समर्थक

रविवार, 10 अगस्त 2014

समन्वय और मर्यादा के अग्रदूत : महाकवि तुलसीदास

तुलसी जयंती( 3अगस्त 2014) के अवसर पर विशेष

महाकवि तुलसीदास (1497 ई.- 1623 ई.) को हुए पांच सौ वर्ष से अधिक बीत गए. लेकिन वे आज भी अपने अमर महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से मनुष्य जाति का मार्गदर्शन कर रहे हैं, उसे समन्वय, आदर्श और मर्यादा की शिक्षा दे रहे हैं. संवत 1554 की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्मे इस अद्भुत बालक का मुंह देखने तक से जब अमंगल की आशंका से पिता ने इनकार किया होगा और केवल चार दिन की उम्र में माँ ने सेविका को सौंप कर प्राण त्यागे होंगे, तब भला किसे पता था कि यह बालक चिरकाल तक लोकमंगल के संदेशवाहक के रूप में कालजयी कीर्ति का कारण बनेगा. इस महान आत्मा ने अपने जीवनकाल में रामचरितमानस (1574 ई. – 1576 ई.) सहित 24 काव्यकृतियों की रचना की जिनमें रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामाज्ञाप्रश्न, दोहावली, कवितावली, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका, सतसई, छंदावली रामायण, कुंडलिया रामायण, राम शलाका, संकटमोचन, बरवै रामायण, रोला रामायण, झूलना, छप्पय रामायण, कवित्त रामायण, कलिधर्माधर्म निरूपण और हनुमान चालीसा शामिल हैं. 

रामचरितमानस काव्य की दृष्टि से तो भारतीय साहित्य का सिरमौर महाकाव्य है ही, लेकिन इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा का कारण इसमें उपलब्ध अद्वितीय उदात्त तत्व में निहित है. आदर्श गृहस्थ जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन और आदर्श लोकधर्म के साथ यह काव्य, भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य और सदाचार की शिक्षा देने वाला है. इसके नायक राम परात्पर ब्रह्म होते हुए सगुण साकार मनुष्य हैं तथा अपने सत्य, शील और प्रेम से संपूर्ण सृष्टि को संरक्षण प्रदान करने वाले हैं. 

तुलसी ने जिस काल में रामचरितमानस की रचना की और राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम महानायक की सृष्टि की, वह समय भारतीय इतिहास में अत्यंत उथल-पुथल और मूल्यमूढता का समय था. अब इसे आप क्या कहेंगे कि आज का समय भी सामजिक, सांस्कृतिक दृष्टि से वैसी ही मूल्यमूढता का समय है. हनुमानप्रसाद पोद्दार ने गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस के ‘निवेदन’ में यह बिलकुल सही कहा है कि वर्तमान समय में तो, जब सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है, सारा संसार दुःख एवं अशांति की भीषण ज्वाला से जल रहा है, जगत के कोने कोने में मारकाट मची हुई है और प्रतिदिन हज़ारों मनुष्यों का संहार हो रहा है, करोड़ों-अरबों की संपत्ति एक दूसरे के विनाश के लिए खर्च की जा रही है, विज्ञान की सारी शक्ति पृथ्वी को श्मशान के रूप में परिणत करने में लगी हुई है, संसार के बड़े से बड़े मस्तिष्क संहार के नए-नए साधनों को ढूंढ निकालने में व्यस्त हैं, जगत में सुख-शांति एवं प्रेम का प्रसार करने के लिए रामचरितमानस का अनुशीलन परम आवश्यक है. 

यहाँ हमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह कथन भी याद आता है कि तुलसीदास के सामने तत्कालीन समाज में प्रचलित एक बड़ा भारी संदेह उनके चित्त को आंदोलित किये हुए था, वह यह कि जो ब्रह्म सब प्रकार की धारणाओं से ऊपर है, व्यापक है, निर्गुण है, अजन्मा है, वह क्या मनुष्य के रूप में अवतार धारण कर सकता है. इस संदेह के कारण ही निर्गुण और सगुण का विवाद उठ खड़ा हुआ था. तुलसीदास ने देखा कि यह निराधार विवाद भारतीय समाज को विखंडित कर रहा है इसीलिए उन्होंने सगुण साकार राम को अपना आराध्य मानते हुए लोगों को यह समझाया कि वे निर्गुण निराकार परात्पर ब्रह्म का ही अवतार हैं – मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सो दसरथ अजिर विहारी. इस प्रकार उन्होंने निर्गुण और सगुण का अथवा साकार और निराकार का तो समन्वय किया ही ‘ईश्वर अंश जीव अविनासी’ कह कर द्वैत और अद्वैत का भी समन्वय कर दिया. इतना ही नहीं, उनके राम शिव को पूजते हैं और शिव निरंतर राम को भजते हैं. इसका अर्थ यह है कि तुलसी ने रामचरितमानस द्वारा शैव और वैष्णव मतों का भी समन्वय किया. अगर यह कहा जाए कि रामचरितमानस संपूर्ण समाज को संगठित करने की समन्वय चेष्टा से ओतप्रोत है तो अतिशयोक्ति न होगी. आप तनिक सा ध्यान देकर यह देख सकते हैं कि रामचरितमानस में लोक और शास्त्र का समन्वय है, भक्ति, कर्म और योग का समन्वय है, नर और वानर का समन्वय है, नगर और अरण्य का समन्वय है, राजकुल और गुरुकुल का समन्वय है. राम वनगमन से लेकर लंकाविजय अभियान के पूर्ण होने तक केवट, निषादराज, ऋषि-मुनि, कोल-भील-किरात, गीधराज, रीछ-वानर और राक्षसों तक से भाईचारा स्थापित करते हैं. यह समनवय की विराट चेष्टा नहीं है तो और क्या है? जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसी कारण तुलसी को बुद्ध के बाद सबसे बड़ा लोकनायक माना है. इस समन्वय साधना में रामचरितमानस भारतवर्ष के अथवा भारतीय संस्कृति के सर्वोत्तम, महान, सरल और भव्य अंश की उदात्त अभिव्यक्ति बन गया है. यह महाकाव्य मनुष्य के नित्य जीवन में घटने वाले ईर्ष्या, द्वेष, सुख-दुःख और लोभ-मोह के विकारों के भीतर से मनुष्यता के परम लक्ष्य की ओर ले जाने वाला काव्य है. आगे द्विवेदी जी ने यह भी कहा है कि “रामचरित मानस के राम शोभा और सौंदर्य के आगार हैं. शौर्य और पराक्रम के निधान हैं, प्रेम के वश्य हैं. वे आरति-हरण और सरण-सुखद हैं. नरभूपाल रूप में दिखाई देने पर भी वे साक्षात परब्रह्म हैं और समस्त देवताओं द्वारा सेवित हैं. इन विविध रूपों में तुलसी दास ने अद्भुत सामंजस्य और अविरोध दिखाया है.” 

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तुलसी ईश्वर भक्ति और समर्पण में परम आस्था रखते हुए भी मनुष्य और मनुष्यत्व की तनिक भी उपेक्षा नहीं करते. उनके राम परात्पर ब्रह्म हैं, इसके बावजूद वे कहीं भी ईश्वरीय चमत्कार का सहारा नहीं लेते. वे नर-चरित के लिए पृथ्वी पर आए हैं तो मनुष्य के रूप में ही सारा संघर्ष करते हैं. इस संबंध में डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं कि ‘’ईश्वर में पूरी आस्था और मनुष्य का पूरा सम्मान ये दोनों दृष्टियाँ तुलसी में एक दूसरे से जुडी हुई हैं. सियाराम मय सब जग जानी, करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी – जैसी पंक्तियाँ इस गहरे आत्मविश्वास पर ही लिखी जा सकती हैं जहां ईश्वर और मनुष्य दोनों की एक साथ प्रतिष्ठा हो. ‘सियाराम’ यदि उनकी भक्ति के लिए आश्रय स्थल हैं तो ‘सब जग’ उनके रचनाकर्म के लिए. इतना ही नहीं, तुलसी की पहुँच घर-घर में है या वे व्यापक समाज में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं तो इसका मुख्य कारण यह है कि गृहस्थ जीवन और आत्मनिवेदन इन दोनों अनुभव क्षेत्रों के वे बड़े कवि हैं.’’ और इस बड़प्पन का आधार राम का वह चरित्र है जो मर्यादा पुरुषोत्तम है और हर तरह से विग्रहवान धर्म का प्रतीक है – आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा. 

समन्वय चेष्टा और आदर्श स्थापना ही वे गुण हैं जिनके कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल तुलसीदास को लोकमंगल का प्रतिमान मानते हैं और डॉ. नामवर सिंह समाज का अग्रचेता. तुलसी के काव्य से समाज ने उच्च कोटि की लोकनीति और नई मर्यादा की शिक्षा प्राप्त की. नामवर सिंह के शब्दों में, “भारतीय तुलसी के लोक हितकारी मर्यादा पुरुषोत्तम राम के लिए, साध्वी सती सीता के लिए, त्यागी तथा स्नेहमूर्ति अनुज लक्ष्मण तथा भरत के लिए और अनन्य भक्त हनुमान के लिए मानस को पढ़ते हैं और पढते रहेंगे. हम आज भी तुलसी को अपने में, अपने को तुलसी में पाते हैं, इसीलिए उन्हें और केवल उन्हें पढ़ते हैं.”

वास्तव में गोस्वामी तुलसीदास किसी परलोक या स्वर्ग को चाहने वाले कवि नहीं थे. वे नरक बन चुके इसी संसार में स्वर्ग को उतारना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने अध्यात्म-साधना के व्यक्तिधर्म के ऊपर समाज-साधना रूपी लोकधर्म को रखा. कहना न होगा कि तुलसी का यह लोकधर्म ईश्वर की तुलना में जनता के व्यावहारिक जीवन में व्यवस्था और मर्यादा स्थापित करने से संबंधित है. वे इस लोकधर्म के सहारे ही भारतीय समाज का नियमन करना चाहते हैं. उन्होंने देखा कि भारतीय समाज सामाजिक-सांप्रदायिक विषमता का शिकार हो रहा है, तो उसके सामने ऐसे सुशासन की संकल्पना रखी जिसमें समाज के सभी वर्ग एक समान प्रगति और समृद्धि के स्वामी हों तथा किसी प्रकार का रोग-शोक न हो, दरिद्रता न हो, दीनता न हो - रामराज बैठे त्रैलोका , हर्षित भये गए सब शोका. यहाँ हम पुनः डॉ.नामवर सिंह के इस कथन को दुहराना चाहेंगे कि “इसके लिए उन्होंने रामराज्य का आदर्श रखा है जिसमें भिन्न भिन्न वर्णों के बीच कर्म एवं मर्यादा की लकीरें स्पष्ट खिंची हैं. यों तो उन्होंने राज्य की सुव्यवस्था के लिए एक राजा को आवश्यक बतलाया किंतु लोकमत पर सदा ज़ोर दिया. उनके राम स्वेच्छाचारी नहीं अपितु जनता के साथ बैठे हुए हैं. xxx वे समष्टि की उन्नति में व्यष्टि के भावों को कुचलने के पक्ष में नहीं हैं, वे व्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल्य समझते हैं. गोस्वामी जी के ये विचार आज भी कितने नवीन से लगते हैं - न वे जॉन स्टुअर्ट मिल की तरह व्यक्तिवाद के एक छोर पर हैं न नीत्शे की तरह राज्य के एक छोर पर. यहाँ भी गोस्वामी जी समन्वयवादी हैं.’’ 

अंत में यह कहा जा सकता है कि समन्वय, मर्यादा और आदर्श को समर्पित तुलसी का काव्य रामराज्य के रूप में एक ऐसे समाज की अवधारणा को सामने रखता है जहां ज्ञानबल, बाहुबल, धनबल और सेवाबल का समुचित समन्वय है. इस व्यवस्था में विभाजन की तुलना में समन्वय केंद्रीय तत्व है – 
बैर न कर काहू सन कोई / राम प्रताप विषमता खोई / सब नर करहिं परस्पर प्रीति / चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति.
(संपादकीय / रामायण संदर्शन / अगस्त 2014) 

सोमवार, 21 जुलाई 2014

समकाल को समझने की सार्थक कोशिश

पुस्तक चर्चा: ऋषभ देव शर्मा
समकाल को समझने की सार्थक कोशिश
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
पतझड़ का इतिहास/ ए. अरविंदाक्षन (कविता संग्रह)/ पृष्ठ – 104/ मूल्य – रु. 125/ 2013/ मानव प्रकाशन, 131, चित्तरंजन एवेन्यू, कोलकाता – 700 073.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

‘पतझड़ का इतिहास’ (2013) प्रो. ए. अरविंदाक्षन की आठवीं काव्य कृति है. हिंदी और मलयालम में समान गति रखने वाले ए. अरविंदाक्षन कवि, आलोचक और अनुवादक के रूप में अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित हैं. उनकी कविताएँ जटिलताओं भरे समकाल को समझने की सार्थक कोशिश की सटीक परिणतियाँ हैं. उन्होंने भूमिका में सही ही कहा है कि कविता के बनने की प्रक्रिया में केवल समकाल ही समाहित नहीं होता बल्कि इसमें एक बृहत्तर समय अथवा बृहत्तर संस्कृति का योगदान रहता है.
अस्सी कविताओं के इस संग्रह की शीर्षक कविता समय और संवेदना के संबंध को आँकने की कोशिश करती हुई कहती है - पतझड़ के इतिहास को जानना है/ तो चाहिए/ विभिन्न ऋतुओं से संवाद करें/ वे बता सकते हैं/ पतझड़ का इतिहास/ शायद वसंत ही बता पाएगा/ पतझड़ कितना दुखद है/ पतझड़ कितना दारुण है. (पतझड़ का इतिहास). पतझड़ और वसंत की इस विरोधी समानांतरता में द्वंद्व और तनाव तो है ही लेकिन इससे अभिव्यक्त होने वाला बृहत्तर समय का नैरंतर्य कवि के जीवन दर्शन का वाचक है.
इस संग्रह में शब्द और मौन का द्वंद्व बार बार उभरा है जो वस्तुतः आज के शब्दकर्मियों की त्रासदी को दर्शाता है क्योंकि वे एक ऐसे तानाशाह समय में रह रहे हैं जिसमें किसी का रोना धोना/ भावुक होना/ फुसफुसाना/ शब्दों का अपव्यय करना/ क़ानूनन अपराध है. (राजा रानी की कहानी). यह ऐसा समय है जिसमें ध्वनियों की गूढ़ वक्रताओं और/ अट्टहासों के बलात्कारों ने/ हमारी श्रवण शक्ति को खत्म कर दिया है. (प्रियतर शब्द). इस समय में एक अद्भुत मौन से घिरे हुए व्यक्ति को बस इतना मालूम है कि मुझे मालूम नहीं/ मैं भी क्यों मौन हो गया? (अद्भुत मौन). यह व्यक्ति इसलिए बेहद बेचैन है कि सआदत हसन मंटो के साथ/ मैं संवाद कर पाता हूँ./ बावजूद इसके/ वह अपरिचित था मेरे लिए./ अपने देश के नेताओं से मैं संवाद नहीं कर पा रहा हूँ/ उनकी जुबान एकदम अजनबी है मेरे लिए/ वह कौन सी जुबान है? (संवाद क्यों संभव नहीं है?). ऐसे में कवि जब अपनी जमीन से खदेड़ दिए गए लोगों की तस्वीर की आँखों में झाँककर देखता है तो उसे बेहद तकलीफ होती है क्योंकि दोनों इतने गहरे हैं/ जहाँ मौन का अंधेरा ही अंधेरा है/ कुछ और दिखाई नहीं देता है (मौन की गहराई).

और भी कई तरह का मौन डॉ. अरविंदाक्षन की इन कविताओं में मुखर हुआ है लेकिन भाषा, शब्द और संगीत भी अपनी समस्त व्यंजना के साथ यहाँ उपस्थित हैं. एक कविता देखते चलें - उसे बस/ शब्दों से ही जानना हुआ/ शब्द इतने सुडौल थे उसके/ और गंध युक्त भी/ एक बार उसके शब्दों का स्पर्श किया गया-/ पहली बार मुझे लगा/ शब्द को छुआ जा सकता है/ शब्दों के अंग-प्रत्यंगों को/ उनके खुरदरेपन को/ मुझे लगा/ शब्दों की मात्र बाहरी बुनावट नहीं/ शब्दों में जीवन-स्पंदन भी है. (शब्दों से जानना)

चलाचली की बेला में

पुस्तक चर्चा: ऋषभ देव शर्मा
चलाचली की बेला में
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
त्रिकाल संध्या/ परमजीत स. जज्ज (उपन्यास)/ पृष्ठ – 136/ मूल्य – रु. 250/ 2014/ राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
पंजाबी भाषा के समर्थ उपन्यासकार परमजीत स. जज्ज (1955) ने अपने उपन्यास ‘त्रिकाल संध्या’ (2014) में हमारी शताब्दी की एक अत्यंत ज्वलंत समस्या को सहानुभूतिपूर्वक विश्लेषित किया है. इस समस्या का संबंध वृद्धों के पुनर्वास से है. वृद्धावस्था विमर्श को समर्पित इस कथाकृति में ठहराव और गति का वह तनाव बेहद तल्ख़ अंदाज में व्यंजित हुआ है जो जीवन की संध्या को उपलब्ध हो चुके वृद्धों के समय और उत्तरआधुनिकता को उपलब्ध कर रहे युवतर समय के परस्पर घात-प्रतिघात से उभरता है. ठहराव और गत्वरता का यह द्वंद्व नीम के पेड़ और नजदीक से गुजरती ट्रेन के प्रतीकों के माध्यम से गहराता है.
वृद्धावस्था केवल जीवन का ठहर जाना ही नहीं मृत्यु की प्रतीक्षा भी है – इस कुरूप यथार्थ को यह कृति भली प्रकार उभारती है. सुंदर सिंह की आत्महत्या इस प्रतीक्षा की क्रूर परिणति है क्योंकि जीवन और जगत के खुले पृष्ठ पर जब व्यक्ति को अपना अस्तित्व इतना निरर्थक लगने लगे कि उसके लिए हाशिए पर भी जगह न हो तो रंगमंच से हट जाने के अलावा उसके समक्ष अन्य विकल्प बचता भी क्या है?
इसके बावजूद उपन्यास में वृद्धों के पुनर्वास के अत्यंत संभावनापूर्ण क्षेत्र के रूप में अपने परिवेश की गतिविधियों से जुड़ाव को प्रस्तावित किया गया है. यह प्रस्ताव मुख्य पात्र इंदर के माध्यम से मूर्तिमान होता है.
चक दौलतराम एक गाँव का नाम है और ‘त्रिकाल संध्या’ इस गाँव के एक दिन की गाथा है जो 3 मई 1997 को प्रातःकाल 5 बजे शुरू होती है और रात घिरने पर सुंदर सिंह की आत्महत्या के साथ पूरी होती है. यह दिन गाँव के वृद्धों का दिन है. यह लग सकता है कि ये वृद्ध जो कभी गाँव की और अपने परिवारों की पूरी व्यवस्था की धुरी हुआ करते थे अब उस व्यवस्था के बाहर आ पड़े हैं और उनका दिन बेहद फालतू है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये वृद्ध न रहें तो गाँव की जीवनधारा सूख जाएगी क्योंकि ये ही तो उन सामाजिक संबंधों को अपने भीतर सहेजे हुए हैं जहाँ से आत्मीयता के स्रोत फूटते हैं. कथाकार ने मास्टर रौनक सिंह, कॉमरेड खेमचंद और कवि प्रताप के माध्यम से यह संकेत दिया है कि सहजता, प्रेम और सम्मान के सहारे एक ऐसे समाज की रचना की जा सकती है जहाँ किसी इंदर को अफीम की शरण न लेनी पड़े और किसी सुंदर को आत्महत्या न करनी पड़े.  


सलीके से बखिया उधेड़ना

पुस्तक चर्चा: ऋषभ देव शर्मा   
सलीके से बखिया उधेड़ना
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
आया राम गया राम का दुखड़ा (हास्य-व्यंग्य संकलन)/ एम. उपेंद्र/ पृष्ठ 124/ मूल्य रु.400/ 2014/ क्लासिक पब्लिशिंग कंपनी, नई दिल्ली 
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

हैदराबाद के वरिष्ठ व्यंग्यकार एम. उपेंद्र के चौथे हास्य-व्यंग्य संकलन आया राम गया राम का दुखड़ा’ (2014) में उनके 24 हास्य-व्यंग्यात्मक निबंध संकलित हैं. सूचना, तर्क और हास्य-व्यंग्य से भरे हुए ये निबंध उन्होंने विगत 30 वर्षों में विभिन्न समसामयिक विडंबनाओं से उद्वेलित होकर लिखे हैं. जैसा कि स्वयं लेखक ने कहा है, ये निबंध मुख्य रूप से मनुष्य की रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित हैं और इनमें व्यक्ति, परिवार, समाज और राजनीति से जुड़ी ऐसी समस्याओं को उठाया गया है जिनका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को होता है.
एम. उपेंद्र यों तो अपनी रचनाओं में और व्यक्तिगत रूप से भी खूब बोलने बतियाने वाले आदमी हैं लेकिन इस संकलन के पहले निबंध की भांति वे बोलने से पहले सोचने में यकीन रखते हैं. एक मजेदार बात उन्होंने बताई हैं कि बिना सोचे बातें करने से ही हास्य और व्यंग्य का निर्माण होता है. (पृ. 11). अब इस पर हमें कुछ नहीं कहना सिवाय इसके कि हम तो उन्हें हास्य-व्यंग्यकार मानते हैं! इसी बात को उन्होंने एक और व्यंग्य में खींचा है प्रश्न करें सोच समझकर, जिसमें कई चुटकुले भी पिरो दिए हैं. बोलने या कुछ पूछने से पहले सोचना दरअसल संभल संभल कर चलना है. उपेंद्र जी बताते हैं कि हैदराबादी सड़कों पर संभलकर चलना और भी जरूरी है क्योंकि यदि नौ महीनों की गर्भवती महिला ऑटो में बैठकर हमारी सड़कों पर निकले तो सेफ डिलीवरी की पूरी गारंटी है. (पृ. 20). आशा है, आप समझ गए होने कि उपेंद्र जी अपनी रचनाओं में हास्य और व्यंग्य किस सहजता से उत्पन्न करते हैं. इस क्रम में ‘टालना एक अच्छी आदत है’ (पृ. 21), ‘उधार माँगना भी एक कला’ (पृ. 27), वाह रे मेरी दाढ़ी’ (पृ. 56) और ‘यार हम भी भाषण दे सकते हैं’ (पृ. 70) शीर्षक निबंध भी कम चुटीले नहीं हैं.
हास्य-व्यंग्य के लिए स्त्री विशेषकर पत्नी एक शाश्वत आलंबन है. ‘पछताना कंवारे रहकर’ (पृ. 33)‘बाजार गए पत्नी के साथ’ (पृ. 66) और ‘कौन औरत किसके पीछे’ (पृ. 116) इस दृष्टि से अवलोकनीय हैं. ‘स्कैनिंग काव्य गोष्ठियों की’ (पृ. 93) और ‘लोकार्पण समारोह का मतलब’ (पृ. 100) साहित्यिक समारोहों पर बढ़िया व्यंग्य है.
राजनैतिक व्यंग्य के क्षेत्र में मूलतः अर्थशास्त्री मटमरी उपेंद्र जी अच्छी खासी पहचान रखते हैं. इस संकलन में ‘यार हम भी भाषण दे सकते हैं’ (पृ. 71), ‘गिरगिट राम की अपील’ (पृ. 79), ‘आया राम गया राम का दुखड़ा’ (पृ. 82), ‘भारत भाग्य विधाता’ (पृ. 91), ‘न्याय’ (पृ. 106) और ‘समाजवाद’ (पृ. 111) में राजनैतिक परिवेश की बखिया बड़े सलीके से उधेड़ी गई है.

अंत में, कुलमिलाकर हँसने और सोचने के लिए एक साथ मजबूर करने वाली किताब!

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

कथाभाषा और काव्यभाषा का समाजशैलीवैज्ञानिक अध्ययन

भूमिका
साहित्य भाषा के सर्जनात्मक व्यवहार से जन्म लेता है. यही कारण है कि उसे भाषिक कला और शब्दों पर झेले गए सौंदर्य के प्रतिफलन के रूप में व्याख्यायित किया जाता है. भाषा के सर्जनात्मक व्यवहार से साहित्य में प्रयुक्त शब्द रमणीय अर्थ का प्रतिपादक बन पाता है. यह रमणीय अर्थवत्ता प्राप्त करने से पहले शब्द को सामाजिक व्यवहार में संसिद्धि प्राप्त करनी होती है. शैलीविज्ञान जहाँ शब्द की रमणीय अर्थप्रतिपदाकता को पाठ के स्तर पर परखता है वहीं साहित्यिक शब्द प्रयोग के औचित्य की पड़ताल की जिम्मेदारी समाजभाषाविज्ञान बखूबी वहन करता है. परंतु विस्मय की बात है कि साहित्य भाषा को समाजभाषिक और समाज शैलीवैज्ञानिक दृष्टि से विवेचित करने वाले समीक्षा ग्रंथ हिंदी में बहुत कम हैं. डॉ. एन. लक्ष्मी का यह ग्रंथ इस दृष्टि से एक नई जमीन तोड़ने का प्रयास कहा जा सकता है. इसमें कविता और कथा के पाठ विश्लेषण के लिए समाज शैलीवैज्ञानिक व्याख्या के रूप में आलोचना की जो प्रणाली प्रतिपादित की गई है वह सामाजिक दृष्टि से साहित्य भाषा के व्यवहारौचित्य पर केंद्रित होने के कारण अत्यंत विश्वसनीय है.
लेखिका ने विस्तारपूर्वक समाज शैलीविज्ञान की सैद्धांतिक पीठिका का विवेचन किया है. इसके लिए उन्होंने भाषा और समाज के संबंध की विवेचना करते हुए भाषा की सामाजिक अवधारणा को स्पष्ट करने के बाद समाजभाषाविज्ञान की संकल्पना और उसके लक्षणों पर प्रकाश डाला है. समाजभाषाविज्ञान की संकल्पनाओं के अंतर्गत भाषा व्यवहार, भाषा व्यवस्था, भाषा समुदाय, द्विभाषिकता, बहुभाषिकता, कोड मिश्रण, कोड परिवर्तन, पिजिन और क्रियोल पर सैद्धांतिक चर्चा के उपरांत इस ग्रंथ में समाज शैलीविज्ञान के नियामक बिंदुओं पर भी सरल, सहज ढंग से प्रकाश डाला गया है. लेखिका ने औपचारिक, अनौपचारिक और बाजारू शैली के अंतर को स्पष्ट करने के बाद समाज शैलीविज्ञान की अत्यंत महत्वपूर्ण संकल्पनाओं के रूप में शब्द चयन, संवाद, एकालाप, सर्वनाम और संबोधन प्रयोग तथा प्रोक्ति गठन को समझाने का प्रयास किया है. कहना न होगा कि समाज शैलीविज्ञान की दृष्टि से साहित्य भाषा के विवेचन के लिए ये ही सब उपकरण अपनाए जा सकते हैं. व्यावहारिक खंड में लेखिका ने ऐसा ही किया भी है.
इस ग्रंथ के व्यावहारिक आलोचना पक्ष में कथाभाषा और काव्यभाषा का विश्लेषण शामिल है. साहित्य भाषा के इन दोनों रूपों की सैद्धांतिकी को विविध विद्वानों के विचारों का मंथन करते हुए सुस्थिर किया गया है. कथाभाषा और काव्यभाषा दोनों में ही भाषा की लोच का उपयोग किया जाता है. पर दोनों की यह लोच अलग अलग होती है जो मिट्टी और पानी के प्रकार और अनुपात से कुम्हार की बर्तन बनाने वाली सामग्री की तरह नियंत्रित होती है. मिट्टी का अनुपात अधिक होने से कथाभाषा और पानी का अनुपात अधिक होने से काव्यभाषा!
कथाभाषा की सैद्धांतिकी को स्पष्ट करते हुए लिखिका ने हिंदी कथाभाषा के विकास के विविध चरणों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य तो उभारा ही है, उसके सामाजिक परिप्रेक्ष्य को भी रेखांकित किया है. इसी प्रकार काव्यभाषा की सैद्धांतिक चर्चा को आधुनिक युग की विभिन्न काव्यधाराओं के संदर्भ में विवेचित किया गया है. हिंदी काव्यभाषा के बारे में मुझे आदिकाल से आज तक यह तथ्य बहुत रोचक लगता है कि जब जब किसी विशिष्ट धारा या कवि के द्वारा काव्यभाषा अथवा काव्यशैली को अनुल्लंघ्य उत्कृष्ट ऊँचाई पर पहुँचा दिया जाता है अथवा विशिष्ट और असाधारण बना दिया जाता है तब तब हिंदी काव्यभाषा साधारणता की ओर नया प्रस्थान चुनती है. हिंदी काव्यभाषा के विभिन्न वर्तन बिंदु साधारणता की खोज के बिंदु है.
डॉ. एन. लक्ष्मी के इस ग्रंथ का व्यावहारिक पक्ष अत्यंत प्रबल है. जहाँ उन्होंने प्रेमचंद, रेणु, भगवती चरण वर्मा, कमलेश्वर और अमरकांत की कथाभाषा की शैलीय विशेषताओं को विश्लेषित किया है वहीं मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, महादेवी, पंत, निराला, अज्ञेय, रघुवीर सहाय और बच्चन की काव्यभाषा की भी शैलीय विशेषताओं को भली प्रकार उकेरा है .
यह ग्रंथ काव्यभाषा और कथाभाषा के समाजशैलीय दृष्टि से पाठ विश्लेषण के कारण भी विशिष्ट, महत्वपूर्ण और संग्रहणीय बन गया है. हिंदी में साहित्यिक ‘पाठ विश्लेषण’ के पुरोधा भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह द्वारा निर्धारित मानकों का यथाशक्ति उपयोग करते हुए इस ग्रंथ की लेखिका ने गुल्लीडंडा (प्रेमचंद), अजविलाप (संजीव), गउन (कृष्णा अग्निहोत्री) और सुहागिनें (मोहन राकेश) जैसी कहानियों का समाजभाषिक पाठ विश्लेषण किया है तो दूसरी ओर अरुण कमल (फिर वही आवाज/ ओह बेचारी बूढ़ी बुढ़िया/ करमा का गीत/ छोटी दुनिया), केदारनाथ सिंह (कुछ सूत्र जो किसान बाप ने बेटे को दिए), हेमंत पुकरेती (शोक प्रकट करने के लिए जाती औरतें), जितेंद्र श्रीवास्तव (एक सोते हुए आदमी को देखकर) और विनोद कुमार शुक्ल (एक विशाल चट्टान के ऊपर/ तथा) जैसे विशिष्ट शैलीकार कवियों की चयनित कविताओं के पाठ का समाजभाषिक दृष्टि से सूक्ष्म विश्लेषण किया है.
साहित्यिक पाठ विमर्श के लिए समाज शैलीविज्ञान के उपकरणों को आधार बनाकर किए गए कथाभाषा और काव्यभाषा के इस विश्लेषण से गुजरने पर किसी को भी यह सुखद विस्मय होना स्वाभाविक है कि इस पद्धति द्वारा किसी साहित्यिक कृति में निहित सर्जनात्मकता और सूक्ष्म अर्थों की पहचान अत्यंत सटीकता और विश्वसनीयता के साथ की जा सकती है. विश्वास किया जाना चाहिए कि यह ग्रंथ साहित्य और भाषा के अध्येताओं के लिए उपयोगी और रोचक सिद्ध होगा.
शुभकामनाओं सहित
18 जुलाई 2014                                                   - ऋषभ देव शर्मा