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मंगलवार, 25 नवंबर 2014

सोनिया

16/11/2014 को कादंबिनी क्लब, हैदराबाद द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभागार में आयोजित समारोह में अरुणाचल प्रदेश की युवा लेखिका डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने नजीबाबाद के वरिष्ठ कवि डॉ. अशोक स्नेही  की काव्यकृति ''सोनिया'' का लोकार्पण किया. इस अवसर पर प्रो. देवराज [वर्धा] और डॉ. अहिल्या मिश्र [हैदराबाद] ने कवि को बधाई दी तथा प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लोकार्पित प्रेमकाव्य के अंशों का वाचन किया. प्रकाशक अमन कुमार त्यागी ने 'सोनिया' की समीक्षा प्रस्तुत की तथा डॉ. अशोक स्नेही ने फोन-वार्ता करते हुए सबके प्रति आभार व्यक्त किया.


भूमिका


प्रेम सृष्टि की मूल शक्ति है. वही आकर्षण और चेतना का स्रोत है, मुक्त मनोभाव है. प्रेम व्यक्ति को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाता है. प्रेम जीवन को सार्थकता प्रदान करता है और प्रेम का अभाव जीवन को भटका देता है. सारे भाव प्रेम में से ही उपजते हैं, उसी में विलसते हैं  और उसी में लीन हो जाते हैं. प्रेम की यह लीला देश और काल की सीमाओं से परे देह और दैहिकता के पार मन और आत्मा की लीला है. प्रेम ऐसा अहोभाव है जो हमारे अस्तित्व पर कोमलता के किसी क्षण में गुलाब की पंखुड़ियों पर बरसती हुई ओस की बूंदों की तरह उतरता है. जब हमारे अस्तित्व पर प्रेम उतरता है तो हम रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरते हैं, सहज संवेदनशील हो उठते हैं. प्रेम में पाना महत्वपूर्ण नहीं होता, प्रेम में होना महत्वपूर्ण होता है. खोने-पाने का गणित व्यापारी रखा करते हैं, प्रेमीजन नहीं. प्रेम जब उतरता है तो कविता फूटती है. यह हो सकता है कि हर प्रेमी कवि न होता हो पर कविता फूटती अवश्य है. भले ही निःशब्द रह जाए. 

यही विस्मयकारी अनुभव अशोक स्नेही (1954) के अस्तित्व पर भी उतरा है. स्वभावतः कविता भी फूट पड़ी है. निःशब्द नहीं सशब्द; क्योंकि अशोक स्नेही आतंरिक अनुभूतियों को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करना जानते हैं. प्रणय के स्पंदनों को, अपरिचिता के साथ कल्पना लोक में विहार की विविध मनोदशाओं को, शब्दचित्रों में बाँधना उन्हें भली प्रकार आता है. उनके मनोजगत की सर्वथा निजी अनुभूतियों का मुकुलित और प्रस्फुटित रूप है – ‘सोनिया’. यह अनपाए प्यार की अद्भुत गाथा है. 

‘सोनिया’ डॉ. अशोक स्नेही की काव्यकला का सुंदर नमूना है. इसमें कवि ने अपरिचित प्रेयसी के साथ कल्पना में रास रचाया है. मिलन और विरह के सारे अनुभव कोमल मन के झनझनाते तारों पर झेले हैं. मनवीणा के तारों की इस झंकार में कभी अप्रतिम रूप की अभ्यर्धना बज उठती है तो कभी उत्कंठित मानस की इच्छाएँ तरंगित होने लगती हैं. प्रिया का रूप कवि को प्रकृति के साथ एकाकार प्रतीत होता है और प्रकृति प्रिया के एक एक अंग में समाई लगती है. इस अपरिचित कविप्रिया के होंठ दहकते लाल टेसू हैं, नयन बहकते मस्त भँवरे हैं, अंग अंग चहकता है, चंचल चितवन दुधारी तलवार चलाती है और गालों पर अंगार खिलते हैं. यह नायिका अत्यंत कोमल है, चंचल है, मोहिनी है. कभी कवि को वह इतनी निकट लगती है कि मिलन की मन्नतें माँगकर इच्छाओं की पूर्ति का द्योतक कलावा कलाई में बाँध लेती है और रविवार की छुट्टी में कवि उसे पीपल पर नाम गोदने चलने के लिए आमंत्रित करता है; तो कभी कवि स्वयं को सम्मोहित अनुभव करता है – ऐसे हर क्षण में प्रिया अपनी नरम उँगलियों से छूकर नवरस रंग बहार का संचार करती है, काव्य की प्रेरणा बन जाती है. चरम समर्पण के क्षणों में यह कविप्रिया गंगा और माँ भी बन जाती है. वही सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक मूल्य क्षरण के बीच नई मूल्य चेतना का प्रतीक बनकर प्रकट होती है और वही सारे प्रवादों और अपवादों के बीच सहज संबल प्रदान करती है. 

इसमें संदेह नहीं कि डॉ. अशोक स्नेही के जीवन में प्रेम का यह अवतरण उस मोड़ पर हुआ है जब कवि को यह अनुभव हो चुका है कि संबंधों के ताने-बाने मकड़ी के जाले हैं, जीवन समझौतों का दूसरा नाम है. ऐसी स्थिति में इस प्रेम के सहारे कवि एक समानांतर दुनिया में, सपनों के संसार में, ही मुक्ति का बोध पाता है, इस समानांतर संसार में ही घने बबूलों के जंगल, दरिंदों के दंगल, विघ्न और अमंगल को विलीन करने वाला ऐसा जादू है, जिसके लोक में पहुंचकर कवि यथार्थ जगत के समस्त दुखों से निस्तार पाता है. यह समानांतर जगत ही डॉ. अशोक स्नेही की ‘सोनिया’ का जगत है, रूप के जादू का जगत है, प्रेम का जगत है. 

प्रेम के इस जादुई जगत के सृजन और प्रकाशन के लिए कवि को बधाई देते हुए मैं उनके यश की कामना करता हूँ. 

12 जून 2014                                                                                                         - ऋषभदेव शर्मा 
नजीबाबाद  (यात्रा)                                                                                                     

शनिवार, 22 नवंबर 2014

'बा-बेला'

दो शब्द

यह सृष्टि प्रेम की लीलाभूमि है. प्रेम ही वह तंतु है जो सृष्टि के विभिन्न पात्रों को परस्पर जोड़ता है – चाहे वे जड़ या चेतन हों, चाहे वे पशु या मनुष्य हों, चाहे वे जलचर या नभचर हों, अथवा चाहे वे स्त्री और पुरुष हों. सृष्टि में विविधता है, अनेकरूपता है, समानताएँ और असमानताएँ हैं. इन सबके संबंधों के ताने-बाने को रचने वाली शक्ति प्रेम ही है. प्रेम को पनपने के लिए संवेदनशीलता चाहिए होती है. केवल अपने आप में रमा रहने वाला कोई भी प्राणी प्रेम नहीं कर सकता. प्रेम के लिए अहं का विगलित होना और आत्म का विस्तार होना मूलभूत आवश्यकता है. संवेदनशीलता किसी भी प्राणी को अहं की अंधेरी सुरंग के दबाव से मुक्त करके आत्मविस्तार की उजली धूप का प्रसार प्रदान करती है. प्रेम तत्व के जागने से आत्मा के आवरण तड़क कर टूट जाते हैं. यह प्रेम ही पशु को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाता है. प्रेम मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाता है और प्रेम छिन जाए तो जीवन नष्ट हो जाता है. यही कारण है कि प्रेम – संयोग और वियोग – का चित्रण सदा से साहित्य के केंद्र में रहा है, आज भी है और आगे भी रहेगा. प्रेम के साथ जुड़ी हुई पीड़ा इस विषय को कभी बासी नहीं होने देती. सब प्रेम कथाएँ बड़ी सीमा तक एक जैसी होती हैं. फिर भी बार बार कही-सुनी जाती हैं, लिखी-पढ़ी जाती हैं. 

हैदराबाद के कवि-कथाकार देवा प्रसाद मयला ने भी एक और प्रेमकथा लिखी है. वे बाल साहित्य की रचना में विशेष रुचि लेते हैं इसलिए अपनी यह प्रेमकथा उन्होंने टार्जन और जंगल बुक आदि के शिल्प में गढ़ने का प्रयास किया है. सृष्टि की आदि प्रेमकथा पक्षी और मनुष्य की प्रेमकथा रही है. देवा प्रसाद मयला की प्रेमकथा वनमानुष और मानवी की प्रेमकथा है जिसमें कई प्रचलित ऐसी लोककथाओं की अनुगूंजें भी सुनाई पड़ती हैं जिनमें पशु और मनुष्य के बीच संवेदना के तंतु प्रेम का संसार रचते हैं. देवा प्रसाद ने एक ऐसे वनमानुष की कल्पना की है जो कबीलाई युद्ध में अपने सब प्रियजन को खो चुका है. उसके लक्ष्यहीन जीवन को तब नई दिशा मिल जाती है जब वह एक लकडबग्घे के चंगुल से एक असहाय लड़की को बचाता है. जटायु भले ही रावण से सीता को न बचा पाया हो पर यहाँ उसकी याद अवश्य आती है. किसी अन्य लोक के प्राणी से उर्वशी की रक्षा करने वाला पुरूरवा भी यहाँ याद आता है. दरअसल उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम कहानी ही सृष्टि की पहली ऐसी प्रेमकथा है जिसमें उड़ने वाले प्राणी और मनुष्य का प्रेम दर्शाया गया है. देवा प्रसाद की प्रेमगाथा में वनमानुष बचाई हुई लड़की का रखवाला बन जाता है क्योंकि वह भी सर्वथा अकेली है. दोनों के बीच साहचर्यजनित संवेदनामूलक उत्सर्गपरक राग का उदय होता है. दोनों एक दूसरे के लिए भावनात्मक जरूरत बन जाते हैं. 

वह प्रेमकथा ही क्या जिसमें संयोग घटित न होते हों. ऐसे संयोग जो वियोग का कारण बनें. मनुष्य कन्या और वनमानुष के अपारिभाषित संबंध पर भी संयोग की मार पड़ती है और मनुष्य कन्या एक दिन गायब हो जाती है. यहाँ फिर अभिशप्त उर्वशी का अंतर्धान होना याद आता है. यह भी याद आता है कि अनेक वर्षों तक बाल लीलाएँ करने औए रास लीला रचाने के बाद गोपियों के मध्य से कृष्ण भी अंतर्धान हो गए थे. प्रेम की यह परिणति कथा में करुणा और त्रास को उत्पन्न करती है. द्रवित हृदय लिए वनमानुष जंगल जंगल, पर्वत पर्वत अपने खोए हुए प्यार को खोजता है. संपूर्ण प्रकृति बिंब प्रतिबिंब भाव से इस प्रेमलीला में बराबर की साझेदार है. इसीलिए संयोग में प्रफुल्लित रहने वाला बन भी वियोग में वनमानुष के साथ धीरे धीरे सूख जाता है. मर जाता है. मीरा की कामना थी कि सारा शरीर भले ही कौए नोच नोचकर खा जाएँ लेकिन पिया मिलन की आस से भरे दो नेत्र बचे रहें. वन और वनमानुष का भी अंत कुछ ऐसा ही है. कहीं कोई लघु मरुद्यान शेष है तो वह मनुष्य कन्या के आने की राह देख रहा है. 

देवा प्रसाद मयला ने ‘बा-बेला’ के रूप में एक रोचक प्रेमकथा रची है जो बच्चों को भी पसंद आएगी और बड़ों को भी. रचनाकार के लेखन में निखार की शुभकामना के साथ इस कृति के प्रकाशन पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ. 

22 नवंबर 2014 -                                                                                                                    ऋषभदेव शर्मा

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

[नया ज्ञानोदय] हमारी बुआ


मूल तेलुगु कविता – शिखामणि 
हिंदी अनुवाद – ऋषभ देव शर्मा


  


उसका कोई गाँव नहीं था, बस झोंपडपट्टी थी
उसका कोई नाम नहीं था, केवल जाति हुआ करती थी
कोई सुख नहीं था उसके हिस्से, बस मेहनत थी
वह हमारी बुआ थी – तुम उसकी कहानी सुनोगे ?

बुआ कोई आम औरत नहीं थी;
पपीते के पेड़ सा लंबा–ऊंचा कद  
पीछे को न मुडती  नदी सी चाल;
सरू के पेड़ की तरह आसमान को चुनौती देती
हमारी बुआ
कसकर कोंछा मारे
हाथ में हँसिया उठाए
खेतों को जाती तो लगता
काली नागिन चली जा रही है - फन फैलाए!

बुआ का रंग काला था – पक्का काला;
पके ढेरों जामुनों का काला रंग
जुती हुई काली मिट्टी का आबनूसी काला रंग
खेतों के बीच नालियों में खिले काले कुमुदों का काला रंग !

और उसके माथे की वह लाल बिंदी;
ताजी पकी लाल मिर्च के ढेर सी सुर्ख लाल!

बुआ का रंग काला था,
पर मन एकदम गोरा – तरबूज के फूल सा
एकदम नरम – सेमल की रुई सा
एकदम शीतल – रात के मांड सा !


सृष्टि के आरंभ में जन्मी थी हमारी बुआ
उसके बाद ही कामकाज पैदा हुआ,
मनुष्य भर नहीं थी हमारी बुआ
कामकाज का आदिम औज़ार थी.

पिछवाड़े रीठे के पेड़ पर सुस्ताते कव्वे
पौ फटते हमारी बुआ से वक्त पूछते
और जब वह आँगन बुहार कर
झाडू वाला हाथ ऊपर उठाती
तो अनुशासित ढंग से परे हट जाते
बादलों के टुकड़ों समेत आकाशगंगा के तारे;
भौंचक रह जाती भोर - साफ़ सुथरे आँगन को निहार !

पनघट पर जाती बुआ
तो छोटी छोटी मछलियों की तरह
चार सीढ़ियों नीचे से पानी मचलने लगता,
चूमने लगता बुआ के पैरों की उँगलियाँ बार बार !

बरसात के आते ही
बरसी अनबरसी बदलियों के टुकड़े
खुशी और गम से पिघले बिना
चुपचाप तैरते थे बुआ की कजरारी आँखों में !

रोपाई के वक्त एक पौधा रोपती बुआ
अपनी तर्जनी के पोरुवे से
तो सारे खेत लहलहा उठते
पाल्मूरू [महबूबनगर] के विशाल वटवृक्ष [पिल्लल मर्रि] की तरह;
बुआ फिर भी खेत में खड़ी दीखती ठुट्ट की तरह !
होते होंगे सुबह और शाम सूरज के वास्ते
पर कभी न था आराम धनुषवत कमेरी बुआ के वास्ते !

ग्रामदेवता के कल्याणोत्सव में
और बच्चों के दोपहरी भोजन के कार्यक्रम में
अचानक फूट पड़ते पक्षपात की तरह
बुआ के घिस चुके चांदी के कड़ों से
लाख बुझी बुझी सी झांकती थी.!

जीवन भर बुआ बस बोझा ढोती रही;
चावल की ढाई मन की बोरी की उसके आगे क्या बिसात थी?

मैं सोचता हूँ
नारियल को अपनी जंघाओं से सटाकर
तीन वार में छील डालने वाली
हमारी बुआ ने  [भेदभाव ग्रस्त] कारमचेडू में जनम क्यों नहीं लिया?
गाँव से मनमुटाव होने पर
आँचल में पिसी मिर्च और हाथ में लालटेन लिए
रात रात भर नदी किनारे चौकीदारी में घूमती
हमारी बुआ ने [अन्याय ग्रस्त] चुंडूर में जनम क्यों नहीं लिया?

मैं सोचता हूँ
हमारी बुआ को
कल नहीं, आज होना चाहिए था!!

['प्रसार भारती' के 'राष्ट्रीय कवि सम्मलेन -2013' के लिए अनूदित]

नया ज्ञानोदय, अक्टूबर 2014. 
पृष्ठ: 162 - 163


मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

अद्यतन जनसंचार माध्यम : साहित्यिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य






द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : 18 तथा 19 अक्टूबर 2014 
श्री सिद्धरामेश्वर महाविद्यालय, कमलनगर, कर्नाटक 

बीज भाषण : डॉ. ऋषभदेव शर्मा 

अद्यतन जनसंचार माध्यम : साहित्यिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

1.

साहित्यिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में अद्यतन जनसंचार माध्यमों के स्वरूप, कार्यप्रणाली और प्रभाव पर विचार करने से सबसे पहले यह स्पष्ट होता है कि मीडिया हमारी भाषा को प्रभावित कर रहा है. यह प्रभाव दो प्रकार का है – 

(i)
विभिन्न जनसंचार माध्यम नई भाषा गढ़ रहे हैं. 

इस भाषा का मुख्य लक्षण है – भाषा मिश्रण. 

इसमें अंग्रेजी का हस्तक्षेप सबसे ज्यादा है और लगातार बढ़ रहा है. 

रोमन लिपि में और नागरी लिपि में अंग्रेजी शब्द, वाक्यांश, वाक्य, उक्तियाँ मीडिया की भाषा के अनिवार्य अंग बन गए हैं. 

बहुत बार तो हिंदी को भी रोमन लिपि में लिखकर हम खुश हो लेते हैं कि हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है. 

(ii)
स्ट्रेटजी ऑफ लैंग्वेज शिफ्ट : प्रभु जोशी 

मीडिया पहले से चली आ रही हमारी भाषा परंपरा को विस्थापित करके इस गढ़ी गई भाषा को स्थापित करने की कोशिश करता दिखाई देता है = यूथ कल्चर की छलिया आनंद (मैनिपुलेटिड प्लेज़र) की भाषा 

इसमें संदेह नहीं कि भाषा का स्वभाव परिवर्तनशील होता है. परंतु इसके बावजूद उसकी एक सामाजिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा होती है. यह परंपरा उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और भाषिक व्यवहारों में निहित होती है जिन्हें कोई भाषा समाज सैकड़ों-हजारों वर्षों की यात्रा में विकसित, अर्जित और नई पीढ़ी को संक्रमित करता है. 

अतः जब हम कहते हैं कि कोई भाषा परंपरा विस्थापित की जा रही है तो इसका अर्थ होता है कि उस परंपरा में जुड़े ज्ञान को विस्थापित किया जा रहा है. 

सांस्कृतिक चेतना को विस्थापित किया जा रहा है. 

खतरा यह है कि परंपराहीन भाषा के तथाकथित बहुवचनीय रूप के स्थापित होने से विस्थापन से उत्पन्न सांस्कृतिक शून्य भरता दिखाई नहीं देता क्योंकि इस नई गढ़ी गई भाषा की अपनी कोई संस्कृति नहीं है. 

इसमें संदेह नहीं कि एक केंद्रापसारी और सार्वदेशिक जनभाषा होने के कारण हिंदी की प्रकृति विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की रही है जो इसकी बहुत बड़ी ताकत है. लेकिन जनसंचार माध्यमों ने जिस प्रकार हिंदी भाषा के अंग्रेजीकरण की मुहिम चला रखी है उसमें तो हिंदी की प्रकृति ही गायब है

सवाल यह है कि यह कौन तय करेगा कि मिश्रण कितने प्रतिशत होना चाहिए. यह निर्धारण न सहज है न संभव. 

जनसंचार माध्यम इस कृत्रिम भाषा के प्रति अपने उपभोक्ता की रुचि पैदा कर रहे हैं और उस रुचि का भरण पोषण भी कर रहे हैं. अर्थात माँग और आपूर्ति दोनों पर इन्हीं का कब्जा है. 

यह भ्रम पैदा किया जा रहा है कि इस गढ़ी गई भाषा का प्रयोग न करने वाले लोग पिछड़े हुए हैं, उनका ज्ञान सीमित है. 

स्ट्रेटजी ऑफ लैंग्वेज शिफ्ट – क्रियोलीकरण की प्रक्रिया 

(1) स्मूथ डिस्लोकेशन ऑफ वोक्यूब्लरि (मूल भाषा के शब्दों का धीरे धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन) – Students, Parents, Teachers, Exams, Opportunity, Entrance, Sunday, India, Ordinary 

(2) Final assault on a Language (अंतिम हमला : लिपि बदलना) .


2.

 दूसरी बात बाजार और उसकी रीति-नीति के आक्रमण से जुड़ी है. 

जनमाध्यमों का व्यापक प्रचार-प्रसार ज्ञान, मनोरंजन और लोक शिक्षा में सहायक होना चाहिए था. लेकिन विज्ञापन और प्रतिष्ठानी प्रायोजन पर निर्भर होने के कारण मीडिया लगभग पूरी तरह से बाजार का उपकरण बन गया है. 

एफ एम रेडियो/ ज्ञान और परिष्कार का बड़ा साधन/ स्तरहीन फूहड़ कार्यक्रमों की बाढ़ 

सांस्कृतिक विकास के रास्ते में आने वाले प्रश्नों से बचना आज के चतुर चालाक मीडिया की पहचान बन गया है. 

आज सांस्कृतिक विकास की भी इनकी गढ़ी हुई परिभाषा प्रौद्योगिकी केंद्रित परिभाषा है. अर्थात उन्नत प्रौद्योगिकी माने उन्नत संस्कृति! संस्कृति में निहित उन्नत मनुष्यता को इस उन्नत प्रौद्योगिकी ने विस्थापित कर दिया. 

प्रौद्योगिकी केंद्रित और मीडिया द्वारा प्रायोजित सांस्कृतिक विकास की संकल्पना प्रतिक्षण परिवर्तन की संकल्पना है. उपयोग करो और फेंको. स्थायित्व के लिए कोई जगह नहीं. न व्यापार-व्यवसाय में, न राजनीति-कूटनीति में और न ही रिश्ते-नाते और प्रेम संबंधों में. 

तमाम राजनेता बड़ी बेशर्मी से रोज यह दोहराते हैं – राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. सच तो यह है कि राजनीति में ही नहीं मीडिया और बाजार की संस्कृति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. विवाह और तलाक भी नहीं. 

इसी सबको समाचारों, बहसों, विज्ञापनों, नाटकों, यथार्थ प्रदर्शनों (रियालिटी शो) और फिल्मों के माध्यम से पुनः पुनः प्रचारित-प्रसारित किया जाता है. परिणामस्वरूप हमारे जीवन में यथार्थ के स्थान पर आभासी यथार्थ पहले स्थान पर आ गया है. 

मीडिया के सहारे बाजार ने हमारे जीवन और चिंतन को आक्रांत कर लिया है. 

आज उत्पादन और उत्पाद महत्वपूर्ण नहीं है. सर्विस महत्वपूर्ण है. आज का उपभोक्ता वस्तुओं को आफ्टर सेल सर्विस की सुविधा के आकर्षक विज्ञापन के आधार पर खरीदता है. अर्थात सर्विस सेक्टर हावी हो गया है. 

धमकी भरा आशावाद : सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी ! : बाजार में आगे!

सेवा प्रदाता आपके घर के दरवाजे पर डिलीवरी से लेकर सर्विस तक के लिए प्रस्तुत है. यानी एक नई तरह का बाजार अब हर घर के भीतर कई कई मोबाइल सेटों, टीवी चैनलों और इंटरनेट नमक नए जनसंचार माध्यम के रूप में 24 घंटे यही आवाज लगाता रहता है – बेचो, बेचो, बेचो ....... खरीदो, खरीदो, खरीदो... ऐसा नहीं लगता कि हम घर में रहते हैं और कभी कभी बाजार जाते हैं. अब तो हम बाजार में रहते हैं और घर कब पहुँचेंगे पता नहीं. 

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुंचा देता;
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे. (दुष्यंत कुमार) 

3.

सांस्कृतिक संकट : 

संस्कृति का काम है विकास को स्थायित्व प्रदान करना और उसे अपनी परंपरा से जोड़ना. 

बाजार आश्रित मीडिया जिस विकास को प्रचारित करता है उसमें इन दोनों चीजों (स्थायित्व और परंपरा) के लिए कोई जगह नहीं है. वह ‘पॉपुलर कल्चर’ के नाम पर एक ऐसी संस्कृति गढ़ रहा है जिसमें स्मृति के लिए भी कोई स्थान नहीं है. यही करण है कि 21वीं शताब्दी की तमाम नई फिल्में बिजनेस तो करोड़ों का करती हैं लेकिन अगली फिल्म के आते ही पुरानी और कालातीत हो जाती हैं. जिस तरह एक बार पढ़े जाने के बाद अखबार और उसकी ख़बरें बासी हो जाती हैं. विचार नहीं; वाचालता.

ब्राडकास्टिंग इन थर्ड वर्ल्ड (ई-काट्ज और जी. बेबल) : 

जनसंचार में घुसकर सूचना साम्राज्यवादियों ने अपनी धूर्त सांस्कृतिक राजनीति की कुटिलता द्वारा तीसरी दुनिया की ‘भाषा’ और ‘संस्कृति’ को तहस-नहस कर दिया है. 

वाचाल : डी जे/ आरजे/ एंकर : हर चीज को मस्ती, मजा, Fun बना दें, कामुकता से जोड़ दें. 

मीडिया सनसनी और उत्तेजना की क्षणजीवी संस्कृति की रचना करता है. जबकि साहित्य का लक्ष्य कालजयी संस्कृति को रचना होता है. आज खतरा यह पैदा हो गया है कि साहित्य और संस्कृति का स्थान मीडिया के उत्पाद लेते जा रहे हैं. 

प्रभु जोशी : गालियों की नई पैकेजिंग – इडियट, बास्टर्ड, मदर .... फकर (YUPIES की भाषा) + तमीजदार हिंदी बोलने वाला = मसखरी + अभद्र व लंपट भाषा = युवा अभिव्यक्ति का आदर्श 

मीडिया द्वारा खड़े किए गए इस विभ्रम (इल्यूशन) को पहचानकर सत्वोद्रेक पर आधारित साहित्य तथा मनुष्य की चेतना को औदात्य प्रदान करने वाली संस्कृति का पोषण आज की जरूरत है. 



4.

आभासी दुनिया और कॉर्पोरेट सेक्टर

मीडिया चमक-दमक से भरी जिस तरह आभासी दुनिया की रचना कर रहा है वह वास्तव में कॉर्पोरेट जगत के हथियार के रूप में काम कर रहा है. कॉर्पोरेट कल्चर में संयम, सब्र, संतोष जैसी प्रवृत्तियों को पिछड़ापन माना जाता है. इसका बीज शब्द इच्छा, डिज़ायर या विल है. 

कॉर्पोरेट संस्कृति तृष्णाओं को बढ़ाने में विश्वास रखती है. भूख को बढ़ाने में विश्वास रखती है. (प्यास बढ़ाओ – Limca - करीना कपूर का विज्ञापन – Limca) 

यहाँ सब कुछ तड़क-भड़क से भरा हुआ, महँगा और ललचाने वाला है. कॉर्पोरेट जीवनशैली फिल्मों की तरह जीने में यकीन रखती है. विज्ञापन के बल पर तमाम खर्चीली चीजों का अंबार लगा लेना, किसी वस्तु के नए संस्करण के आते ही पुराने को फेंक देना, मोबाइल-टीवी-कार तक तो ठीक है पर यदि यही मानसिकता मित्रता, प्रेम, रिश्ते-नातों और परिवार के सदस्यों पर भी लागू की जाने लगे तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती है इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. 

नृत्य : रतिक्रिया के पेल्विक जेस्चर्स : फूहड़ भौतिकता : डांस इंडिया डांस/ कॉमेडी नइट्स विद कपिल. घूंसे और बल्ले के प्रहार के साथ ‘देश बदल रहा है, वेश कब बदलोगो 

क्षणिक रोमांच या सनसनी में विश्वास करने वाले, इंटरनेट के प्रयोक्ता को व्यापक सामाजिक संबद्धता के यथार्थ से काटकर मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर सिमटी हुई (मुठ्ठी में आई हुई). आभासी दुनिया के विभ्रम में फंसाने वाले इस अद्यतन जनसंचार माध्यम को जाने किसने ‘सोशल मीडिया’ नाम दे दिया? यह ‘सोशल’ शब्द का भ्रामक प्रयोग है. 

आधुनिकता के दौर में धर्म और संस्कृति को रिलीजन और कल्चर जैसे गलत पर्याय दिए गए. उत्तरआधुनिक दौर में न्यू मीडिया को ‘सोशल’ जैसा गलत विशेषण दिया जा रहा है. जबकि इसका चरित्र ही ‘एंटी सोशल’ है. व्यापक समाज से काटकर जो हमें माध्यम की हदों में बाँध दे वह सोशल कैसे हो सकता है? 

इसका समाजीकरण पाखंड भर है. मोबाइल और इंटरनेट के जरिए जंतरमंतर पर बाबा रामदेव या अन्ना हजारे भीड़ तो इकट्ठी कर सकते हैं लेकिन महात्मा गांधी जैसे जान पर खेल जाने वाले स्वयंसेवक तैयार नहीं कर सकते. 

दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए
लहू लुहान नज़ारोँ का ज़िक्र आया तो
शरीफ़ लोग उठे दूर जाके बैठ गए (दुष्यंत) 

5.

अंत में 

मैं तीन बातें अत्यंत संक्षेप में कहना चाहूँगा - 

(i)
बाजार और कॉर्पोरेट के हाथ में खेलता हुआ मीडिया हमारी सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा है. अभद्र और अश्लील के प्रति समाज आश्चर्यजनक रूप से सहिष्णु होता जा रहा है जो बेहद खतरनाक संकेत है. 

(ii)
मीडिया की तात्कालिकता ने मनुष्य की संवेदनाओं को भी क्षणिक बना दिया है. हिंसा, क्रोध, घृणा, आक्रामकता और नग्नता के पल पल परिवर्तित रूपों ने एक खास तरह की पारस्परिक असहिष्णुता पैदा की है. लोकतंत्र के नारे तो हम लगाते हैं लेकिन प्रतिपक्ष की किसी भी आवाज का गला घोंटने के लिए हम किसी भी हद तक जा सकते हैं. यह असहिष्णुता बाजार संस्कृति की देन है. और इसकी परिणति तानाशाही और आतंकवादी प्रवृत्तियों में दिखाई दे रही है. सब व्यवस्थाएँ आज ऊपर ऊपर से लोकतांत्रिक लगती हैं लेकिन भीतर से सबका चरित्र अधिनायकवादी है. 

(iii)
संस्कृति का हाशियाकरण.