का द्योतक है. इतना ही नहीं अलग अलग प्रांत की प्रबुद्ध महिलाओं ने अलग अलग भाषाओं में भले ही स्वयं को अलग अलग प्रकार से अभिव्यक्त किया हो लेकिन स्त्री विमर्श आज किसी एक भाषा के साहित्य की प्रवृत्ति न होकर भारतीय साहित्य की समेकित प्रवृत्ति है. ओल्गा और घंटसाला निर्मला भले ही तेलुगु की कवयित्रियाँ हों, अनामिका और कात्यायिनी हिंदी की हों, निर्मला पुतुल संताली की हों, दर्शन कौर और तरन्नुम रियाज़ पंजाबी की हों – इन सबके द्वारा स्त्री की यातना का चित्रण एक जैसा है और समग्रतः भारतीय स्त्री की यातना का द्योतक है. यह समरसता ही इस तमाम स्त्री विमर्श को भारतीय साहित्य का हिस्सा बनाती है. 


इसी प्रकार विभिन्न भाषाओं के साहित्य में प्रयुक्त अंतरवस्तु, मोटिफ, मिथक और काव्य सौंदर्य के उपकरण भी मिलकर किसी देश की राष्ट्रीय साहित्य का रूप निर्धारण करते हैं. अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीय साहित्य किसी राष्ट्र की किसी एक भाषा का नहीं बल्कि उसकी विभिन्न भाषाओं के उस साहित्य का सामासिक रूप होता है जिसमें उसके नागरिकों की सांस्कृतिक चेतना और एक समान संवेदना प्रतिबिंबित होती है. यहाँ हम भारतीय साहित्य के संदर्भ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के एक काव्यांश को देख सकते हैं जिसमें प्रकारांतर से भारत के राष्ट्रीय साहित्य की पहचान का सूत्र दिया गया है - 

“भारत नहीं स्थान का वाचक,
गुण-विशेष नर का है,
एक देश का नहीं,
शील वह भूमंडल भर का है.
जहाँ कहीं एकता अखंडित,
जहाँ प्रेम का स्वर है
देश देश में वहाँ खड़ा
जीवित भारत भास्वर है.”   [दिनकर]


[3]

विश्व साहित्य


दरअसल, विश्व साहित्य की अवधारणा का आधार आरंभ में यूरोप का दृष्टिकोण रहा जिसके अनुसार विश्व साहित्य का प्रारंभिक अर्थ यूरोपीय साहित्य तक सीमित था. गोयते ने भी ‘वेल्ट लित्रातुर’ पद का प्रयोग इसी अर्थ में किया था. इसमें संदेह नहीं कि यह अर्थ अत्यंत सीमित था और आज इसे स्वीकार नहीं किया जाता. 


20 वीं शताब्दी में विश्व साहित्य के अर्थ में क्रांतिकारी परिवर्तन आया. विश्व के बारे में जो यूरोप केंद्रित जातिगत विशिष्ट अवधारणा थी, उसके अर्थ में एक खास तरह की व्यापकता आई. इस प्रकार विश्व साहित्य का दायरा यूरोप के बाहर तक फ़ैला और उसके अंतर्गत विश्व के दूसरे क्षेत्रों के साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन को स्थान दिया गया. अब विश्व साहित्य का तात्पर्य है – पृथ्वी के किसी भी साहित्य का अध्ययन. अर्थात सार्वभौमिक स्तर पर साहित्य के इतिहास को ही विश्व साहित्य माना जाता है. प्रो.इंद्रनाथ चौधुरी ने लिखा है कि ‘विश्व साहित्य के इतिहास विषयक ग्रंथों में विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यों को विभिन्न माध्यमों में बाँट कर या एक-दूसरे के सान्निध्य में रखकर अध्ययन किया जाता है. या फिर विश्व साहित्य के विभिन्न आंदोलनों, प्रवृत्तियों या कालों का विवरण देते हुए विश्लेषण होता है.’ जे. ब्रांट कॉर्स्टियस (J. Brandt Corstius) ने इस प्रकार रचे गए विश्व साहित्य के इतिहास की संभावनाओं और सीमाओं का विस्तार से विवेचन किया है. स्पष्ट है कि विश्व साहित्य बड़ी सीमा तक राष्ट्रीय साहित्यों का समूह है अतः इसमें राष्ट्र अथवा देश का तत्व जुड़ा रहता है. कहना न होगा कि इस तत्व के कारण ही विश्व साहित्य की तुलनात्मक दृष्टि का विकास होता है और वे बिंदु उभरते हैं जो विभिन्न राष्ट्रों के साहित्यों में व्यक्त होने वाली मानव जाति की एक जैसी चिंताओं को दर्शित है. 


विश्व साहित्य का एक अर्थ यह भी है कि केवल देश ही नहीं ‘काल’ के संदर्भ में भी जो महान है अर्थात काल की कसौटी पर जिसकी श्रेष्ठता सिद्ध हो चुकी है वह कालजयी और श्रेष्ठ साहित्य विश्व साहित्य है. जैसे ‘डिवाइन कॉमेडी’, ‘डान कोहटे’, ‘पैराडाइज लॉस्ट’, ‘अभिज्ञान शाकुंतल’, ‘कुमार संभव’ आदि की श्रेष्ठता देश और काल से ऊपर है. अतः ये अपने अपने राष्ट्र और भाषा की महान कृतियाँ तो है ही. विश्व साहित्य का भी अमर धरोहर हैं. इतना ही नहीं वर्तमान में भी जिन रचनाओं को अपने राष्ट्र के परिधि के बाहर प्रसिद्धि प्राप्त होती है उन्हें भी विश्व साहित्य के अंतर्गत गिना जाता है. परंतु यह विश्व साहित्य का गौण अर्थ है. विश्व साहित्य का मुख्य स्वरूप तो समस्त राष्ट्रों के साहित्य के समुच्चय द्वारा ही प्रकट होता है. 


फ्रिट्ज स्टाइच के अनुसार विश्व साहित्य के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं – 

- अपने राष्ट्रीय साहित्य की परंपरा के साथ ही दूसरे राष्ट्रीय साहित्यों की परंपराओं से परिचित होना.
- दूसरे देशों या भाषाओं में लिखित साहित्य के प्रति खुलापन रखना.
-  विभिन्न साहित्यों में परस्पर आदान-प्रदान का अवसर देना. 

विश्व साहित्य के इस स्वरूप के अंतर्गत प्रकाशित ग्रंथों के शीर्षकों की सहायता से भी समझा जा सकता है. जैसे - लेयार्ड द्वारा संपादित ‘The World Through Literature’ और ‘रिप्ले’ द्वारा संपादित ‘Dictionary of World Literature’ अथवा ‘ Encyclopaedia of Literature’ में भी विश्व साहित्य की यही संकल्पना स्वीकार की गई है. तुलनात्मक साहित्य की पद्धतियों का विश्व साहित्य के अध्ययन के लिए उपयोग सहज है, परंतु अनिवार्य नहीं. अर्थात विविध साहित्यों की तुलना के स्थान पर उनका संकलन करना भी विश्व साहित्य के लिए पर्याप्त है. उदाहरण के लिए यदि तुर्गनेव, हाथॉर्न, थैकरे और मोपसां के निबंधों के संकलन को ‘Figures of World Literature’ नाम दिया जाए तो यह सहज ही विश्व साहित्य के अंतर्गत स्वीकार्य होगा. भले ही इसमें तुलनात्मक अध्ययन सम्मिलित हो या न हो. 


विश्व साहित्य पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में विचार करते हुए प्रो.इंद्रनाथ चौधुरी ने ‘तुलनात्मक साहित्य की भूमिका’ में यह बताया है कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने सन् 1907 में तुलनात्मक साहित्य के लिए ‘विश्व साहित्य’ शब्द का प्रयोग किया था. कवींद्र रवींद्र यह मानते थे कि यदि हमें उस मनुष्य को समझना है जिसकी अभिव्यक्ति उसके कर्मों, प्रेरणाओं और उद्देश्यों में होती है तो संपूर्ण साहित्य के माध्यम से उसके अभिप्रायों से परिचित होना होगा. वास्तव में मनुष्य इतिहास में स्थानीय या सीमित व्यक्ति की अपेक्षा शाश्वत या सार्वभौमिक मनुष्य को देखना चाहता है. उसकी इस अपेक्षा को विश्व साहित्य ही पूरा करता है. विश्व साहित्य में मनुष्य अपनी आत्मा के आनंद को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है. अतः विश्व साहित्य की एक बड़ी कसौटी उसमें मनुष्य की आत्मा के आनंद और रागात्मक संबंधों की अभिव्यक्ति को माना जा सकता है. 


रवींद्रनाथ ठाकुर के अनुसार ‘जिस प्रकार यह विश्व जमीन के टुकड़ों का योगफल नहीं है उसी प्रकार साहित्य विभिन्न लेखकों द्वारा रचित कृतियों का योगफल नहीं है. हमें राष्ट्रीयता की संपूर्ण मनोवृत्ति से अपने को मुक्त करना है. प्रत्येक कृति को उसकी संपूर्ण इकाई में देखना है और इस संपूर्ण इकाई या मनुष्य की शाश्वत सृजनशीलता की पहचान विश्व साहित्य के द्वारा ही हो सकती है.’ 


इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य मनुष्य की शाश्वत सृजनशीलता की खोज का परिणाम है तथा विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यों का समुच्चय होता हुए भी वह राष्ट्रीय संकीर्णताओं से मुक्त तथा 'वसुधैव कुटुंबकं' की वैश्विक चेतना से अनुप्राणित होता है. 


[4]

भारतीय साहित्य में भारतीयता


भारतीय साहित्य की पहचान का आधार है – भारतीयता. प्रश्न यह उठता है कि भारतीयता का क्या अभिप्राय है? वस्तुतः वर्तमान संदर्भ में यह शब्द गहरे सांस्कृतिक अर्थ का द्योतक है. कहना न होगा कि “संस्कृति हमारे लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है. वह मूलतः मनुष्य से, प्रकृति से, धर्म से, मूल्य से, आत्मा से, समाज से, विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है.” (प्रभाकर श्रोत्रिय). इन्हीं से हमारी सांस्कृतिक पहचान निर्मित होती है जिसे हम विश्व के अन्य देशों की तुलना में विशिष्ट मानकर भारतीयता के नाम से अभिव्यक्त करते हैं. 


भारतीयता के कई अभिलक्षण हो सकते हैं. जैसे – सर्वात्मवाद – सबका वि़कास, सबका उन्नयन, सबका आनंद भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है. इसी प्रकार भारतीयता को सामासिकता से जोड़ते हुए डॉ.प्रभाकर श्रोत्रिय कहते हैं – “भारत के भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है जिसके केंद्र में है सहिष्णुता जिसे नरेश मेहता ‘वैष्णवता’ कहते हैं. वैष्णवता का मूल करुणा है. गांधी की प्रार्थना में था – ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाने रे.’ वैष्णवी भारत एक सहिष्णु, संवेदनशील, सामाजिक भारत है, संगम जिसका स्वभाव है. संगम भारत की सामासिकता की बोधभूमि है. *** भारत की संस्कृति का निर्माण नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं, काव्य ग्रंथों से हुआ है. ‘रामायण’, ‘महाभारत’ तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य हैं ही, वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है.” (‘कविता की जातीयता’ की भूमिका से). 


भारतीयता अथवा भारतीय संस्कृति की व्याप्ति ही विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य के भारतीय साहित्य का दर्जा देती है. इसलिए भारतीय साहित्य में भारतीयता एक मूलभूत घटक/ तत्व (Fundamental Constituents) है. 


इसमें संदेह नहीं कि मानवीय संवेदना की दृष्टि से विश्व भर का साहित्य कुछ एक जैसे आद्यप्रारूपों (Archetypes) से जुड़ा हुआ है जिसके कारण विश्व साहित्य में सार्वकालिक और सार्वदेशिक तत्व पाए जाते हैं. परंतु जैसा कि प्रो. इंद्रनाथ चौधुरी ने ‘तुलनात्मक साहित्य की भूमिका’ में लिखा है, “विश्व के साहित्य में पाई जाने वाली इस सार्वकालिकता या सार्वदेशिकता के बावजूद प्रत्येक देश का साहित्य काल, परिवेश तथा लेखक के जातीय संस्कार से प्रभावित होता है जिसके फलस्वरूप साहित्य में विशिष्टता आ जाती है.” यह जातीय संस्कार ही वर्तमान संदर्भ में भारतीयता है. विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य की एक जैसी विशेषताओं के आधार पर भारतीय साहित्य की एकता को प्रतिपादित किया जा सकता है. वी.के.गोकक ने पहले-पहल भारतीय साहित्य की उस चेतना को खोजने का प्रयास किया जिससे भारतीयता की पहचान की जा सकती है. 'The Concept of Indian Literature’ में उन्होंने यह बताया की भारतीय साहित्य की शैली, कथ्य, पृष्ठभूमि, बिंबविधान, काव्य रूप, संगीत तथा जीवन दर्शन सब मिलकर एक अभिन्न तत्व के रूप में भारतीय साहित्य की भारतीयता को प्रकट करते हैं. डॉ.नगेंद्र और सुनीतिकुमार चटुर्जी ने इसे एकता के रूप में विश्लेषित किया है. 


भारतीय साहित्य के आमतौर से तीन अर्थ समझे जाते हैं – 

1. संस्कृत साहित्य जिसकी विशाल परंपरा है और जो आधुनिक भारतीय साहित्य को प्रभावित करता है. भारतीयों द्वारा अंग्रेज़ी में लिखा साहित्य. गोकक ने भारतीयता की चर्चा करते हुए भारतीयों द्वारा अंग्रेज़ी में लिखे साहित्य का ही उदाहरण दिया है.  
2. विभिन्न भारतीय भाषाओं हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगला, मणिपुरी आदि में लिखा गया साहित्य जिसमें विषय और भावगत एकसूत्रता दिखाई पड़ती है.  
3. भले ही भारत की 22 भाषाओं में अभिव्यक्तियाँ अलग-अलग हों तथापि इनमें मूलभूत एकरूपता देखी जा सकती है. वर्त्तमान संदर्भ में हम भारतीय साहित्य के इसी अर्थ को ग्रहण करते हैं. 

प्रो.इंद्रनाथ चौधुरी ने इस मूलभूत एकरूपता के दो कारण बताए हैं – 

1. एक ही स्रोत से प्रेरणा ग्रहण करना. यह मूल स्रोत है – संस्कृत साहित्य, महाकाव्य, पुराण, जातक, लोकसाहित्य, दार्शनिक साहित्य, कला एवं संगीत.

2. लगभग एक ही प्रकार की अनुभूतियों से प्रेरित साहित्य का निर्माण होना. इसीके कारण हमारी साहित्यिक परंपरा में अटूट निरंतरता दिखाई देती है और आधुनिकता में भी प्राचीनता की प्राणशक्ति प्रकट होती है. 

कृष्ण कृपलानी ने भारतीय साहित्य की इसी एकरूपता को देखते हुए कहा है कि हमारा साहित्य मात्र एक दृश्य नहीं पैनोरोमा है. ऊपर से नीचे तक इसमें बहुत से लैंडस्केप दिखाई देते हैं मगर इन विभिन्न लैंडस्केपों के रहते हुए भी अर्थात अनेकता में भी एक सैद्धांतिक एकता है जो विभिन्न विधाओं, रूपों या अभिव्यक्तियों में प्रतिफलित है. 


विद्वानों ने यह परिलक्षित किया है कि हमारे साहित्य में मिथकों, मोटिफों, बिंबों या प्रतीकों के प्रयोग में एक व्यावहारिक संश्लेषण मिलता है जो भारतीय साहित्य की भारतीयता को उजागर करता है. इस भारतीयता की पहचान भारत के 5000 वर्ष के साहित्य की धारा में अवगाहन करके ही की जा सकती है. अभिप्राय यह है कि भारतीय साहित्य में भारतीयता के आविष्कार के लिए समूचे भारतीय साहित्य को स्वीकारना होगा. 


डॉ. इंद्रनाथ चौधुरी ने भारतीय साहित्य में भारतीयता के कुछ मूलबिंदु निर्धारित किए हैं जिन पर आगे प्रकाश डाला जा रहा है.:

1.आध्यात्मिक दृष्टि, 2. रहस्यात्मक बिंबवाद, 3. अद्वैत, 4. आदर्शवाद और 5. मानवतावाद 


1. आध्यात्मिक दृष्टि : 

भारतीय प्राच्य विद्या के जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने कहा है – ‘India is always transcendental and beyond.’ उनकी यह मान्यता भारतीय साहित्य की आध्यात्मिक अवधारणा पर भी लागू होती है. भारत शब्द का अर्थ ही है ‘भा + रत’ = ‘प्रकाश में रत’. यहाँ प्रकाश का लाक्षणिक अर्थ ‘प्रकाशपूर्ण ज्ञान, आत्मा ज्ञान या आध्यात्मिक ज्ञान’ है. (भारतीय साहित्य की अवधारणा (लेख), पांडेय शशिभूष्ण शीतांशु). वास्तव में इसी तत्व से भारत की मानसिकता का मूल स्वरूप तय होता है जो आध्यात्मिक है. मैथ्यू आर्नल्ड ने इसे भारत की ‘निष्काम दृष्टि’ (Indian Virtue of detachment) और गोयते ने व्यक्तिगत भावावेग से मुक्त भारतीय कला दृष्टि (India Art without individual passion) कहा है. गीता की शब्दावली में हम इसे ‘अनासक्ति’ कह सकते हैं. इस अनासक्ति के कारण ही भारतीय साहित्य में कवि अपने व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति करते दिखाई नहीं देते. भारतीय साहित्य व्यष्टि से समष्टि की ओर जाने की साधना है जो भारतीय मनुष्य की मनोचेतना में गहरी जमी हुई है. यह दृष्टि ईशोपनिषद् के इस कथन से प्रेरणा लेती है – ईशावास्यमिदं सर्वम् (सर्व ईश का वास है). इसी बात को रवींद्रनाथ ठाकुर ‘सीमार माझे असीम तुमि’ कहकर व्यक्त करते हैं तथा निराला कहते हैं – ‘उस असीम में ले जाओ/ मुझे न कुछ तुम दे जाओ.’ 


यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि आध्यात्मिक दृष्टि का अर्थ धार्मिक या सांप्रदायिक होना नहीं है. भारतीय साहित्य मूलतः मनुष्य के विषय में और मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ को मानता है – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष. इन्हें ही महाकाव्य का प्रयोजन माना गया है. भारतीय साहित्यकार इनका वर्णन कुछ इस प्रकार करता है कि अंततः सौंदर्य और आनंद की स्थापना हो सके. 


2. रहस्यात्मक बिंबवाद : 

भारतीय साहित्य में यह देखा गया है कि इसमें सौंदर्यबोध और आनंद की अभिव्यक्ति के साथ नीतिबोध जुड़ा हुआ है. भारत की सौंदर्य दृष्टि आध्यात्मिक ध्यान दृष्टि है जिसके उदाहरण के रूप में विभिन्न देव मूर्तियों को देखा जा सकता है. दरअसल भारतीय साहित्य में यथार्थ को बौद्धिकता के साहारे नहीं संवेदना और अनुभूति के सहारे ग्रहण किया जाता है. इसीलिए इसमें रहस्यात्मक बिंबवाद की प्रवृत्ति पाई जाती है. रहस्यात्मक बिंबवाद का अर्थ है रूपकों के प्रयोग द्वारा वस्तुपक्ष को जटिल बनाते हुए सत्य की खोज. उदाहरण के लिए संत कबीर का यह रहस्यात्मक बिंब द्रष्टव्य है- 

‘लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल
लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल’ 

ऋग्वेद के नारदीय सूक्त (जिसमें निषेध के द्वारा ब्रह्म की परिभाषा का प्रयास है) से लेकर आधुनिक युग में रवींद्रनाथ ठाकुर और सुब्रह्मण्य भारती आदि भारतीय भाषाओं के कवियों में यह रहस्यात्मक बिंबवाद बार बार दिखाई देता है. इसमें विरोधाभास की सहायता से मूल सत्य की खोज की प्रवृत्ति पाई जाती है. यों कहा जा सकता है कि जिस तरह के मानचित्र का एक स्थाई हिस्सा हिमालय है उसी प्रकार भारतीयता का एक स्थाई हिस्सा आत्मा रूपी एक परम सत्य का खोज है, रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों में – 

‘पहले दिन के सूर्य ने प्रश्न किया था
सत्ता के नए आविर्भाव को
कौन तुम ?
उत्तर नहीं मिला.’ 

3. अद्वैत :

वेदांत की अद्वैतवादी अवधारणा भारतीय साहित्य में निहित भारतीयता का एक प्रमुख आद्यरूप (Archetype) है. इसके अनुसार पारमार्थिक सत्ता एक मात्र सत्ता है जिसे प्राकृतिक सत्ता के द्वारा समझा जा सकता है. ब्रह्म और प्रकृति की इस दोहरी भावना को भारतीय साहित्यकारों ने अनेक रूपकों द्वारा स्पष्ट किया है. शिव और शक्ति या अर्द्धनारीश्वर भी इसी प्रकार का एक रूपक है. दरअसल यह एक ऐसा युग्म है जिसका एक पक्ष अविकारी है जिसे स्रष्टा, शिव, सत्य, काल या आत्मा कहा गया है. दूसरा पक्ष गतिशील है, परिवर्तनशील है जिसे सृष्टि या शक्ति कहा गया है. यह नए नए रूपों में जन्म लेती है. आत्मा और देह ही पुरुष और प्रकृति है. इसलिए देह को लेकर यहाँ कोई पाप बोध नहीं हैं. शिव-पार्वती और राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं को यहाँ अनैतिक कहकर नकारा नहीं जाता बल्कि इसे आत्मा और प्रकृति की सदा चलने वाली लीला माना जाता है. निराला के शब्दों में –

‘नव जीवन की प्रबल उमंग,
जा रही मैं मिलने के लिए पार कर सीमा
प्रियतम असीम के संग.’

देह प्रेम को यहाँ जीवन चक्र के लिए सहज माना गया है. इसीलिए ‘कामसूत्र’ में यह कहा गया है कि शयनकक्ष में सिरहाने मूर्ति होनी चाहिए. मलयालम के कवि शंकर कुरुप की कविता यहाँ द्रष्टव्य है – 

मैंने उसके पैरों में लगे आलता का लाल रंग देखा
मगर मुझे लगा कि उषा शरमाई हुई है.
वह आसमान में अपनी अंगूठी छोड़ गई है.
मगर मुझे लगा, नहीं वह तो सूर्य है. 


4. आदर्शवाद : 

भारतीय साहित्य के एक अन्य आद्यप्रारूप के तौर पर आदर्शवाद की पहचान की गई है. इंद्रनाथ चौधुरी ने लक्षित किया है कि भारतीय साहित्य में तनाव और संघर्ष है परंतु चरम विरोध नहीं है. यहाँ संघर्ष दो व्यक्तित्वों की टकराहट नहीं, इच्छा और आदर्श का सघर्ष है जिसमें अंततः आदर्श की विजय होती है. इसीलिए यहाँ ट्रेजिक साहित्य बहुत ही कम लिखा गया है. ‘गोदान’ में एक ही मृत्यु होती है मगर सात ही सबका हृदय परिवर्तन होता है. वस्तुतः यहाँ मृत्यु नहीं होती. मृत्यु के बाद जीवन ही यहाँ नियम है. अर्थात यहाँ पतझड़ और वसंत एक निरंतर/ सतत प्रक्रिया के दो अंग हैं. 


भारतीय साहित्य के आदर्शवादी होने का दूसरा कारण चक्राकार काल की संकल्पना है जिसके अनुसार जीवन और मृत्यु एक ही काल प्रवाह के दो बिंदु हैं और मृत्यु से नया जीवन आरंभ होता है. मोक्ष मिलने तक यह क्रम चलता रहता है (आवागमन से मुक्ति). यही कारण है कि भारतीय साहित्य में ट्रेजडी नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन का चित्र अंकित करने की परम्परा है. यदि भारतीय कवि दुःख को जीवन का मूल तत्व बताते हैं तो इसे पाश्चात्य साहित्य में वर्णित मेलेंकली (यातना) नहीं समझना चाहिए बल्कि यह भारत की एक विशिष्ट मानसिकता है जो यातना और दुःख के द्वारा भी जीवन के सकारात्मक पक्ष को खोजती है. यहाँ हम अज्ञेय की निम्नलिखित पंक्तियों को याद कर सकते हैं – 

“दुःख सबको माँजता है
और
चाहे स्वयं सब को मुक्ति देना वह न जाने, किंतु
जिनको माँजता है
उन्हें यह सीख देता है कि सब को मुक्त रखें.” 

इसी प्रकार जब रवींद्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि कली के भीतर खुशबू अंधी होकर रो रही है’ तो इस कथन में हमें दुःख का चरम सुंदर रूप दिखाई पड़ता है. यही भारतीय साहित्य का अस्तित्व बोध है जहाँ दुःख और आनंद,बुद्धि और अबौद्धिकता, अस्तित्व और विचार एक दूसरे के पूरक हैं. 


5. मानवतावाद : 

भारतीय साहित्य की भारतीयता का चरमोत्कर्ष उसके भव्य और प्रखर मानवतावाद में दिखाई देता है. उपनिषदों की कल्पना है कि मनुष्य स्वयं ईश्वर है – ‘अहम ब्रह्मास्मि’. महाभारत में मनुष्य को दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य कहा गया है. चंडीदास हों या पंत, व्यास हों या वाल्मीकि, शरत हों या प्रेमचंद - सभी मनुष्य को सर्वोपरि सत्य मानते हैं. मनुष्य को देवताओं से भी श्रेष्ठ माना गया है. इसी कारण हमारे साहित्य में नायक का धीर होना अनिवार्य माना गया है. धीरता के द्वारा ही महाकाव्य का नायक हमारे लिए अनुकरणीय बनता है. भारतीय साहित्य में नायक पूजा को मनुष्य की असीम शक्ति के प्रति लेखक की श्रद्धा का निवेदन माना जा सकता है. मध्ययुगीन भक्ति काव्य में विश्वमानवता का आदर्श देखा जा सकता है तो दूसरे ओर तमिल के प्रसिद्ध काव्य ‘तिरुकुरळ’ में तिरुवल्लुवर ने कहा है – जो भी हो मेरा पड़ोसी हैं, जहाँ भी हो मेरा देश है. अर्थात इस मानवतावाद में न कोई पराया है और न ही परदेश है. इसीका नाम वसुधैव कुटुंबकम है. इस मानवतावाद के दो आधारतत्व हैं. एक त्याग और दूसरा भक्ति. वास्तव में मानवतावाद की यह व्यापक धारणा नैतिकता और सौंदर्यबोध पर आधारित है जिसके द्वारा मनुष्य में विद्यमान देवत्व को प्रकट किया जाता है. 


निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि एक ‘सर्वभारतीय संवेदना’ भारतीय साहित्य के केंद्र में स्थित है. आधुनिक भारतीय साहित्य भले ही विभिन्न भाषाओं में लिखा जाता हो लेकिन उसमें भी यह संवेदना दिखाई पड़ती है जिसमें वे मूल्य निहित हैं जो भारतीय सांस्कृतिक इतिहास और अनुभव की उपलब्धियां हैं. ये मूल्य ही भारतीय साहित्य की भारतीयता के नियामक तत्व हैं. 


[5]

भारतीय साहित्य की अवधारणा


मनुष्य विविध देशकाल में भाषा, साहित्य और संस्कृति का सृजन और विकास करता आया है जिसमें अनेक प्रकार की विविधताएँ, भिन्नताएँ और समानताएँ पाईं जाती हैं. इन भिन्नताओं और समानताओं का अध्ययन क्रमशः व्यतिरेकी अध्ययन और तुलनात्मक साहित्य की दिशा में प्रेरित करता है. मैथ्यू आर्नल्ड ने इसी आधार पर तुलनात्मक विश्व साहित्य की संकल्पना प्रस्तुत की थी. उनके अनुसार आलोचक को विश्व साहित्य में जो कुछ भी श्रेष्ठतम और महनीय है उसका अध्ययन, मनन और प्रचार करना चाहिए ताकि प्राणवान और सत्य विचारों की धारा प्रवाहित की जा सके. ऐसा करने से विभिन्न भाषाओं के साहित्य में विद्यमान समान मूल्यों को खोजा जा सकता है.


भारतीय साहित्य की पहचान : एकता और आत्मज्ञान : 


विश्व साहित्य की भाँति ही तुलनात्मक अध्ययन का एक बहुत व्यापक क्षेत्र भारतीय साहित्य है. वस्तुतः साहित्य मनुष्य की आतंरिक अनुभूतियों और संवेदनाओं का अभिव्यक्त रूप होता है. यह माना जाता है कि मानव की आतंरिक भावनाएँ समान होती हैं. उसकी महसूस करने तथा भाव प्रकट करने की शक्ति भी सार्वभौमिक है. शोक, हर्ष, घृणा, क्रोध, प्रेम और वात्सल्य जैसे अनेक भाव विश्व मानव में समान पाए जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप साहित्य का मूलभूत ढाँचा सभी भाषाओं में एक-सा ही दिखाई देता है. यदि भारत की बात की जाए तो यह ध्यान में रखना होगा कि यह देश बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक देश है. अर्थात भारत की अलग-अलग भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया है या लिखा जा रहा है उसमें थोड़ी बहुत भिन्नता के साथ अधिकतर एकता या समानता की स्थिति दिखाई पड़ती है. विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य की यह एकता या समानता ही भारतीय साहित्य की अवधारणा का केंद्रबिंदु है. इसी के साथ पांडेय शशि भूषण शीतांशु का यह मत भी जोड़ लें तो बात और भी परिपूर्ण हो जाएगी कि "भारतीय साहित्य का अर्थ हुआ आत्मज्ञान को सृजित करने, प्रस्तुत करने और प्रदान करने वाला साहित्य."


भारतीय साहित्य का विस्तार/ व्यापकता : 


भारतीय साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत और व्यापक है. प्रो.दिलीप सिंह के अनुसार, “भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जिन 22 भाषाओं और बोलियों का उल्लेख है, उनका साहित्य अत्यंत संवृद्ध है और यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो इन सभी भाषाओं में साहित्यिक धाराएं लगभग समानांतर रूप में प्रवाहित मिलती हैं. इसके साथ ही इन सभी भाषाओं का राष्ट्रीय चेतना और उसमें आने वाले परिवर्तनों के साथ एक-सा संबंध रहा है तथा ये सभी राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे परिवर्तनों से एक-सा प्रभावित रही हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की सभी भाषाएँ और उनका साहित्य भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ प्रतीत होता है इसीलिए भारत की इन भिन्न भाषाओं में लिखे गए साहित्य को भारतीय साहित्य कहा गया है.” 


यहाँ यह जानना आवश्यक है कि साहित्यिक धारा, विचारधाराएँ, प्रवृत्तियाँ और सामाजिक सरोकार के धरातल पर भारतीय साहित्य में जो समानताएँ मिलती हैं उन्हें ‘भारतीयता’ (Indianness) के तत्व या घटक कहा जा सकता है. 


भारतीय साहित्य और सामासिक संस्कृति : 


भारतीय साहित्य की यह अंतर्निहित भारतीयता भारत की संस्कृति का प्रतिबिंब है. भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता में विद्यमान एकता को महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, सर्वेपल्ली राधाकृष्णन और डॉ.राजेंद्र प्रसाद आदि ने बड़ी सूक्ष्मता से पहचाना है. ऊपर से हमें भारत के अलग-अलग प्रांतों और समुदायों की संस्कृति में कुछ भेद दिखाई देते हैं लेकिन यदि गहराई से देखा जाए तो संस्कृति के मूलाधार भारत के सभी समुदायों में समानता लिए हुए दिखाई देते हैं. यदि रीति-रिवाज, पूजा-पाठ, मेले-त्यौहार, शिष्टाचार, खानपान को संस्कृति का सामान्य आधार माना जाए तो भारतीय साहित्य की तरह ही भारतीय संस्कृति की भी अवधारणा स्पष्ट हो सकती है. मुस्लिम शासकों तथा यूरोपियन शासकों के आगमन से भारतीय संस्कृति को कुछ नए आयाम भी मिले. ऐसी स्थिति में भारतीय संस्कृति का स्वरूप केवल हिंदू संस्कृति तक सीमित न रहकर विस्तृत हुआ. ये बाहरी संस्कृतियाँ क्रमशः भारत की मूल संस्कृति में घुलने मिलने लगीं और मिली-जुली संस्कृति का अनूठा मिश्रण तैयार हुआ जिसका प्रभाव सभी भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य पर पड़ा. 


यह स्पष्ट है कि भाषा और साहित्य दोनों के भीतर उस भाषा समाज के सांस्कृतिक तत्व गुँथे रहते हैं. इसलिए तुलनात्मक भारतीय साहित्य का एक आयाम इन सांस्कृतिक तत्वों की समानता और विषमता के विवेचन का भी हो सकता है. जैसा कि, राबर्ट फॉर्स्ट ने कहा था कि मनुष्य के स्वभाव में चिंतन की प्रवृत्ति के साथ साथ तुलना की प्रवृत्ति भी जैविक स्तर पर ही निहित होती है इसलिए साहित्य के क्षेत्र में भी तुलना स्वाभाविक है. तुलनात्मक भारतीय साहित्य इसी प्रवृत्ति का प्रतिफलन है. 


भारतीय साहित्य : परंपरा का महत्व : 


भारतीय साहित्य के स्वरूप निर्धारण में विभिन्न भाषाओं के साहित्य की परंपरा के अध्ययन का बड़ा महत्व है. उदाहरण के लिए जब हम सूरदास के काव्य का अध्ययन करते हैं तो पीछे जाकर उस परंपरा को भी देखते हैं जो मध्यकाल में एक व्यापक प्रवृत्ति के रूप में पूरे भारत को उसकी सभी भाषाओं को प्रभावित किए हुए थी. इसी प्रकार मध्यकालीन रामकथा की परंपरा को समझने के लिए वाल्मीकि की ‘रामायण’, कालिदास के ‘रघुवंश’ और भवभूति के ‘उत्तररामचरित’ को देखना जरूरी है. यही नहीं आधुनिक काल में भी अनेक साहित्यिक कृतियाँ अपनी मूल प्रेरणा प्राचीन वाङ्मय से प्राप्त करती हैं. यही कारण है कि भारतीय साहित्य के आकर ग्रंथों के रूप में ‘रामायण’, ‘महाभारत’ और ‘कथा सरित्सागर’ का समान रूप से उल्लेख किया जाता है. परंपरा के अध्ययन से ही हम उन कारणों और परिणामों की सटीक व्याख्या कर पाते हैं जो विभिन्न साहित्यों में पाई जाने वाली एक समान प्रवृत्तियों से जुड़े हैं. हम देखते हैं कि नवजागरण काल में सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में कमोबेश एक जैसी आधुनिक चेतना का प्रसार हुआ. यही वह काल था जब भारत ने सदियों पुराणी सामाजिक और राजनैतिक गुलामी के कारणों को पहचानकर उनसे मुक्त होना शुरू किया. बंगला में बंकिमचंद्र चटर्जी और रवींद्रनाथ टैगोर, हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र, तमिल में सुब्रह्मण्य भारती और तेलुगु में गुरजाडा अप्पाराव जैसे रचनाकारों की एक समान का चेतना का आधार यह नवजागरण था. इसी प्रकार जिस काल में हिंदी साहित्य छायावादी चेतना से अनुप्राणित था उसी काल में तेलुगु की भाववादी कविता भी वैसी ही चेतना से स्फूर्त थी. हिंदी में प्रगतिवाद और तेलुगु में अभ्युदय का आगमन एक साथ हुआ – अन्य सभी भारतीय भाषाओं में भी ऐसा ही हुआ. भारतीय साहित्य का अध्ययन करते हुए हम ऐसे ही समान प्रेरणा बिंदुओं, सरोकारों और प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हैं. 


कुलमिलाकर जैसा कि सर्वेपल्ली राधाकृष्णन ने आर्केस्ट्रा का दृष्टांत देकर समझाया था कि जिस प्रकार भिन्न-भिन्न वाद्य लेकर वाद्यवृंद मंच पर आता है तो उसमें भिन्नता दिखाई देती है लेकिन जब सभी वादक अपने अपने वाद्य पर एक ही राग छेड़ते हैं तो भिन्नता का यह भाव मिट जाता है और एकता स्थापित हो जाती है. भारतीय साहित्य वस्तुतः साहित्य के माध्यम से इसी सामासिक संस्कृति अथवा भारतीयता की खोज करता है.


संदर्भ ग्रंथ - 


चौधुरी, इंद्रनाथ (1983). तुलनात्मक साहित्य की भूमिका, चेन्नई : दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास 

(सं) यादव, जगदीश (2011). भारतीय साहित्य : अवधारणा, समन्वय एवं सादृश्य, रायपुर : सिंघई पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स 

(सं) तिवारी, सियाराम (2009). भारतीय साहित्य की पहचान, पटना : नालंदा खुला विश्वविद्यालय 

(सं) सिंह, दिलीप एवं ऋषभ देव शर्मा. शोध प्रविधि; चेन्नई : दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास 

चौहान, शिवदान सिंह. आलोचना के सिद्धांत, नई दिल्ली : स्वराज प्रकाशन 

वाचक्नवी, कविता (2009). कविता की जातीयता, इलाहाबाद : हिंदुस्तान एकेडेमी 


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मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

(भूमिका : दो शब्द) भारतीय साहित्य का अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य






भारतीय साहित्य का अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य : विविध आयाम

भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि भारतीय साहित्य का निजी परिप्रेक्ष्य क्या और कैसा है. आज  विश्व साहित्य के माध्यम से और विश्व में जो समाज-सांस्कृतिक और राजनैतिक परिवर्तन हो रहे हैं, उनके प्रभाव को ग्रहण करके एक विश्व परिप्रेक्ष्य परिणत हो रहा है.  दूसरे देशों - यूरोपीय और खासकर के पश्चिम के - देशों में बहुत सजग चलन है कि जब कोई भी बड़ी घटना होती है, उसपर समाज वैज्ञानिक लेखन भी काफी संख्या में होता है और साहित्यिक लेखन भी. साथ ही,विश्व को प्रभावित करनेवाली इन घटनाओं के बारे में फ़िल्में भी बन जाती हैं.   इसका लाभ यह लगता है कि वहाँ के सामाजिक कार्यकर्ता, राजनैतिक कार्यकर्ता और लेखक लगभग-लगभग साथ रहकर एक विश्व परिदृश्य बनाते हैं जिसका असर संस्कृति पर भी होता है, पर्यटन पर भी होता है, रचनात्मक साहित्य पर भी होता है और विचार-विमर्श के आंदोलनों पर भी होता है. यह एक चलन है जिसे भले ही साहित्य की शाश्वत परंपरा की दृष्टि से उतना अच्छा न माना जाता हो या सवालों के घेरे में खड़ा किया जा सकता हो, लेकिन समसामयिकता की दृष्टि से यह चलन बहुत महत्व का है.   हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाओं पर बहुत कुछ लिखा गया है.  उसके बाद भी जो युद्ध हुए हैं उनपर भी बहुत कुछ लिखा गया है.   अफ्रीकन देशों में जो उपनिवेशवाद चला है और उसके विरोध में जो क्रांतियाँ हुई हैं, उसपर भी बहुत सारा साहित्य रचा गया है. साथ ही, बदली हुई राजनीतिक प्रणालियों पर भी साहित्य रचा गया है. अर्थात पश्चिम में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो चारो तरफ से साहित्य का भी विश्व परिदृश्य बनाते हैं और अन्य क्षेत्रों का भी विश्व परिदृश्य बनाते हैं.  हम देखते हैं कि इस समसामयिक विश्व परिदृश्य का प्रभाव भारतीय फिल्मों पर तो पड़ता है और पड़ रहा है. भारतवर्ष में भी उनसे प्रेरणा लेकर यहाँ होनेवाली घटनाओं पर फ़िल्में बनाई जा रही हैं.   लेकिन साहित्य में यह चीज कहाँ है, यह देखा जाना  चाहिए. अतः यह विचारणीय है कि साहित्य का जो विश्व परिदृश्य विभिन्न कारकों से मिलकर बनता है, वह भारतीय साहित्य में किस रूप में आता है.   स्वाभाविक है कि ऐसा दो प्रकार से होता है. एक तो, घटनाओं के रूप में– अर्थात उन घटनाओं को सीधे-सीधे ग्रहण करके. दूसरे,  प्रवृत्तियों के रूप में– अर्थात विश्व परिदृश्य साहित्य और कला में जिन प्रवृत्तियों को जन्म देता है, उन प्रवृत्तियों को आत्मसात करके.  इस प्रकार, भारतीय साहित्य के निजी परिप्रेक्ष्य की व्याख्या के लिए यह देखना होगा कि इन वैश्विक परिवर्तनों, घटनाओं और प्रवृत्तियों को भारतीय साहित्य ने किस रूप में ग्रहण किया है या उसकी गति क्या है या उसकी दिशा क्या है. यह आवश्यक नहीं है कि हम यह घोषणा कर दें कि भारतीय साहित्य ने उन सबको ग्रहण कर लिया है.   ऐसा अगर कहेंगे तो यह एक प्रकार का झूठ हो जाएगा क्योंकि यह बात सामान्य प्रवृत्ति के रूप में या सामान्य आचरण के रूप में हमें दिखाई नहीं देती.  ऐसी कोई प्रवृत्ति भारतीय साहित्य में पनप रही है या नहीं, यह जानने के लिए भारतीय भाषाओँ के उन सभी लेखकों का आकलन करना पड़ेगा जो अधुनातन परिवर्तनों से जुड़े रहे हैं. 
इस निजी परिप्रेक्ष्य की समझ के बाद यह प्रश्न उठता है कि भारतीय साहित्य अपनी शक्तियों, प्रवृत्तियों और स्वभाव  के बल पर  विश्व साहित्य की, उसका दायरा बढ़ाने में, कहाँ तक सहायता कर रहा है.   इससे हमें भारतीय साहित्य के महत्व का, उसकी सामयिकता का और उसकी विश्वसनीयता का  पता चलेगा.   भारतीय साहित्य किस रूप में विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य को बढ़ाने में मदद कर रहा है, यह जानने के लिए हमें यह देखना होगा कि मदद किस रूप में की जा सकती थी.  यह मदद उन दिशाओं में की जा सकती थी जो दिशाएँ विश्व साहित्य में कमजोर हैं, या बिल्कुल नहीं हैं, या बहुत धीरे-धीरे विकसित हो रही हैं. जैसे, मनुष्यता का प्रश्न.
मनुष्यता की भारतीय अवधारणा भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का पहला आयाम है.  मनुष्यता की जो एक सार्वकालिक परिभाषा है वह भारतीय साहित्य और भारतीय दर्शन में मिलती है.   यह परिभाषा खासकर पश्चिमी देशों के साहित्य में हमें उस रूप में प्राप्त नहीं होती.   उसका कारण यह है कि मनुष्य की उत्पत्ति और विकास के बारे में जो भारतीय धारणाएँ हैं वे मूल सांस्कृतिक धारणाएँ हैं जो पश्चिम की या अन्य दूसरे देशों की धारणाओं से बहुत ज्यादा भिन्न है.   मनुष्य की जो भारतीय धारणा है वह एक साथ भौतिक, पारलौकिक, वैचारिक और सांस्कृतिक आयामों से मिलकर बनती है और साथ-साथ इसमें परंपरा जुड़ी हुई है.   यहाँ मनुष्य भी मनुष्यता की परंपरा को लेकर आता है, अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है.   समंदर पार के जो देश हैं उन देशों में जो मनुष्य की अवधारणा है उसका ज्यादा संबंध या तो ‘स्वतंत्रता’ शब्द से है या ‘मुक्ति’ शब्द से; क्योंकि उपनिवेशवाद वहीँ की उत्पत्ति है जिसने मनुष्य को भी उपनिवेशवादी ढंग से संबोधित किया. दूसरे, वहाँ जो सांस्कृतिक और धार्मिक धारणाएँ रही हैं उनमें मनुष्य को बहुत कम काम करना है, उसे बनानेवाले सारा काम कर देंगे.   मनुष्य को केवल शरण में जाना है.   एक और बात यह है कि उस मनुष्य को प्रारंभ से ही सिखाया जाता है कि उसके भौतिक जीवन में और सांस्कृतिक जीवन में एक फर्क है.   जब वह भौतिक होता है तो वह सांस्कृतिक कम होता है और जब वह सांस्कृतिक होता है तब भौतिक कम होता है.   वहाँ समाज, धर्म और राजनीति में अंधकार युग भी बहुत लंबा रहा है इसलिए उस अंधकार से मुक्ति की ललक बहुत ज्यादा दिखाई देती है.   उस अंधकार से उसे मुक्त होना है.   पश्चिम देशों में इस मुक्त होने की परिणति यह है कि वहाँ मनुष्य सब कुछ से मुक्त हो जाना चाहता है.   यहाँ तक कि उसे राष्ट्रीय सीमाओं से भी मुक्त हो जाना है. वहाँ की युवा पीढ़ी की एक बड़ी संख्या आज भी देखी जाती है जिसके भीतर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता बहुत कम दिखाई देती है.   वह कहीं भी जाकर रह सकता है, किसी भी भाषा में बात कर सकता है यानि उसका चयन महत्वपूर्ण है; उसकी जड़ें महत्वपूर्ण नहीं.   भारतवर्ष में मनुष्य होने के लिए जड़ें महत्वपूर्ण हैं.   जड़ों का महत्वपूर्ण होना एक अलग लाभदायक स्थिति होती है.   केवल चयन का महत्वपूर्ण होना एक दूसरी दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन वह तब नकारात्मक हो जाता है जब चयन करते समय मनुष्य  अपनी सीमा में चयन करने लगता है और दूसरों की सीमाओं को भूल जाता है.   वहाँ यह  हमें ज्यादा दिखाई देता है.  इसीलिए कपड़ों की तरह से अपने मित्रों को बदलना या शहरों को बदलना या देशों को बदलना पश्चिम के देशों में ज्यादा देखा जाता है.   भारत या एशिया के देशों में यह कम दिखाई देता है.   वहाँ इससे बहुत समस्या पैदा हो रही है.   इसका समाधान भारतीय साहित्य के पास है - मनुष्य की उस अवधारणा के रूप में जिसके विकास में उसने बहुत सारे पृष्ठों की सामग्री तैयार की है.   (रवींद्रनाथ ठाकुर : गोरा; अमृतराय : सहचिंतन; अज्ञेय : नदी के द्वीप; विष्णु प्रभाकर : अर्धनारीश्वर; बी वी कारंत : मुकज्जी). द्रष्टव्य है कि यह जो मनुष्य की भारतीय धारणा है, वे उसे किस रूप में ग्रहण कर रहे हैं या यह किस रूप में वहाँ  जा रही है.
भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का दूसरा आयाम संस्कृति से संबंधित है. बहुत कुछ खोने के बाद भी सांस्कृतिक दृष्टि से शेष दुनिया को देने के लिए भारतवर्ष के पास बहुत कुछ है क्योंकि संस्कृति यहाँ धर्म से जुड़ी हुई है.   यह उस रूप में धर्म से नाभिनालबद्ध नहीं है जिस रूप में अन्य समाजों में या दूसरे देशों में दिखाई देती है.   उसकी नाभिनालबद्धता जीवन के साथ है.   यहाँ जीवन का अभिप्राय है- संस्कृति में विकासशील जीवन.   संस्कृति निरंतर स्वयं को संशोधित करते हुए विकासशील जीवन की दिशा में  बढ़ने के मार्ग तलाशती है.   इस मार्ग तलाशने में प्रयोगशीलता भी निहित है.   इससे समाज में गतिशीलता भी आती है और प्रगतिशील अथवा विकासशील मूल्य भी अपनी जगह बनाते हैं. (एलाङ्बम नीलकांत सिंह : पीप्स इनटू कल्चर; शिवप्रसाद सिंह : नीला चाँद; गजेंद्र कुमार मित्र : पांचजन्य; विश्वनाथ सत्यनारायण : सहस्रफण). संस्कृति की यह धारणा भी पश्चिम के विश्व परिदृश्य को विस्तार दे सकती है.   इस कार्य को भारतीय साहित्य कितना कर पाया है, यह देखने की बात है; लेकिन उसकी विश्वसनीयता जरूर है. 
भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का तीसरा आयाम उसमें निहित लोकतांत्रिक चेतना से निर्मित है.  भारत में लोकतंत्र का जिस तरह से विकास हुआ है उसमें विरुद्धों का सामंजस्य एक महत्वपूर्ण चीज है.   तमाम सामंती प्रवृत्तियों के बावजूद, तमाम बाहुबली प्रवृत्तियों के बावजूद, तमाम गरीबी के बावजूद; अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति भी लोकतंत्र को त्यागना नहीं चाहता; उसी रास्ते पर आगे बढना चाहता है.  उसमें हिंसा या मारकाट के लिए जगह नहीं है पर विरोध के लिए जगह है और इस विरोध को सहन करने के लिए जगह है.   गरीब से गरीब आदमी भी या अनपढ़ से अनपढ़ आदमी भी इसे स्वीकार करता है.   भारतीय भाषाओं की कहानियों में या उपन्यासों में विरुद्धों के सह-अस्तित्व में विश्वास रखने वाला यह  आम आदमी हमें दिखाई देता है. (लमाबम कमल सिंह : ब्रजेंद्र का विवाह– कहानी, माधवी- उपन्यास; कुमारन आशान : चिंताविष्टा सीता). यह ऐसी चीज है जो दूसरे देशों को बहुत दूर तक शिक्षित कर सकती है.  अन्य देशों में, खासकर पश्चिम के देशों में, जहाँ ‘मतदान की स्वतंत्रता का लोकतंत्र’ महत्वपूर्ण है लेकिन मतदान के बाद जो सरकार बनेगी उसकी निष्ठा की चिंता उतनी महत्वपूर्ण नहीं है.   जो विरुद्धों का सामंजस्य भारतीय लोकतंत्र में दिखाई देता है वह वहाँ  हमें बहुत कम दिखाई देता है.   हम इस बात को रोते हैं कि हमारे यहाँ अस्थिरता दिखाई देती है लेकिन गौर से देखें तो  अस्थिरता वहाँ  ज्यादा दिखाई देती है.   अगर वहाँ  किसी प्रधानमंत्री को कुर्सी हिलती हुई नजर आती है तो हमारे यहाँ से जल्दी वह वहाँ  चुनाव करा लेता है – जैसा जापान में हुआ.   हमारे यहाँ जल्दी चुनाव कराते-कराते भी चार साल गुजर जाते हैं लेकिन वहाँ  ऐसा नहीं होता.   लोकतंत्र के प्रति ईमानदारी का जो प्रतिशत यहाँ बचा हुआ है वहाँ नहीं है.   वहाँ  जो नेता है वह  भ्रष्टाचार करेगा और जिस दिन कुर्सी छोड़ेगा उसको स्वीकार कर लेगा कि ‘हाँ. मैंने किया’ और फिर लोग धीरे-धीरे भूल जाएँगे.  सत्ता के खिलाफ जो चीजें चलती रहती हैं, वे बड़ी कम वहाँ  दिखाई देती हैं.   इस तरह की चीज हमारे यहाँ के साहित्य में अधिक है जो भारतीय लोकतंत्र की प्रवृत्तियों को दर्शाती है.   यह कहाँ तक पश्चिम में या अन्य देशों में गई है, अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के निर्धारण के लिए यह  देखना ज़रूरी है.   इसमें साहित्येतर लेखन को भी जोड़ लें तो परिप्रेक्ष्य और व्यापक हो सकता है. 
इस परिप्रेक्ष्य का चौथा आयाम जिजीविषा से संबंधित है. भारतीय साहित्य अपनी जिजीविषा के लिए बहुत प्रसिद्ध है.   जिजीविषा उसका सबसे महत्वपूर्ण मूल्य है.   यह एक ऐसा पक्ष है जो भारतीय साहित्य किसी को भी दे सकता है और इस विषय पर किसी को भी शिक्षित कर सकता है. प्रायः भ्रांतिवश यह माँ लिया जाता है कि  जिजीविषा अस्तित्ववाद के ज़माने में विमर्श के स्तर पर पश्चिम  से आई हुई चीज है.   लेकिन हमारे यहाँ उपनिषदों और पुरानों में असंख्य ऐसी कथाएँ हैं जिनके पात्र अपने पिता को चुनौती देते हैं, अपने दादा को चुनौती देते हैं.   अपने गाँव को चुनौती देते हैं, अपनी पूरी परंपरा को चुनौती देते हैं, अतः अगर हमारे पौराणिक या पारंपरिक साहित्य से जोड़कर देखें तो आज जिसे हम जिजीविषा कह रहे हैं उसके सूत्र हमें वहाँ  मिलते हैं.   इसके अतिरिक्त अगर   आयातित जिजीविषा को थोड़ा सा ध्यान से देखें तो पता चलता है कि वह  दवाबों से बचने की कोशिश है.  युद्ध का परिणाम व्यक्ति को  दबा रहा  है, परंपराएँ दबा रही हैं, बड़े-बूढ़े दबा रहे हैं, पीढ़ियों का अंतराल दबा रहा है,  सामाजिक रीति-रिवाज दबा रहे हैं और ये सब उसकी आजादी को नष्ट कर रहे हैं.    व्यक्ति को इन सबका प्रतिरोध करना है.   चूँकि ये बड़े हैं हम छोटे हैं तो हमें अपने छोटे पर गर्व करना है, उन्हें अपने बड़े पर गर्व होगा.   हमारी जो लघुता है हमारा जो छोटापन है वह बेइज्जती की बात नहीं है, वह हमारे लिए गर्व करने की बात है क्योंकि हम ऐसे ही हैं.   यह  है  पश्चिम वाली जिजीविषा.   अगर हम अपने यहाँ वाली जिजीविषा को देखेंगे जिसके सूत्र उपनिषदों और पुराणों में निहित हैं, तो पता चलेगा कि  अपने को बनाने, बनाए रखने और दूसरों के साथ जीने की एक महत्तम इच्छा ही भारतीय जिजीविषा है. (अज्ञेय : यह दीप अकेला; जगदीश गुप्त : गोपा-गौतम; भीष्म साहनी : माधवी, कबिरा खड़ा बजार में; कुँवर नारायण : नचिकेता, वाजिश्रवा के बहाने; जोराम यालाम नाबाम : साक्षी है पीपल).   इस जिजीविषा में कहीं नकारात्मकता नहीं है.   इसमें अस्वीकार है – जड़ता के प्रति अस्वीकार है, लेकिन नकारात्मकता कहीं नहीं है.   इसमे स्वीकार ज्यादा है.   यह  सकारात्मकता है कि अपने को बनाए रखना है, नए रास्ते खोजने हैं, नई राहें  तलाश करनी हैं, नई भाषा तलाश करनी है, नए ढंग से बोलना सीखना है, समय के साथ अपने को समायोजित करना सीखना है.   यह जो सकारात्मकता हमारी जिजीविषा में है, इसमें कहीं भी थोपे जाने से बचने की मजबूरी नहीं है.   यह मूल अंतर है पश्चिम की जिजीविषा में और हमारी जिजीविषा में.   यह जिजीविषा सारी भारतीय भाषाओँ के साहित्य में दिखाई देती है.  जिजीविषा का कम होते चले जाना आज एक ऐसी समस्या  है जो दुनिया को बहुत परेशान कर रही है.  यह समस्या बहुत खतरनाक बिंदु पर पहुँच गई है – इतने खतरनाक बिंदु पर कि पश्चिम में अपने अस्तित्व को  बनाए रखने के लिए  दूसरे के अस्तित्व को मिटाने की मजबूरी स्वीकृति प्राप्त कर रही है.   अभी कुछ पंद्रह-बीस वर्षों पहले जो राज्यों का विभाजन नए सिरे से किया गया है, उसका एक मान्य सिद्धांत ही है कि जो विकसित राज्य हैं उन्हें अपने विकास को बनाए रखने के लिए अविकसित राज्यों पर हमला करने का अधिकार है.   यह क्या है? यह जिजीविषा का क्षरण है.   लेकिन चौतरफा मृत्यु से घिरे होने के बावजूद भारत की जिजीविषा अक्षुण्ण है  क्योंकि वह उपनिषदों-पुराणों और संस्कृति से जुड़ी हुई है.   आपपर जो कुछ थोप दिया गया है और आपको दबा दिया गया है, अब आपको उसे तोड़कर बाहर निकलना है.  यह एक मूलभूत अंतर है.  देखना यह है कि भारतीय साहित्य में निहित जिजीविषा का यह मूल्य, जिसे आज तक भी अच्छे साहित्य की पहचान माना जाता है, विश्व साहित्य को किस रूप में मिल रहा है या नहीं मिल रहा है.   नहीं मिल रहा है तो हमें यह खोजना होगा कि क्यों नहीं मिल पा रहा है.
भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय  परिप्रेक्ष्य  का एक गौण आयाम भी है – भारतीय साहित्य का भौगोलिक विस्तार. यह ठीक है कि आज विश्व भर में भारतीय साहित्य अपनी पहचान बनाने में लगा है और अनुवाद तथा अनुसृजन के माध्यम से उसका निरंतर प्रसार हो रहा है. लेकिन हमें याद रखना होगा कि विश्व भर में भारतीय साहित्य का प्रसार उसके विश्व परिप्रेक्ष्य को तय नहीं करता, बल्कि उसे तय करती हैं वे प्रवृत्तियाँ जिनका संबंध मनुष्यता, संस्कृति, लोकतंत्र और जिजीविषा जैसे भारतीय साहित्य में गुँथे मूल्यों से है.

                           - ऋषभदेव शर्मा




हिंदी साहित्य : विश्व परिप्रेक्ष्य

 हिंदी साहित्य के विश्व परिप्रेक्ष्य को हमें हिंदी की आज की स्थिति के सापेक्ष  विवेचित करना होगा. इसमें संदेह नहीं कि आज हिंदी  का विस्तार पूरी दुनिया में है. बहुत सारे देशों में, विश्वविद्यालयों में, हिंदी पढ़ी-पढाई जाती है. हिंदी में लिखने वाले भारतीय और भारतेतर लोग दुनिया भर में फैले हुए हैं. यह एक पक्ष है जिसका संबंध ‘भाषा’ से है. लेकिन जब हम हिंदी ‘साहित्य’ की बात करते हैं तो दृष्टिकोण थोडा भिन्न होगा. दरअसल हमें हिंदी साहित्य के  विश्व परिप्रेक्ष्य को विश्व और भारत के आधुनिक संदर्भों  को ध्यान में रखकर समझने की ज़रूरत है.
सबसे पहले तो यही देखना होगा कि हिंदी साहित्य  में विश्व की सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक क्रांतियों के लिए कितनी जगह है क्योंकि हिंदी का जो अपना मूल चरित्र है वह मूलतः समाज-सांस्कृतिक चेतना प्रधान है; कम से कम अंग्रेजी की तरह से राजनैतिक चरित्र उसका प्रधान चरित्र नहीं है या उपनिवेशवादी चरित्र उसमें प्रधान नहीं है. उसमें समाज-सांस्कृतिक चैतन्य और समाज-सांस्कृतिक सरोकार ही प्रधान है. इसका कारण यह है कि हिंदी में सबसे अधिक शब्द-संपदा या परंपरा भले ही संस्कृत स्रोतों (वाल्मीकि रामायण, महाभारत, पुराण) से आई, लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि सारी भारतीय भाषाओँ, भारतीय समाज के सभी रूपों और भारत के विभिन्न भौगोलिक स्थानों में जो कुछ घटता है वहाँ से हिंदी ने अपने स्वरूप को गढ़ने के सूत्र ग्रहण किए. आज जो हिंदी साहित्य है वह विभिन्न भारतीय भाषा-समाजों  को स्रोत के रूप में ग्रहण करता है और फिर अपना चरित्र बनाता है. यही उसका उपयोगी और महत्वपूर्ण चरित्र है. क्योंकि जितनी भी भारतीय भाषाएँ हैं वे पहले भाषाई दुनिया की दृष्टि से समाज-सांस्कृतिक परिघटनाएँ हैं, उसके बाद कुछ और. यही कारण है कि हिंदी का चरित्र समाज-सांस्कृतिक अधिक है, राजनैतिक कम.  इस दृष्टि से हमें देखना होगा कि दुनिया भर की जिन घटनाओं से विश्व परिप्रेक्ष्य बनता है, उनके आधार पर हिंदी में दुनिया भर की समाज-सांस्कृतिक और  समाज-धार्मिक क्रांतियों के लिए कितनी जगह है. इस दृष्टिकोण से देखने पर हमें पता चलता है कि आधुनिक काल की हिंदी में गद्य और पद्य की दोनों विधाओं में विश्व की क्रांतियों के बारे में, विश्व की सामाजिक संरचना के बारे में और विश्व की सांस्कृतिक घटनाओं के बारे में पर्याप्त सामग्री है. इतना ही नहीं, यह भी कि दुनिया के समाज जिन कारणों से बदले हैं, उन अलग-अलग कारणों की व्याख्या भी हिंदी में हो रही है.  कम से कम आधुनिक काल में यह प्रवृत्ति भारतेंदु से शुरू हो जाती है और द्विवेदी जी में बढ़ती है, शुक्ल जी में पकती है और जो परवर्ती लेखक आते हैं उनमें और आगे बढती है. मैथिलीशरण गुप्त की भी उसमें निश्चित भूमिका है. विश्व परिप्रेक्ष्य से घटनाओं को लेकर अपने साहित्य में रखना और उसके आधार पर रचना करना. चाहे वह अमेरिकी क्रांति रही हो, फ़्रांसीसी क्रांति रही हो, इंग्लैंड की क्रांति रही हो, चाहे दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की क्रांति रही हो जो परवर्ती काल में घटित हुई; हिंदी साहित्य ने उन सबसे प्रभाव ग्रहण किए. एक यह चीज महत्वपूर्ण है.
इसके साथ ही हमें हिंदी साहित्य के उस निजी परिप्रेक्ष्य का अवलोकन करना होगा जो उसे विश्व की सीमा में ले जाता है, उसपर हमें ध्यान देना चाहिए. विश्व की अधिकांश भाषाओँ से हिंदी में अनुवाद के माध्यम से सामग्री आती रही है और अभी भी आ रही है.  कुछ भाषाएँ तो ऐसी हैं जिनमें कुछ विधाएँ अनुवाद के माध्यम से ही शुरू हुईं और उनसे हिंदी ने प्रेरणा ग्रहण की. इस आधार पर दुनिया की बहुत सारी भाषाओँ का साहित्य हमारे यहाँ आता रहा है. अनुवाद के माध्यम से हिंदी के परिप्रेक्ष्य को बढ़ाने का एक प्रमाण यह है कि साहित्यिक मूल्यांकन के संदर्भ में यह प्रश्न विचारणीय माना जाता है कि हिंदी के लिए अंग्रेजी उपन्यास ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या फ़्रांसीसी और रूसी उपन्यास? जब इन तीनों भाषाओँ के उपन्यासों का हिंदी साहित्य से संबंध हम जोड़ते हैं या उस परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य को देखते हैं तो पता चलता है कि हिंदी ने कम से कम उपन्यास की दृष्टि से (और कथा साहित्य की दृष्टि से) जो मूल्य रूस और फ़्रांस से ग्रहण किए हैं, वे मूल्य अंग्रेजी से ग्रहण नहीं किए हैं. कारण कि अंग्रेजी में वे मूल्य रहे ही नहीं. जैसे एक खास अंतर अंग्रेज़ी, रूसी और फ़्रांसीसी उपन्यासों में है कि अंग्रेज़ी उपन्यास क्लब कल्चर का उपन्यास है. उसका पूरा कथा साहित्य केंद्रीय दृष्टि से व्यक्तिगत संबंधों के विश्लेषण का साहित्य है, या अस्तित्व के साथ खड़े हुए प्रश्नों का साहित्य है, या व्यक्तिगत स्वाधीनता की रक्षा में बहुत सारे तर्क करने का साहित्य है. इस प्रकार वह साहित्य एकदम सिमट जाता है. स्मरणीय है कि व्यक्तिगत स्वाधीनता और मुक्ति एवं इसके साथ-साथ आभिजात्य और सामान्य के भेद और अंतर्विरोध औपनिवेशिक प्रभाव के कारण सारे उपनिवेशों में प्रमुखता प्राप्त कर चुके थे, इसलिए उपनिवेश के लोगों को ऐसा लगता रहा कि जो अंग्रेजी में लिखा जा रहा है वही महत्वपूर्ण है और वही हमारा दिशा-निर्देश कर सकता है.  इससे बड़ी सावधानी से जो भाषाएँ बचीं, उनमें मराठी और हिंदी जैसी भारतीय भाषाओँ का स्थान महत्वपूर्ण है. अन्य भाषाएँ भी होंगी लेकिन यहाँ हम हिंदी की बात कर रहे हैं. अतः हिंदी उपन्यासों को अगर शुरुआत से देखें तो पता चलता है कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना उनके केंद्र में है. यह अलग बात है कि उनका कथानक सशक्त है या नहीं. लेकिन उनके लिखने का जो उद्देश्य है वह समाज को बचाना मुख्य रूप से रहा है; जो इंग्लैंड का स्वभाव नहीं था, फ़्रांस का स्वभाव था और रूस का स्वभाव था . इसका अर्थ यह है कि हिंदी ने अपने विश्व परिप्रेक्ष्य को सायास और बहुत सावधानी के साथ जोड़ा है फ़्रांस और रूस के साथ. यही कारण है कि उन भाषाओँ में जो लेखक रहे हैं, हिंदी लेखकों ने उनका अनुवाद भी किया है, उनका अनुकरण भी किया है. अभिप्राय यह है कि एक विश्व परिप्रेक्ष्य वह है जो उपनिवेशप्रधान देशों से मिलकर बनता है और  एक विश्व परिप्रेक्ष्य वह है जो ऐसे देशों के साहित्य से मिलकर हमारे साहित्य में बनता है जो समाजार्थिक प्रश्नों पर ज्यादा गहराई से सोचते रहे हैं या जो भूख से,  अपराधों से, सामाजिक बुराइयों से मनुष्य की मुक्ति के बारे में ज्यादा सोचते रहे हैं. यह कहना उचित होगा कि एक प्रकार से अभिजात विचार और उनसे प्रेरित जो विलासिता की प्रवृत्ति होती है, उससे मुक्ति की चिंता इन भाषाओँ के साथ है. हिंदी ने अपने आपको इनके साथ जोड़ा है.
पिछले लगभग पचास वर्षों में हिंदी में उन देशों की भाषाओँ का साहित्य बहुत तेजी से आया है जो देश हाशिए पर रहे हैं. उदाहरण के लिए – म्यांमार. म्यांमार के तीस से भी अधिक उपन्यासों का अनुवाद बर्मी से हिंदी में हुआ है.  इनमें संयुक्त राष्ट्र के तीसरे महासचिव यू थांट का उपन्यास ‘काला सोना’ भी शामिल है. बहुत बड़ी संख्या में कविताएँ आई हैं. जिन्हें तीसरी दुनिया के देश कहकर अपमानित किया जाता है और जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं उन देशों की कविताओं का अनुवाद बहुत बड़ी मात्रा में हुआ है. उन देशों में जो मुक्ति अभियान चलाने वाले लेखक रहे हैं उनका साहित्य बड़ी तेजी से आया है. उनके लेखकों के परिचय बहुत तेजी से आए हैं.  इसके साथ-साथ उपनिवेशों में भी जो अपने बल पर खड़े हो गए हैं – मॉरीशस जैसे देश, उनका साहित्य चाहे वह हिंदी में लिखा जा रहा हो या अंग्रेज़ी, फ्रेंच या चीनी भाषा में, मूल रूप में या अनूदित होकर हिंदी में आया है. कहने का अर्थ यह है कि केवल यूरोप और दूसरे बड़े व बहुत जाने-पहचाने देश ही नहीं, वे देश जो हमारे बहुत कम जाने-पहचाने हैं और जिनमें राजनैतिक दृष्टि से हमारी रुचि बहुत कम रही है (अब धीरे-धीरे बढ़ रही है) या जिनके इतिहास से हमारा बहुत कम परिचय रहा है, अनुवाद के माध्यम से हिंदी साहित्य में उनका साहित्य पहुँच चुका है और इसने निश्चित रूप से हिंदी में क्रांति का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य तैयार  किया है.  अर्थात अगर अफ्रीका के या लैटिन अमरीका के किसी देश में अत्याचार होता है और कोई लेखक उसका विरोध करना चाहता है तो हिंदी में वह अपनी प्रतिक्रिया लिख सकता है.  इसके बहुत से उदाहरण उपलब्ध हैं. इस प्रकार, हिंदी अपने मूल समाज-सांस्कृतिक चरित्र से जुड़ते हुए, उसका विकास करते हुए विश्व की भाषाओँ के समाज-सांस्कृतिक चरित्र को ग्रहण करके अपना विस्तार कर रही है. यह उसके वैश्विक परिदृश्य को और अधिक विस्तारित करने के प्रति प्रतिबद्धता का सूचक है, जो बहुत आशाजनक है.
अगला महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इधर जो परिवर्तन हो रहे हैं चाहे वे बाजारवाद से संबंधित हों अथवा  युद्धों का विस्तार या उस विस्तार को रोकने की कोशिशों के रूप में विभिन्न देशों के नए सिरे से पारिभाषित हो रहे रिश्तों से जुड़े हों, चाहे विभिन्न देशों में चलने वाले आंदोलनों और लोकतांत्रिक मूल्यों की चिंताओं से संबंधित हों – उन वैश्विक परिवर्तनों को आधार बनाकर हिंदी में भी लिखा जा रहा है. उदाहरण के लिए, वैश्वीकरण पर हिंदी में स्तरीय साहित्य उपलब्ध है - उसके इतिहास पर भी, उसके कारणों और  प्रभावों-दुष्प्रभावों पर भी. यह उसके सावधान भाषा होने का या सावधान साहित्य होने का प्रमाण है.  इसी प्रकार उपनिवेशवाद, नव उपनिवेशवाद और उत्तर उपनिवेशवाद को लेकर जो नई धारणाएँ सामने आ रही हैं, उनपर दो दृष्टियों से काम हिंदी में हो रहा है. एक तो उनके चरित्र पर पुस्तकें लिखी जा रही हैं और दूसरे  नव उपनिवेशवाद और उत्तर उपनिवेशवाद की पारिभाषिक शब्दावली की व्याख्या हिंदी में लिखी जा रही है. जो हिंदी साहित्य में समालोचना का हिस्सा बन रही है. यह काम भविष्य में हिंदी को समृद्ध करने वाला काम है क्योंकि जिन खतरों के खिलाफ दूसरे देशों की भाषाओँ में विचार किया जा रहा है, लोग लिख रहे हैं, बात कर रहे हैं; वे खतरे हमारे यहाँ न हों इसकी पूर्व तैयारी हिंदी में है या उस दिशा में लोग काम कर रहे हैं, कोशिश कर रहे हैं.  इससे निश्चित रूप से हिंदी का वैश्विक परिप्रेक्ष्य बढ़ता है.
वैश्विक परिदृश्य को ग्रहण कर लेना ही पर्याप्त नहीं है. वैश्विक परिदृश्य को निरंतर माँजते जाना और उसके  वास्तविक स्वरूप का क्षरण न हो इसके प्रति सावधान रहना और वैश्विक परिदृश्य की भ्रामक  परिभाषाओं से बचना भी  बहुत ज़रूरी है. हिंदी में इसके प्रति अभी सावधानी कम है. हिंदी साहित्य इसके प्रति अभी धीरे-धीरे सावधान हो रहा है. खतरा यह है कि अगर वैश्विक परिदृश्य को परंपरागत ढंग से परिभाषाओं में बाँध दें तो वह रूढि बन जाएगी जबकि वैश्विक परिदृश्य निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया का परिणाम होना चाहिए और यह निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया विकासशील प्रक्रिया होनी चाहिए. दरअसल, जिसे हम वैश्विक परिदृश्य कह रहे हैं वह कोई चित्र नहीं है; वह एक स्थिति है और उस स्थिति में एक ओर जहाँ भौतिक चीजें शामिल हैं जो चल-फिर नहीं सकतीं और उससे अधिक चलने-फिरने वाला मनुष्य शामिल है, वहीं उससे भी ज्यादा दुनिया भर के सामाजिक और राजनैतिक वर्ग शामिल हैं जो निरंतर बदल रहे हैं, जिनकी रुचियाँ निरंतर बदल रही हैं, जिनके नए-नए अंतर्विरोध लगातार सामने आ रहे हैं, जिनके स्वभाव में लगातार बदलाव हो रहा है, जिनकी ग्रहणशीलता में लगातार बदलाव हो रहा है – यह सब जीवित मानव समूहों की बात है, जीवित सामाजिक वर्गों की बात है और इनको किसी निश्चित परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता. जब हम इन सबसे जुड़ी स्थितियों का निर्वचन करते हैं तो हमें जड़ वस्तुओं या जड़ संसाधनों के साथ-साथ जीवित संसाधनों का भी निर्वचन करना होगा; और ज्यादा सावधानी से करना होगा. यह सावधानी हिंदी साहित्य में पूरी तरह से नहीं दिखाई दे रही है. जो हिंदी के चिंतक हैं या हिंदी की चिंता करनेवाले लोग  हैं या हिंदी को दिशा देने में अपनी भूमिका का निर्वहन करने वाले लोग हैं, उन्हें यह ध्यान देना होगा कि इस दिशा में हिंदी दूसरी भाषाओँ से पिछडनी नहीं चाहिए.
हिंदी का चरित्र मूलतः समाज-सांस्कृतिक चरित्र है और इसकी समाज-सांस्कृतिकता दूसरे देशों से आयातित समाज-सांस्कृतिकता नहीं है बल्कि यह अपनी भाषाओँ से अपने देश की स्थितियों से, अपने देश के सामाजिक विकास से, अपने देश के सभ्यतागत विकास से, अपने देश के परंपरागत ज्ञान की बड़ी बृहत परंपराओं से ग्रहण की हुई समाज-सांस्कृतिकता है, इसलिए हिंदी साहित्य वैश्विक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में जो चीज ग्रहण कर रहा है वह अपनी समाज-सांस्कृतिकता के परिप्रेक्ष्य में ही ग्रहण कर रहा है. अन्य जो लोग हैं जिन्हें  वैश्विक परिदृश्य को समझना है उन्हें भी हिंदी की समाज-सांस्कृतिक विशेषताओं को समझना जरूरी है अन्यथा वैश्विक परिदृश्य की उनकी समझ अधूरी ही रहेगी. यह ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार से हिंदी के लोगों को यदि वैश्विक परिदृश्य को समझना है तो बाहर के देशों में जो कुछ वैश्विक परिप्रेक्ष्य है, हमें भी उसे समझना होगा. चाहे हम उस भाषा को सीखकर समझें, चाहे अनुवाद के माध्यम से समझें. जो दूसरे देशों की भाषाओँ का साहित्य है वह हिंदी भाषा के साहित्य से बहुत कुछ ले सकता है क्योंकि समाज-राजनैतिक दृष्टि से आज भारतवर्ष जिस दशा में पहुँच गया है, वह ऐसी स्थिति है जहाँ कोई भी देश भारत की उपेक्षा नहीं कर सकता. प्रत्येक देश के लिए ज़रूरी है कि वह भारत को समझे, तभी वह भारत से प्रगाढ़ संबंध भी बना सकता है और उसका मुकाबला भी कर सकता है. इन दोनो बातों को समझने के लिए या इन दोनों मोर्चों पर अपनी भूमिका निर्धारित करने के लिए लगभग सभी देशों को और वहाँ की भाषाओँ को जाननेवाले लोगों को हिंदी साहित्य के निकट आना ही चाहिए और उन्हें आना होगा.  आज हिंदी साहित्य की स्थिति यह है कि अगर भारत को समेकित रूप में जानना है तो हम हिंदी साहित्य पढकर ही जान  सकते हैं.  भारत के विभिन्न अंचलों को समझने के लिए वहाँ की भाषाओँ को और वहाँ के साहित्य को समझना अनिवार्य है.  लेकिन समग्र रूप से अगर एक ही जगह पर भारत को समझना है, तो फिर हमें हिंदी साहित्य का अध्ययन करना होगा और बाहर से जिसे भी भारत को समझना है उसे हिंदी साहित्य को समझने की आवश्यकता को महसूस करना होगा. जब तक भारत की अलग समाज-सांस्कृतिक पहचान रहेगी, तब तक हिंदी साहित्य की आवश्यकता विश्व अन्य समाजों को रहेगी.

- ऋषभदेव शर्मा