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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

वंचित संवेदना के साहित्य पर ग्रंथ-त्रयी

 वंचित संवेदना का साहित्य/
खंड – 1 : दलित विमर्श, खंड – 2 : स्त्री विमर्श, खंड – 3 – आदिवासी विमर्श /
(सं) विजेंद्र प्रताप सिंह/
2015/
आकांक्षा पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली/
 खंड 1 - 296 पृष्ठ, खंड 2 - 296 पृष्ठ, खंड 3 - 222 पृष्ठ /
मूल्य : रु. 2400 तीनों खंड
*

साहित्य समाज का अनुकरण भी करता है और अगुवाई भी. वह मनुष्यों के आंदोलनों में सम्मिलित भी होता है और उन्हें दिशा भी प्रदान करता है. जब कभी कहीं कुछ अघटनीय घट रहा होता है तो साहित्य उसकी विवेचना ही नहीं करता उसे घटित होने से रोकने का उद्यम भी करता है. इस प्रकार साहित्य सामाजिक परिवर्तनों का गवाह ही नहीं बनता बल्कि उन्हें संभव बनाने में साझेदार भी बनता है. अशिव की क्षति साहित्य का मुख्य सामाजिक प्रयोजन है जो साहित्य की लोकरक्षक भूमिका का निर्माण करता है. इसी से साहित्य सभ्यता-समीक्षा का रूप प्राप्त करता है. इस संदर्भ में विचारणीय है कि सभ्यता के विकास में मनुष्यों के कुछ समुदाय दौड़ में पीछे रह जाते हैं और आगे चलकर आगे निकले हुए समुदाय इन पिछड़े हुए समुदायों को फिर से आगे होने का अवसर नहीं देते. धीरे धीरे बीच की दूरी बढ़ती जाती है. आगे बढ़े हुओं का सत्ता-केंद्र बन जाता है. और पीछे रह गए हुओं को हाशिए में सिमटे रहना पड़ता है. हाशिए में सिमटे हुए ये समुदाय धीरे धीरे अपनी सीमाओं में कैद हो जाते हैं और चाहकर भी केंद्र में नहीं आ पाते. उनका अस्तित्व मानो केंद्र को पुष्ट करने के लिए ही अभिशप्त होता है. उनकी अनुपस्थिति ही केंद्र की उपस्थिति को अग्रप्रस्तुत करती है. उनकी संवेदनाएँ तक केंद्र की तुलना में अप्रासंगिक हो जाती हैं. इन पीछे छूटे हुए या वंचित समुदायों में - भारतीय सभ्यता के संदर्भ में - दलित, स्त्री और आदिवासी समुदायों की गाथा अत्यंत कारुणिक है. लोकतंत्र की माँग है कि इन सबके मानवाधिकारों को बहाल किया जाए. इसी के परिणामस्वरूप हमारे साहित्य में पिछले ढाई दशक में बहुत तेजी के साथ दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श का उभार सामने आया है. शोध और समीक्षा के क्षेत्र में भी आज इन विमर्शों का बोलबाला है. 

विजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा संपादित ग्रंथ-त्रयी ‘वंचित संवेदना का साहित्य’ (2015) हिंदी साहित्य में दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श के क्रमिक उभार, इनकी सैद्धांतिकी, उपलब्धियों और सीमाओं के विवेचन को समर्पित है. 

इस त्रयी के प्रथम खंड में दलित विमर्श केंद्र में है. यहाँ 27 सुचिंतित आलेखों के माध्यम से भारतीय समाज और विशेष रूप से हिंदी साहित्य के संदर्भ में दलित प्रश्नों पर सोदाहरण सटीक चर्चा की गई है. संपादक की मान्यता है कि आज भी दलित सिर्फ और सिर्फ दलित हैं तथा सदियों से चला आ रहा जातिगत संघर्ष आज भी उनके जीवन का अभिन्न अंग है. मैत्रेयी पुष्पा (अछूत स्त्रियाँ मंदिर में), शरण कुमार लिम्बाले (दलित सिर्फ दलित होता है), गुर्रमकोंडा नीरजा (दलित आत्मकथाओं का समाजभाषिक संदर्भ), तुलसीराम (लिखी नहीं, रोई जाती हैं दलित आत्मकथाएँ), ऋषभ देव शर्मा (मानवाधिकारों की लड़ाई में दलित कहानियाँ), कमल साहू (दलित साहित्य की भाषा), भारती सागर (ग्रामीण भारत में दलित महिलाओं की प्रस्थिति एवं मुद्दे) तथा विजेंद्र प्रताप सिंह (दलित, दलित साहित्य, भाषा और समकालीन कथासाहित्य में दलित चेतना) जैसे संग्रहणीय आलेखों से युक्त इस खंड के विचारोत्तेजक होने में कोई दो राय नहीं. 

त्रयी के दूसरे खंड के केंद्र में है स्त्री विमर्श. पल पल कहीं-न-कहीं सताई जा रही औरतों वाले हमारे महान देश की 21वीं शताब्दी की वैश्विक उपलब्धियाँ गिनवानी हों तो शायद घरेलू हिंसा और बलात्कार या कुलमिलाकर स्त्रियों पर अपराध के मामले में हमारे देश को निर्विवाद रूप से स्वर्णपदक मिलने चाहिए. दरअसल हमारा समाज ऊपर ऊपर से तो बदला हुआ दिखाई देता है पर भीतर से यह घोर जड़ता का शिकार है. स्त्रियों के मामले में तो हम अपनी मानसिकता को तिल भर भी बदलने को तैयार नहीं हैं. दोगले आचरण का हमारा पुराना इतिहास है. हम स्त्रियों को सदा से पूजते भी आए हैं और उन्हें सताने में भी हमारा सानी कभी नहीं रहा. आज भी हम स्त्रियों को आगे आने या ऊपर आने के लिए खूब लफ्फाजी करते हैं और साथ ही उनके प्रति भोगवादी रवैये को तनिक भी बदलना नहीं चाहते. आज स्वाधीन होती हुई भारतीय स्त्री के चारों तरफ पुरुषवर्चस्व ने नई तरह की गुलामी की बाड़ लगा दी है. हम आज भी स्त्री को पुरुष से कमतर आंकते हैं और उसके मनुष्य होने के अधिकार को व्यावहारिक रूप में चरितार्थ नहीं होने देते. स्त्री विमर्शात्मक साहित्य भारतीय समाज के इस दोगले और घिनौने चहरे को बेपर्दा करने का काम करता है. वह इतना भर चाहता है कि स्त्री रूप में जन्म लेने के कारण किसी जीव को मनुष्य होने के अधिकार से वंचित न रखा जाए. इस समुदाय की वंचित संवेदना को (अथवा वंचित समुदाय की संवेदना को) इस खंड में भली प्रकार विवेचित किया गया है. मृदुला गर्ग, सुधा अरोड़ा, संगीता पुरी, सुषमा बेदी, सुशीला टाकभोरे, गुर्रमकोंडा नीरजा, रोहिणी अग्रवाल, गिरिराज शरण अग्रवाल, प्रीत अरोड़ा और विजेंद्र प्रताप सिंह सहित 29 लेखकों ने इस खंड में बहुत सूक्ष्मता और ईमानदारी और विस्तार के साथ हिंदी के स्त्री विमर्शात्मक साहित्य की व्यापक पड़ताल की है. स्त्री विमर्श पर शोध करने वालों के लिए यह एक आवश्यक ग्रंथ है. 

‘वंचित संवेदना का साहित्य’ शीर्षक ग्रंथ-त्रयी का तीसरा खंड आदिवासी विमर्श को समर्पित है. इस खंड में रमणिका गुप्ता, निर्मला पुतुल, मधु कांकरिया, हेमराज मीणा, गंगा सहाय मीणा, विनोद विश्वकर्मा, विजेंद्र प्रताप सिंह, सातप्पा लहु चव्हाण आदि सहित 25 विमर्शकारों के आदिवासी और जनजातीय साहित्य की पड़ताल करने वाले आलेख सम्मिलित हैं. संपादक ने यह स्पष्ट किया है कि स्त्री और दलित विमर्श की तुलना में आदिवासी विमर्श की प्रकृति और प्रवृत्ति नितांत भिन्न है. स्त्री विमर्श जाति के प्रश्न को नहीं समझता. केवल स्त्री अधिकारों तक सीमित रहता है. दलित विमर्श जाति को इतना अधिक महत्व देता है कि स्त्री प्रश्न को भी जातियों में बाँट लेता है. लेकिन आदिवासी विमर्श विकास में पिछड़े हुए स्त्री पुरुषों का जातिनिरपेक्ष विमर्श है. वह अपनी रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी विद्रोह की परंपरा से लेता है. इसलिए आदिवासी साहित्य को अन्य साहित्य की तुलना में विद्रोही साहित्य या जीवनवादी साहित्य कहा जाता है. आदिवासी विमर्श को उन्होंने उस परिवर्तनकामी चेतना का रचनात्मक हस्तक्षेप माना है जो देश के मूल निवासियों के वंशजों के प्रति किसी भी प्रकार के भेद भाव का पुरजोर विरोध करती है तथा उनके जल-जंगल-जमीन और जीवन को बचाने के हक में उनके आत्मनिर्णय के अधिकार के साथ खड़ी होती है. अपने अद्यतन संदर्भों के कारण यह खंड सामान्य पाठकों और शोधार्थियों दोनों ही को अत्यंत उपादेय प्रतीत होगा. 

अंततः पाठकों के निजी विमर्श के लिए यहाँ डॉ. रमणिका गुप्ता के निबंध ‘आदिवासी संस्कृति में स्त्री का दर्जा’ का एक अंश प्रस्तुत करते हुए — इति विदा पुनर्मिलनाय : 

“ऐसे तो आदिवासी स्त्रियों की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के मिथक और भ्रम का प्रचार खूब किया जाता रहा है लेकिन उनके समाज में भी कुछ ऐसे कठोर नियम और मापदंड हैं, जो स्त्री को पुरुष से कमतर बनाने व आंकने के लिए गढ़े गए हैं. एक बात तो माननी होगी कि भारतीय संस्कृति के बिल्कुल विपरीत, आदिवासी स्त्री को अपना वर खुद चुनने की इजाजत है. इसके लिए न तो वह दंडित होती है और न ही दोषी करार दी जाती है. उनके यहाँ तो घोटुल प्रथा थी जहाँ युवा लड़के-लड़कियों को एक साथ रखकर सब प्रकार का ज्ञान दिया जाता था. यह उनका प्रशिक्षण स्थल था. इसलिए भारत की अन्य स्त्रियों के विपरीत आदिवासी लड़कियाँ लड़कों को देखकर न तो मोम की तरह पिघलती हैं और न ही बर्फ की तरह पानी-पानी हो जाती हैं, बल्कि वे उनसे बतियाती हैं, परखती हैं और अगर जीवन साथ निभाने की संभावना दिखे तो रजामंदी से ब्याह भी कर लेती हैं. न पाटने पर छोड़ने का अधिकार भी उन्हें प्राप्त है.” 

- ऋषभ देव शर्मा


भास्वर भारत, हैदराबाद/ जनवरी. 2015/ पृष्ठ 56

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

भारत की जातीय स्मृति में बसी भर्तृहरि की मुक्तक कविता

- ऋषभ देव शर्मा


स्मितेन भावेन च लज्जयाभिया
पराङगमुखै अर्ध कटाक्ष वीक्षणैः 
वचोभिरीर्ष्या कलहेन लीलया 
समस्त भावै खलु बंधनं स्त्रियः 

[मुस्कान से/ प्रणय भाव से/ लज्जा से/ कातरता से/ कुछ-कुछ तिरछी चितवन से/ मुँह फेरकर निरखने से/ अंग भंगिमाओं से/ - इन सभी से/ मन को बाँध लेती हैं रमणियाँ.] (शृंगार शतक)



न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतर वाद चंचवः 
नृपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषिता 

[न तो हम नट हैं, न गायक, न असभ्य ढंग से बात करने वाले मसखरे, और न हमारा सुंदर स्त्रियों से कोई संबंध है, फिर हमें राजाओं से क्या लेना-देना?] (नीति शतक) 


यूयं वयं वयं यूयं इत्यासीन मतिरावयोः 
किं जातम् अधुना येन – यूयं यूयं वयं वयं 

[तुम हम थे और हम तुम थे – यह हमारी और तुम्हारी बुद्धि थी. आज क्या हो गया कि हे मित्र! तुम तुम हो और हम हम हैं.] (वैराग्य शतक) 

भोगाः न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः 

तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः
कालो न यातो वयमेव याताः 
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः 

[हमने भोग नहीं भोगे, बल्कि भोग ने ही हमें भोगा है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गए हैं; काल व्यतीत नहीं हुआ, हम ही व्यतीत हुए हैं; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !] (वैराग्य शतक)


जीवन और जगत की विविध गहन अनुभूतियों को सूक्ति और सुभाषित के रूप में मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले कवियों में भर्तृहरि अनन्य हैं. उन्होंने मुक्तक रचकर महाकवियों जैसा देशकाल का अतिक्रमण करने वाला यश पाया है. उनके शृंगार शतक, नीति शतक और वैराग्य शतक भारतीय साहित्य के सिरमौर काव्यों में परिगणित हैं. उनकी जीवनबिद्ध रचनाएँ शिष्ट जन और लोक सामान्य में समान रूप में समादृत हैं. वस्तुतः वे क्रांतदर्शी मनीषी परिभू स्वयंभू सर्जक हैं. उनकी रचनाएँ मुक्तक काव्य का प्रतिमान हैं. अपने आप में संपूर्ण या अन्यनिरपेक्ष उनके ये मुक्तक पूर्वापर प्रसंग निरपेक्ष रहकर रस चर्वणा का सामर्थ्य प्रमाणित करते हैं. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इन मुक्तामणियों में महाकाव्य का सा अर्थगाम्भीर्य और गीति काव्य जैसी अनुभूतिप्रवणता का सघन संगठित रूप समाया हुआ है जिसका स्रोत जीवनानुभव की प्रामाणिकता में निहित है. 

भर्तृहरि कौन थे? कब विद्यमान थे? उनके जीवन में कैसे कैसे मोड़ आए, गए? उनकी कविता में इतनी ध्रुवांतस्पर्शी विरोधाभासी विविधता क्यों है? ऐसे अनेक प्रश्न लंबे समय से विद्वानों को उद्वेलित करते रहे हैं. इन प्रश्नों के सुनिश्चित उत्तर फिर भी हमारे पास नहीं है. हमारे पास हैं पुराणों से लेकर लोक प्रचलित किंवदंतियों तक फैली हुई अनके कथाएँ. हमारे पास है विक्रमादित्य का इतिहास. हमारे पास है ‘वाक्यपदीय’ जैसा व्याकरण और भाषाविज्ञान का गूढ़ग्रंथ. इन सबके साक्ष्यों को जोड़कर भर्तृहरि की जो एक छवि बनती है वह ईसा की पहली शताब्दी के पूर्व से लेकर तीसरी शताब्दी तक की अवधि में कभी हुए किसी निजंधरी कथा के लोकनायक जैसी छवि है. यह लोकनायक राजा भी है, संन्यासी भी. भोगी भी है और नीतिकार भी. योगी भी है और वैयाकरण भी. प्रेमी भी है और भक्त भी. अभिप्राय यह है कि भर्तृहरि असाधारण प्रतिभाशाली विद्वान रहे होंगे. और उन्होंने अपने जीवन में विविध प्रकार के अनुभव अर्जित किए होंगे जिनका प्रतिफलन उनके मुक्तक काव्य में हुआ है. 

यहाँ प्रसंगवश उस लोकगाथा की चर्चा भी आवश्यक है जिसने भर्तृहरि को राजा से संन्यासी बना डाला. कहा जाता है कि “एक बार किसी योगी ने भर्तृहरि को एक दिव्य फल दिया, जिसके खाने से अक्षय यौवन प्राप्त किया जा सकता था. भर्तृहरि अपनी पिंगला रानी को अपने से अधिक प्यार करते थे. अतः उन्होंने यह फल अपनी रानी को ही दे दिया. किंतु रानी एक अन्य पुरुष से प्रेम करती थी, अतः उसने वह फल अपने प्रेमी को दे दिया. उसका वह प्रेमी किसी वेश्या के प्रेम में डूबा हुआ था; अतः उसने वह फल वेश्या को दे दिया. उस वेश्या के हृदय में राजा भर्तृहरि के प्रति अत्यधिक सम्मान और प्रेम था. अतः उसने वह फल भर्तृहरि को समर्पित कर दिया. राजा ने उस फल को पहचान लिया और उसके संबंध में पूछताछ करके अपनी रानी के प्रेम संबंधों को जान लिया. जब रानी को यह पता चला कि राजा उसके अवैध प्रेम व्यापार को जान गए हैं तो उसने महल पर से कूद कर आत्महत्या कर ली.” इस घटना से राजा भर्तृहरि का मन सांसारिकता से विमुख हो गया और उन्होंने अपने छोटे भाई को राज्य सौंपकर वन की राह ले ली. स्मरणीय है कि अनुश्रुति के अनुसार भर्तृहरि के ये अनुज ही उज्जैन के सम्राट विक्रामादित्य हैं जिन्होंने कालांतर में विक्रम संवत का प्रवर्तन किया. भर्तृहरि के मोहभंग के अंतर्साक्ष्य के रूप में यह श्लोक प्रायः उद्धृत किया जाता है – यां चिंतयामि सततं मयि सा विरक्ता/ सापि अन्यं इच्छति जनं स जनोन्य सक्तः / अस्मतकृते च परिशुष्यति काचिदन्या/ धिक् ताम् च तं च मदनं च इमां च मां च. (मैं सतत जिसका चिंतन करता हूँ वह मुझसे विरक्त तथा अन्य के प्रति अनुरक्त है. वह भी किसी और को चाहता है जबकि वह अन्या मेरे प्रति चिंतित है. - उसे और उसे, कामदेव को, इसे और मुझे धिक्कार है.)

यहाँ यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि भर्तृहरि का समय भारतीय समाज और संस्कृति के इतिहास में एक प्रकार से संक्रमण का समय था. (बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः/ अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्विद्वान लोग ईर्ष्या से भरे हैं, राजा लोग गर्व से चूर हैं और अन्य लोग अज्ञान के मारे हुए हैं, इसलिए उपयोग के अभाव में सुभाषित मेरे अंगों में ही जीर्ण-शीर्ण हो गया.) उस समय राजतंत्र कमजोर पड़ रहा था और सामंत वर्ग के माध्यम से इस देश में नई सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्था पनप रही थी. उस समय के विविध अंतर्विरोध ही प्रकारांतर से भर्तृहरि के परस्पर विरोधाभासी व्यक्तित्व के आयामों के प्रतीक हैं. सत्ता, संन्यास, व्याकरण, साहित्य. लोक और शास्त्र सब यहाँ आकर अपने अपेन ढंग से भर्तृहरि के कवि मानस को पुष्ट करते हैं. कहीं न कहीं भोग के यथार्थ को उजागर करने वाला भर्तृहरि का यह काव्य मानवीय संबंधों के पतन से ग्रस्त आज के मूल्यमूढ़ समाज के लिए संभवतः इसीलिए प्रासंगिक है कि उस काल और इस काल की सामाजिक-सांस्कृतिक चिंताएँ किसी न किसी रूप में एक जैसी हैं. 

इसमें संदेह नहीं कि भर्तृहरि बेहद संवेदनशील और अद्भुत कल्पनाशक्ति से संपन्न प्रातिभ कवि थे. उन्होंने कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाने वाली समाहार शक्ति तो अर्जित की ही थी, अत्यंत सूक्ष्म भावों को सहज पारदर्शी अभिव्यक्ति प्रदान करने की कला में भी वे निष्णात थे. उन्होंने यह जान लिया था कि मनुष्य के जीवन की कृतार्थता धन संचय में नहीं कविता, कला और संगीत की उन तरंगों से एकाकार होने में है जो उसे राग-द्वेष से मुक्त करके उसके भीतर की सात्विकता को उद्रिक्त करती हैं. इसीलिए उन्होंने साहित्य, संगीत और कला से विहीन व्यक्ति को पशु की श्रेणी में रखा है और यह माना है कि सामान्य व्यक्ति से लेकर राजा और राज्य तक के लिए कलाओं की सिद्धि अनिवार्य आवश्यकता है. भर्तृहरि हिंदी के कवि तुलसीदास और अंग्रेजी के कवि पोप की भांति कठिन विषय की सरल अभिव्यक्ति में माहिर मर्मस्पर्शी सहज कवि माने गए हैं. उन्होंने अपने काव्य में सांसारिक जीवन की विसंगतियों, विकृतियों और क्षुद्रताओं के नग्न यथार्थ को खोलकर रख दिया है. इस अर्थ में वे घोर यथार्थवादी प्रतीत होते हैं. लेकिन इस यथार्थ चित्रण का उद्देश्य मनुष्य में निहित सात्विक और उदात्त तत्वों को जागृत करना है जो उन्हें उच्च जीवन मूल्यों के प्रतिष्ठापक आदर्शवादी कवि के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त है. 

लगभग दो हजार से अधिक वर्षों से भर्तृहरि का काव्य भारतीय साहित्यकारों को प्रेरित करता आ रहा है. यदि यह कहा जाए कि अपने शतकों के माध्यम से लोक में व्याप्त होकर भर्तृहरि भारत की जातीय स्मृति के अनिवार्य अंग बन चुके हैं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी. कालिदास (जो संभवतः भर्तृहरि के समकालीन थे या उनके तुरंत बाद हुए थे) से लेकर आधुनिक काल तक के कवियों की उक्तियों में पग पग पर भर्तृहरि की सूक्तियों के प्रतिफलन को खोजा जा सकता है. खासतौर से हिंदी का मध्यकालीन मुक्तक काव्य तो उनके प्रति ऋणी है ही. यही कारण है कि आज के समय में भी उनके शतकों को समकालीन काव्य शैली मैं ढालकर नए नए काव्यानुवाद सामने आ रहे हैं. कुछ दशक पूर्व ओंकारनाथ श्रीवास्तव द्वारा ‘वैराग्य शतक’ का अत्यंत मनोरम हिंदी काव्यानुवाद प्रस्तुत किया गया था, तो इधर के वर्षों में राजेश जोशी ने ‘नीति शतक’ का बेहद मार्मिक काव्यानुवाद प्रस्तुत करके भर्तृहरि की प्रासंगिकता को रेखांकित किया ही है, आज की कविता को अपनी परंपरा के साथ जोड़ने का भी महत्कार्य किया है. 

अंत में, राजेश जोशी द्वारा किए गए ‘नीति शतक’ के अनुवाद के कुछ अंश यहाँ बिना टिप्पणी के उद्धृत किए जा रहे हैं जिन्हें हमने <नई बात.ब्लागस्पाट.इन> से साभार ग्रहण किया है – 


महामूर्ख 


मगर की दाढ़ से मणि निकाल कर
ला सकता है आदमी
मचलती लहरों में तैरता 
समुद्र पार कर सकता है आदमी.
आदमी फूलों की माला–सा पहन सकता है
सर पर क्रोधित सांप को
पर नहीं बदल सकता वह
महामूर्ख का मन ! 


रेत को पेर कर 


रेत को पेर कर 
तेल निकाल सकता है आदमी
मरीचिका में भी
पी सकता है पानी
बुझा सकता है प्यास.
शायद !
भटक-भटकाकर आदमी 
खोज कर ला ही सकता है
सींग ख़रग़ोश के.
पर नहीं बदल सकता
ख़ुश नहीं कर सकता वह
महामूर्ख का मन. 


एक दुष्ट को 


एक दुष्ट को 
मीठी मीठी बातों से
लाना रास्ते पर?
यानि
नाजुक मृणाल के डोरों से बांधकर
रोकने की कोशिश करना हाथी को
हीरे को छेदने की कोशिश 
शिरीष के फूलों की नोक से
यानी
समुद्र को मीठा करने की कोशिश 
शहद की एक बूंद से !


पतन 


उतरी स्वर्ग से पशुपति के मस्तक पर
पशुपति के मस्तक से उतरी
ऊंचे पर्वत पर
उतरी ऊंचे पर्वत से
नीचे धरा पर
पृथ्वी से उतर कर 
समुद्र में समा गई गंगा.
विवेकहीन मनुष्य का
इसी तरह सौ तरह 
होता है पतन. 


दवा 


बुझाया जा सकता
आग को पानी से
छाते से रोका जा सकता है
धूप को.
नुकीले अंकुश से मदमत्त हाथी को
और गाय और गधे को
किया ही जा सकता है बस में
पीट-पाट कर.
रोग की दवाओं से
और ज़हर को उतारा जा सकता है
मंत्रों से.
बताई है शास्त्रों ने हर चीज़ की दवा
पर दवा कोई नहीं 
कोई नहीं है दवा
महामूर्ख की. 


बिना सींग और पूंछ वाला जानवर 


बिना सींग और पूंछ वाला 
जानवर है वह
वह जो शून्य है
साहित्य कला और संगीत से
बिना घास खाए
जो जीता है वह
तो यह भाग्य ही है
इस धराधाम के जानवरों का ! 


संग 


दुर्गम पहाड़ों में 
वनचरों के साथ साथ
घूमना अच्छा.
पर बैठना अच्छा नहीं 
मूर्खों के साथ साथ
इन्द्र-भवन में भी.


मणियों का क्या दोष 


जिस राजा के राज में
भटकते हों निर्धन ऐसे कवि
कविता जिनकी सुंदर 
शास्त्रों के शब्दों सी
कविता जिनकी ज़रूरी
बहुत ज़रूरी शिष्यों के वास्ते
तो राजा ही है मूर्ख
समर्थ है विद्वान तो बिना धन के भी
हक़ है उसे करे निन्दा
अज्ञानी जौहरी की
गिरा दिया है जिसने मूल्य मणियों का 
इसमें दोष क्या है भला मणियों का !


राहु 


वृहस्पति और पांच छह ग्रह 
और भी हैं
आकाश गंगा में
पर किसी से नहीं लेता दुश्मनी मोल
वह पराक्रमी राहु
पर्व में वह ग्रसता है 
सिर्फ़ तेजस्वी सूर्य और चंद्रमा को
जबकि सिर्फ़
सिर ही बचा है 
उसकी देह में.


कांचन 


बस धनवान ही हैं कुलीन 
धनवान ही हैं पण्डित 
वही है
सारे शास्त्रों और गुणों का भण्डार
वही है सुंदर
वही है दिखलौट
सारे गुण क्योंकि
बसते हैं कांचन में ! 


कल्पतरू 


हे राजन
दुहना है अगर तुम्हें
इस पृथ्वी की गाय को
तो पहले हष्ट-पुष्ट करो
इस लोक रूपी बछड़े को
अच्छी तरह पाला पोषा जाए
जब इस लोक को
तभी फलता फूलता है
भूमि का यह कल्पतरू. 


ओ चातक 


ओ चातक ! 
घड़ी भर को
ज़रा कान देकर सुनो मेरी बात
बहुत से बादल हैं आकाश में
पर एक से नहीं हैं
सारे बादल
कुछ हैं बरसते
जो भिगो डालते हैं सारी पृथ्वी को
और कुछ हैं जो
सिर्फ़ गरजते ही रहते हैं लगातार
ओ मित्र
मत मांगो हर एक से दया की भीख ! 


दोस्ती 


दूध ने दे डाला सारा दूधपन
अपने से मिले पानी को
गर्म हुआ जब दूध
पानी ने जला डाला अपने को 
आग में.
दोस्त पर आयी जब आफ़त
तो उफ़न कर गिरने लगा दूध भी
आग में.
पानी से ही हुआ वह फिर शांत
ऐसी ही होती है दोस्ती
सच्ची और खरी.


आफ़तें 


हाथ से फेंकी गई गेंद
फिर उछलती है
टप्पा खा कर
आफ़तें स्थायी नहीं होतीं
अच्छे लोगों की. 


गंजा 


धूप ने तपा डाली 
जब चांद गंजे को
तो छाया की तलाश में
पहुंचा वह एक ताड़ के नीचे 
ताड़ से गिरा फल 
और तड़ाक से फोड़ दिया
उसने गंजे का सर
जहां कहीं जाता है भाग्य का मारा
आफ़तें साथ साथ जाती हैं
उसके. 


ललाट पर लिखी 


करील पर न हों पत्ते
तो बसंत का क्या दोष
नहीं टिपे उल्लू को दिन में 
तो सूरज का क्या दोष
पानी की धार न गिरे चातक के मुंह में
तो बादल का क्या दोष
बिधना ने जो लिख दी है ललाट पर
कौन मेट सकता है उसे ! 


कर्म 


ब्रह्माण्ड का घड़ा रचने को
जिसने कुम्हार बनाया ब्रह्मा को
दशावतार लेने के जंजाल में 
डाल दिया जिसने विष्णु को
रुद्र से भीख मंगवाई जिसने
हाथ में कपाल लेकर
जिसके आदेश से हर रोज़
आकाश में चक्कर लगाता है सूर्य,
उस कर्म को 
नमस्कार !
नमस्कार ! 


राजपाट क्या है 


लाभ, लाभ क्या है
गुनियों की संगत है लाभ.
दुख, दुख क्या है
संग, मूर्खों का संग है दुख,
हानि, हानि क्या है
समय चूकना है हानि.
क्या है, क्या है निपुणता.
धर्म और तत्व को जानना है निपुणता
कौन है, कौन है वीर
वीर है, जो जीत ले इंद्रियों को
प्रेयसी, प्रेयसी कौन है
पत्नी, पत्नी ही है प्रियतमा
धन, धन क्या है
ज्ञान, ज्ञान ही है धन
सुख, सुख क्या है
यात्रा, यात्रा ही है सुख;
तो फिर राजपाट क्या है !!

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

तेलुगु काव्य 'धरती माँ' :सुद्दाला अशोक तेजा


भूमिका 
धरती माँ / तेलुगु कविताओं का हिंदी अनुवाद /
रचनाकार - सुद्दाला अशोक तेजा /
अनुवादक - एम. रंगय्या /
 एमेस्को बुक्स, हैदराबाद-29 /
2014 / 144  पृष्ठ  / 90 रूपए. 


समकालीन तेलुगु कविता का फलक अत्यंत विस्तीर्ण और पहुँच अत्यंत पैनी है. यह कविता अपने चारों ओर के घटनाचक्र के प्रति अत्यंत सजग होने के साथ साथ मनोभावों और भावोद्वेलनों के प्रति भी पूरी ईमानदार है. यह देखकर विस्मय होता है कि तेलुगु कविता प्रकृति और पर्यावरण के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करने में कोई कोरकसर नहीं उठा रखती – भले ही इसमें कवित्व की क्षति का ख़तरा भी हो. उसके लिए कला से अधिक महत्वपूर्ण है जीवनराग. इस जीवनराग की बहुविध अभिव्यक्ति करते हुए आज की तेलुगु कविता कभी जल तो कभी वायु, या कभी पृथ्वी, और कभी आकाश से स्वयं को संबद्ध करके अभिव्यंजना के नए मुहावरे की तलाश करती है. तेलंगाना के प्रतिष्ठित सिने कवि सुद्दाला अशोक तेजा ने भी अपने इस कविता संग्रह ‘धरती माँ’ की साठ कविताओं में पर्यावरण विमर्श का ऐसा ही नया व्यंजना-मुहावरा तलाश करने की कोशिश की है. 

‘धरती माँ’ की कविताएँ इस सनातन विश्वास से संप्रेरित प्रतीत होती हैं कि पृथ्वी माँ है और हम उसकी संतान हैं. पृथ्वी की यह गरिमा वेदों से चलकर रामायण-महाभारत से होती हुई कवि अशोक तेजा तक पहुँची है. वैदिक ऋषि ने अत्यंत उल्लासपूर्वक 'पृथिवी सूक्त' रचा था, जो मनुष्य जाति की अब तक की श्रेष्ठतम कविताओं में परिगणित है. धरती माँ के प्रति वैसी मुग्धता, निष्ठा और दायित्व भावना आज के मनुष्य में कहाँ? कवि उसी पावन संबंध की खोज कर रहा है. इस खोज में उसे धरती माँ, अपनी माँ और वन माँ एक ही वात्सल्य की विस्तीर्ण व्यंजनाएँ प्रतीत होती हैं. पृथ्वी और मनुष्य के इस संबंध ने ही सभ्यता एवं संस्कृति का आविष्कार और विकास किया है. पृथ्वी सारी प्रकृति को धारण करती है. संरक्षण देती है. पृथ्वी मनुष्य को वह ऊर्जा प्रदान करती है जिसके बल पर वह जीवन का युद्ध लड़ता है, जीतता है. जीवन के इस युद्ध में मनुष्य ने अनेकानेक आविष्कार किए हैं, यंत्र निर्मित किए हैं. कवि मानव सभ्यता के पूरे विकास को यंत्रों के इस रूपक के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए इस सत्य का प्रतिपादन करता है कि श्रम ही वेद है और मानव जीवन का वास्तविक सौंदर्य श्रमसीकर में है, स्वेद में है.

सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल करते हुए कवि अशोक तेजा ने धरती का स्तवन उसके जाये वृक्ष-लता- गुल्मों, वन-पर्वत-नदियों की आराधना के रूप में अत्यंत प्रभावी शैली में किया है. कवि का हृदय यह देखकर चीत्कार कर उठता है कि जो मानव संस्कृति मूलतः प्रकृति-निर्भरा थी. वह यांत्रिकता के चरम उत्कर्ष से उपजी अंधी उपभोक्ता संस्कृति के कारण विकृत होकर प्रकृति-विरोधी हिंसक और विध्वंसक बन गई है. वृक्षों और वनों के प्रति ममता तथा धरती और प्रकृति के प्रति पूज्य भाव जगाने की कोशिश करने वाली ये कविताएँ तथाकथित उत्तरआधुनिक बाजारवादी और युद्धक मनुष्य जाति को चेतावनी देती हुई प्रतीत होती हैं. मनुष्य का अस्तित्व पृथ्वीग्रह के अस्तित्व के साथ नाभिनालबद्ध है. पृथ्वी मिटेगी तो मनुष्य भी मिटेगा. मनुष्य को बचना है तो पृथ्वी को बचाना होगा. पृथ्वी को बचाने का एक ही रास्ता है कि उसके प्रति पूज्य बुद्धि पुनः स्थापित हो. सही अर्थ में आज के बुद्धिवादी मनुष्य को धरती के प्रति माँ जैसा भावात्मक संबंध पुनः स्थापित करना होगा. इसी के लिए कवि नई पीढ़ी को उद्बोधित करता है कि वह पृथ्वी का दोहन करने की प्रवृत्ति से गुरेज करे और अपने राष्ट्र ही नहीं संपूर्ण पृथ्वी गृह की रक्षा के लिए उठ खड़ा हो. 

धरती माँ की रक्षा केवल भूमि, जल और पर्यावरण आदि की रक्षा से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि इसका संबंध लोक संस्कारों की रक्षा से भी  है. स्त्री जाति का सम्मान भी इसी का एक पक्ष है. बच्चों की सुरक्षा के बिना पृथ्वी के भविष्य की रक्षा भला कैसे की जाती है. यही कारण है कि कवि सुद्दाला अशोक तेजा लोक के विभिन्न उपादानों, खेतीबाड़ी, गीत-संगीत, रिश्ते-नाते और गाँव-घर के प्रति गहरा लगाव रखते हैं. वे कन्या भ्रूण हत्या को अमानुषिक मानते हैं,  मातृत्व को व्यक्तित्व की परिपूर्णता समझते हैं,  स्त्री को अमृत का पर्याय घोषित करते हैं और अर्धांगिनी को नमन करते हैं.  मनुष्य और मनुष्य के बीच जाति, धर्म, लिंग अथवा अन्य किसी भी प्रकार के भेदभाव को वे पृथ्वी की रक्षा में बाधक मानते हैं. उन्हें ऐसे परिवर्तन की आकांक्षा है जो मनुष्य की जीत के लिए जीवन से भरे गीत से उत्प्रेरित हो और सृष्टि यजन में प्रत्येक नागरिक की समिधा से परिपुष्ट हो. अभिप्राय यह है कि कवि अशोक तेजा परस्पर आत्मीयता से परिपूर्ण ऐसे भूमंडल की कल्पना करते हैं जिसमें प्रकृति और मनुष्य साहचर्य भाव से निवास करें. भोग्य और भोक्ताभाव से नहीं. 

21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में आज जब समस्त भूमंडल बाजारवाद की आंधी में उड़ा जा रहा है और मनुष्य के हाथ से मनुष्यता का साथ छूटा जा रहा है, ऐसे में ये कविताएँ अत्यंत आश्वस्तिकर हैं, क्योंकि ये कविताएँ भटके हुए मानव शिशु की उंगली धरती माँ के हाथ में थमाना चाहती है. 

तेलुगु की उत्कृष्ट कविताओं को हिंदी समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का स्तुत्य उद्यम सुप्रतिष्ठित कवि और अनुवादक डॉ. एम. रंगय्या ने अत्यंत निष्ठापूर्वक किया है. डॉ. एम. रंगय्या बहुभाषाविद साहित्य साधक हैं और कविताओं के मर्म को पहचान कर पूरी सावधानी के साथ लक्ष्यभाषा पाठ रचते हैं. ‘धरती माँ’ के प्रति उनकी यह आराधना सफल हो, इसी शुभकामना के साथ ..... 



28 अप्रैल 2014                                                                                     - डॉ. ऋषभदेव शर्मा