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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

(संपादकीय) निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार !

बाबा तुलसी के लिए दशरथ सुत राम और भगवान राम दो नहीं हैं. हो ही नहीं सकते. वे विष्णु का अवतार भर भी नहीं हैं. ब्रह्मा-विष्णु-महेश तो पहले ही साकार और सगुण हैं. हमारे राम ये सब होते हुए रूपातीत और गुणातीत हैं. कुछ भी उनसे परे नहीं है. वे परात्पर ब्रह्म हैं; जगनिवास अखिल लोक विश्राम हैं. जगत की आपाधापी से थका लोक जब राम की ओर उन्मुख होता है, तभी वह विश्राम पाता है – जन्मों के पाप ताप कट जाते हैं. इसीलिए लोक चाहता है कि उसके जीवन में राम का उदय हो; अवतरण हो. यह चाह जब उत्कट हो जाती है – कौसल्या की तरह, तो परात्पर प्रभु राम प्रकट हो जाते हैं.  
राम का प्राकट्य समग्र लोक के लिए है. इस लोक में राक्षस भी शामिल हैं. उनके प्रति राम करुणावान हैं; उनका उद्धार करने का वचन निभाने भी तो आए हैं धराधाम पर. वे कृपालु हैं, दीन जन के बंधु हैं. किसी को उनकी मानव लीला से भ्रम न हो जाए इसलिए बाबा याद दिलाते हैं कि वे माया, गुण और ज्ञान से परे हैं. वे मर्यादाएँ स्थापित करने के लिए आए हैं, लेकिन हैं अपरिमेय. मूल्यांकन का कोई भी लौकिक आधार उन्हें माप नहीं सकता. कौसल्या माँ को बोध है कि जिसे उन्होंने गर्भ में धारण किया, उसके रोम रोम में माया निर्मित जाने कितने ब्रह्मांड समाए हैं. राम का आकार माया, त्रिगुण प्रकृति और इंद्रियों से नहीं, उसी सृजनात्मक स्वेच्छा से निर्मित है जिसके कारण ‘वह’ एक ही निरंतर अनेक प्रकार से अभिव्यक्त होता रहता है. कौसल्या माँ को मातृत्व का परम सुख देने के लिए मेरे प्रभु राम अविगत गति छोड़कर शिशु लीला स्वीकार करते हैं. राम का प्राकट्य मातृत्व की परम पुकार की अनिवार्य स्वीकृति का प्रतीक है! 
18 अप्रैल, 2017                                                                                           - ऋषभ देव शर्मा

रविवार, 16 अप्रैल 2017

ऐसे मन लै जोगी खेलै : गुरु गोरखनाथ


परंपरा कनफटे जोगियों की
पुरानी रोमांटिक प्रणय-गाथाओं से लेकर आधुनिक सनसनीखेज मीडिया-कथाओं तक में एक रोचक रूढि की तरह ध्यान खींचने वाले ‘कनफटे जोगी’ असल में नाथ-पंथ के अनुयायी हठयोगी होते हैं. नाथ-पंथ और ‘हठयोग’ का प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ को माना जाता है जो हिंदी के आदिकाल के सर्वाधिक प्रखर कवियों में अग्रणी हैं. गुरु गोरखनाथ के जन्म और मृत्यु की निश्चित तिथियाँ ज्ञात नहीं हैं, लेकिन अलग-अलग इतिहासकारों के हवाले से इतना तो निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि वे नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच किसी समय विद्यमान थे. प्राच्य विद्या ग्रंथ संग्रहालय, चेन्नई में उपलब्ध ग्रंथ ‘चोलनपूर्व पट्टयम’ तथा कोयम्बत्तूर में प्राप्त शिलालेखों से पता चला है कि कोयंबत्तूर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित उडुमलैपेट्टै नामक नगर (जिसका पुराना नाम चंद्रगिरि है) गोरखनाथ का जन्मस्थल है. 

क्या है हठयोग?
गुरु गोरखनाथ ने ‘सहज योग’ के विकारों को पहचान कर अपने ‘हठयोग’ की स्थापना की. इस मार्ग को ‘हठयोग’ के अलावा नाथ-संप्रदाय, नाथ-पंथ, सिद्ध-मत, सिद्ध-धर्म, योग-मार्ग, योग-संप्रदाय, अवधूत-मत और अवधूत-संप्रदाय जैसे नामों से भी जाना जाता है. दरअसल सहज योग में पंच मकार (मांस, मत्स्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन) की स्वीकृति के कारण विकृति आ गई थी. गुरु गोरखनाथ ने इस लोक-विरुद्ध स्थिति को पहचाना और विशेष रूप से नारी-भोग को साधना का अंग बनाने का दृढ़ता से खंडन किया और हठयोग के रूप में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की. यहाँ यह भी जान लें कि गोरखनाथ का योगमार्ग महर्षि पतंजलि के योगमार्ग से भिन्न है क्योंकि पतंजलि के ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में नाड़ीशोधन, योगमुद्रा, कुंडलिनी शक्ति का जागरण और शिवशक्ति की समरसता आदि का उल्लेख नहीं मिलता, जिनका हठयोग में सबसे अधिक महत्त्व है. 

गोरखनाथ और उनका पंथ
नाथ संप्रदाय के हिंदी कवियों के रूप में यों तो गोरखनाथ, चौरंगीनाथ, गोपीचंद, चुणकरनाथ, भरथरी और जालंध्रीपाव का उल्लेख किया जाता है लेकिन वस्तु और अभिव्यक्ति की मौलिकता की दृष्टि से इनमें गोरखनाथ ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. गुरु गोरखनाथ या गोरक्षनाथ को मध्यकालीन भारतीय पुनर्जागरण के संदर्भ में उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है. उनके द्वारा चलाए गए पंथ को ‘गोरखपंथ’ कहा जाता है. हमारी मान्यता तो यह है कि विकृति पर सीधे-सीधे अक्खड़ शब्दों में चोट करने की बहुचर्चित प्रवृत्ति कबीरदास ने गुरु गोरखनाथ से ही विरासत में पाई है. उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानवेट्टीयान’ नामक तमिल ग्रंथ में भी गोरखनाथ को मध्यकालीन भारत का अद्वितीय रहस्यवादी सिद्ध, धर्मगुरु और राष्ट्रनायक बताया गया है. ‘गोरखनाथ’ या ‘गोरक्षनाथ’ उनका दीक्षानाम है. उनका दीक्षापूर्व नाम ‘पशुपति’ माना जाता है.

गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 40 बताई जाती है जिनमें से ‘गोरखबानी’ के संपादक डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने 14 को ही प्रामाणिक माना है. ये हैं – (1) सबदी, (2) पद, (3) प्राणसंकली, (4) सिस्यादरसन, (5) नरवैबोध, (6) अभैमात्रा जोग, (7) आतम-बोध, (8) पंद्रह तिथि, (9) सप्तवार, (10) मछींद्र गोरख बोध, (11) रोमावली, (12) ज्ञानतिलक, (13) ज्ञान चौंतीसा, (14) पंचमात्रा. 

गोरखनाथ ने अपने समय में प्रचलित कई सारे संप्रदायों का विलय करके नाथपंथ या गोरखपंथ चलाया, इसलिए उनकी बानियों में उन संप्रदायों के विचारों की छाया भी दिखाई देती है. उनके समय में शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन और वैष्णव योगमार्ग प्रचलित थे. इन सबको अपने युग के संदर्भ में नई दिशा देते हुए और वर्णव्यवस्था तथा जातिभेद का खंडन करते हुए गोरखनाथ ने अपनी बानियों में गुरु महिमा, इंद्रिय संयम, प्राण साधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुंडलिनी जागरण और शून्य समाधि की विशद चर्चा की. इन सबमें उन्होंने नीति और साधना पर बल दिया तथा हठयोग की प्रतिष्ठा की : “नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा./ ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा.” अभिप्राय यह है कि वैष्णव महाप्रसाद और सहजयानी पंचमकार दोनों ही जिसे विचलित न कर सकें, ऐसे मन वाला योगी ही अपने भीतर बसे आनंद के भंडार में विहार करता है.

कहने की ज़रूरत नहीं की गोरखपंथी हठयोग में सांसारिक आकर्षण को हठपूर्वक रोकने के लिए शक्तिरूपा कुंडलिनी को जगाकर शिव के निवास सहस्रार चक्र में ले जाने की साधना की जाती है. कुंडलिनी साधना के नाम पर स्त्री-पुरुष-समागम के बहाने व्यभिचार को बढ़ावा देने वालों की गुरु गोरखनाथ ने कठोर शब्दों में निंदा की तथा ‘हठ’ साधना को ह अर्थात सूर्य और ठ अर्थात चंद्रमा की नाड़ियों के संयोग की साधना के रूप में प्रचारित किया. इस साधना का आधार ब्रह्मचर्य है जो भोग द्वारा समाधि के वाममार्ग का विरोधी है. 

योगमार्ग की प्राचीनता 
वास्तव में, एक साधना पद्धति के रूप में योग मार्ग बहुत पुराना है और एक प्रकार से गुरु गोरखनाथ ने उसका जीर्णोद्धार किया. योग की प्राचीनता के सबसे पुराने प्रमाण सिंधुघाटी सभ्यता के काल में प्राप्त होते हैं. यह सभ्यता आर्य और द्रविड कही जाने वाली दोनों ही सभ्यताओं की विशिष्टताओं से युक्त है. यदि द्रविड-आर्य-संघर्ष की पश्चिमी इतिहासकारों की कपोल कल्पना के स्थान पर आर्य-द्रविड-समन्वय की खोज करनी हो तो यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है कि वर्तमान सामासिक हिंदू धर्म के बहुत से तत्व सिंधु घाटी सभ्यता की देन हैं. सिंधु सभ्यता की मूर्तियों का विवेचन करते हुए डॉ. नंजुंडन ने यह प्रतिपादित किया है कि उस समय योग की प्रतिष्ठा थी तथा योगमुद्रा धारण किए हुए योगियों की मूर्तियों का प्रचलन था. ऐसी योग मुद्राओं में मूर्तियों की प्राप्ति सिद्ध करती है कि उस अतीत काल में शिव-पशुपति योगियों के आराध्य माने जाते थे और उनके उपासक योगी जन समाज में थे. इस दृष्टि से योग-विज्ञान को सिंधु सभ्यता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन कहा जाना चाहिए. 

योग विज्ञान की यह धारा वेदों में भी उपलब्ध है. ऋग्वेद में वर्णित केशिन मुनि में योगी के लक्षण हैं. कुछ मंत्रद्रष्टा ऋषि अवश्य ही योग के रहस्यों से परिचित रहे होंगे. अथर्ववेद में तो पूर्ण विकसित योग प्रणाली का स्वरूप प्राप्त होता है जिसमें प्राण और अपान वायु को वश में करने के लिए प्राणायाम की महत्ता स्वीकार की गई है. विश्व के धारक और रक्षक के रूप में प्राण को आरण्यकों में सर्वत्र व्याप्त तथा आयु का कारण माना गया है. उपनिषदों में भी योगमार्ग का निरूपण मिलता है. कठोपनिषद और तैत्तिरियोपनिषद में सर्वप्रथम ‘योग’ शब्द का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग हुआ है और यह अर्थ है चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में लीन कर देना. श्वेताश्वतरोपनिषद की प्रतिष्ठा शैव योग के प्रतिपादक प्राचीनतम उपनिषद के रूप में है. इस उपनिषद में ध्यानयोग की विधि और उसके महत्व का उद्घाटन किया गया है तथा आसन, प्राणायाम आदि योग के अन्य अंगों की भी महत्ता स्पष्ट की गई है. मैत्रेय उपनिषद में खेचरी मुद्रा का भी परिचय उपलब्ध है, जबकि इसी के समकालीन अर्थात ईसा के दो शताब्दी इधर या उधर रचित चूलिकोपनिषद में सेश्वरयोग का विवेचन है. 

आठवीं शताब्दी के पूर्व रचित ‘योगोपनिषद’ में प्रतिपादित विषय का गोरखनाथ रचित ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ से आश्चर्यजनक साम्य है. ‘ध्यान बिंदु’ और ‘नाद बिंदु’ उपनिषदों तथा ‘मंडल ब्राह्मण’ के अनेक श्लोकों का भी गोरखनाथ की रचनाओं पर काफी असर दिखाई देता है. गोरखनाथ की योग प्रणाली इस परंपरा का ही समय के अनुकूल परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप मात्र है. 

गोरखपंथ की मौलिकता 
यहाँ यह बताना जरूरी है कि योग की परंपरा का विस्तार होने के बावजूद गोरख-दर्शन अनुकरण या नक़ल नहीं है. बल्कि गोरखनाथ जिस निर्णय पर पहुँचे वह पूर्णतः उनकी स्वानुभूति पर आधारित है; अतः सर्वथा मौलिक है. गोरख-दर्शन में परमसत्ता को अनेक अवस्थाओं से युक्त अंड-पिंड के रूप में सर्वत्र विद्यमान माना गया है तथा अद्वयवाद को इस योग मार्ग का मूल तत्व सिद्ध किया गया है. इस मत में परम तत्व को ‘परासंवित’ कहा गया है. जो कि सत्, चित और आनंद स्वरूप है. उसके निष्क्रिय, निश्चल व निर्गुण रूप को शिव कहा जाता है तथा सक्रिय, चल व सगुण रूप को शक्ति. ये दोनों अभिन्न हैं. सृष्टि की इच्छा ही शिव की शक्ति है. अतः सृष्टि के निमित्त एवं उपादान कारण शिव हैं. नाथ मत में ब्रह्मांड की तमाम विविधता को मानव शरीर में सूक्ष्म रूप से विद्यमान माना जाता है. इन दोनों की एकता को समरसीकरण कहा गया है. यह समरसीकरण ही जीव का चरम लक्ष्य है. 

चंद्र, सूर्य और अग्नि को गोरखमत में शरीर के अंदर रहने वाली सूक्ष्म शक्ति माना गया है. ‘सिद्धसिद्धांत’ पद्धति’ में नाड़ी संस्थान के ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है तथा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, तालु, भ्रू, निर्वाण और आकाश नाम के नौ चक्रों के साथ सोलह आधारों, तीन लक्ष्यों और पाँच आकाशों के ज्ञान को सत्य के साक्षात्कार के लिए आवश्यक बताया गया है. इससे दुखों की निवृत्ति तो होती ही है, आनंद की उपलब्धि भी होती है. 

गोरखबानी 

गोरखनाथ की कुछ बानियों को देखने से उनके विचारों को ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. आइए, देखें गोरखबानी के कुछ अंश :

बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा.
गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा.
 
[परम तत्व तक किसी की पहुँच नहीं है. वह इन्द्रियों का विषय नहीं है. वह ऐसा है कि न हम यह कह सकते है वह कुछ है और न यह कि वह कुछ नहीं है. वह भाव और अभाव, सत और असत दोनों से परे है. शून्य यानी आकाश में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है. वहीं आत्मा को खोजना चाहिए. जैसे बालक पाप और पुण्य से अछूता है उसी प्रकार परमात्मा भी है. ज़रा मरण से दूर काल से परे सतत बाल स्वरूप ही योगियों का साध्य है.]  
वेद न कतेब न षानी बाणी, सब ढंकी तलि आणि.
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या, तहं बुझै अलष बिनाणी. 
[परब्रह्म की सही व्याख्या न वेद कर पाए हैं न किताबी धर्मों की पुस्तकें. ये सब तो उसे ढकने में लगे हैं, इन्होंने सत्य को प्रकट करने के बजाय उसके ऊपर आवरण डाल दिया है. यदि ब्रहम के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान चाहिए तो ऐसा समाधि में प्रकाशित शब्द के अनुभव द्वारा ही संभव है.]  
हसिबा षेलिवा रहिबा रंग. कांम क्रोध न करिबा संग.
हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत. दिढ़ करि राषि आपंन चीत.
 
[हँसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए लेकिन कभी काम-क्रोध का साथ न करना चाहिए. हँसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किंतु अपने चित को दृढ़ करके रखना चाहिए.]  
हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान. अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन.
हसै षेलै न करै मन भंग. ते निहचल सदा नाथ के संग.
 
[हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए. रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए. इस प्रकार संयम पूर्वक हँसते-खेलते हुए जो अपने मन का भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं.]  
मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा.
तिस मरणीं मरौ, जिस मरणीं गोरष मरि दीठा. 
[हे जोगी मरो, मरना मीठा होता है. किंतु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किए. यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं इसे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए, योग मार्ग में तो विश्वास चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं, यहाँ मरने का अर्थ है जीवन्मुक्ति.]  
मनवां जोगी काया मढ़ी पंच तत्त ले कथा गढ़ी.
षिमा षडासन ग्यान अधारी सुमति पावड़ी डंड बिचारी. 
[शरीर रूपी मढ़ी में मन रूपी जोगी रहता है. वह क्षमा का खडासन, ज्ञान की अधारी, सद्बुद्धि की खडाऊं, और विचार का डंडा उपयोग में लाता है. शरीर का नहीं मन का योग वास्तविक योग है. बाह्य युक्तियों को छोड़कर सही रूप से मन पर नियंत्रण लाना चाहिए.]  
यहू मन सकती यहू मन सिव, यहू मन पांच तत्त का जीव.
यहू मन ले जै उनमन रहै, तै तिनी लोकी की बातां कहै
[मन शिव है. यही मन शक्ति है. यही मन पंच तत्वों से निर्मित जीव है. माया के संयोग से ही ब्रह्म मन के रूप में अभिव्यक्त होता है और मन से ही शरीर की सृष्टि होती है. इस मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञ हो जाता है.]

गोरखनाथ की इन बानियों के आलोक में यदि उनके बाद के कबीर जैसे संतों की बानियों को देखें तो स्पष्ट होता है कि गोरखनाथ ने भक्तिकाल के संतों की कविता के भाव पक्ष को तो प्रभावित किया ही, उनकी भाषा और भंगिमा पर भी दूरगामी असर छोड़ा. 

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मिल जाएँ दो पानियों जैसे : तेलुगु काव्य 'शुकोपनिषद' की भूमिका

मिल जाएँ दो पानियों जैसे


वैयक्तिकता और निजी अस्मिता के चरम विस्फोट के इस दौर में जो सामाजिक संस्था सर्वाधिक विचलित हुई दिखाई देती है, वह है विवाह व्यवस्था. भारतीय समाज की नींव माने जाने वाले परिवार के हिलने से इस समाज-सभ्यता की पूरी संरचना काँपने लग गई है. विदेशी आर्थिक चकाचौंध इस खतरे को और बढ़ा देती है. ऐसे में साहित्य की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह लोक को मंगलकारी श्रेयस्कर मार्ग पर चने के लिए प्रेरित और प्रवृत्त करे. इस उदात्त विषय को अभिव्यक्त करने के लिए ऐसे साहित्यकार की आवश्यकता है जो भारतीय परिवार-संस्कृति के उच्च आदर्शों और जीवनमूल्यों से अनुप्रेरित और अनुप्राणित हो. समकालीन तेलुगु साहित्य के अग्रणी हस्ताक्षर डॉ. मसन चेन्नप्पा ऐसे ही उदारमना कवि हैं.  

प्रस्तुत काव्यशुकोपनिषद’ में डॉ. मसन चेन्नप्पा ने आस्ट्रेलिया की अपनी साहित्यिक यात्रा के बहाने, भारतीय साहित्य की शुक-संवाद की काव्यरूढि का सहारा लेकर भारतीय विवाह पद्धति की व्याख्या करके, वहाँ जाकर एक दूसरे से अलग रह रहे पति-पत्नी के मन में परिवार के प्रति निष्ठा की पुनर्स्थापना की संक्षिप्त सी गाथा लिखी है. मूलतः इतिवृत्तात्मक और उपदेशात्मक कथन में रोचकता की सिद्धि के लिए कवि ने यह मनोरंजक फैंटेसी गढ़ी है कि आस्ट्रेलिया में कवि को ऐसा तेलुगुभाषी शुक-शुकी युगल मिल जाता है जो अपने पालक दंपति के एक दूसरे से अलग हो जाने के कारण आश्यहीन हो गया है. संयोगवश वह दंपति कवि से मिलने और उसका व्याख्यान सुनने वालों में शामिल है. बस यह बोध होते ही कवि भारतीय परिवार व्यवस्था और विवाह पद्धति के प्रतीकों की व्याख्या करके उन पति-पत्नी के अहं को पिघलाने में सफलता प्राप्त कर लेता है. वे दोनों पुनः मिल जाते हैं और लोक कथाओं के दंपतियों की सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं.

इस प्रकार, इस सुखांत कथा-काव्य में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विवाह अथवा स्त्री-पुरुष संबंध कोई बंधन, समझौता या अनुबंध नहीं है, बल्कि एक ऐसा संस्कार है जिसके माध्यम से स्त्री और पुरुष आदिम दैहिक आवेगों का उदात्तीकरण  करके मानसिक, आत्मिक, सामाजिक और नैतिक धरातलों पर परस्पर समर्पण द्वारा समरसता की प्राप्ति हेतु इस प्रकार एक दूसरे से मिलते हैं जिस प्रकार भिन्न दिशाओं से आने वाली जलधाराएँ एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं. पारस्परिक सम्मान और परिवार के प्रति साझा दायित्व उन्हें सदा जोड़कर रखता है. अहं और वर्चस्व इस व्यवस्था के ऐसे शत्रु हैं जो किसी भी हँसते-खेलते परिवार को तिनका-तिनका बिखरा सकते हैं. अतः पति-पत्नी को सत्ता के संघर्ष जैसी स्थिति से बचकर बराबरी, साझेदारी और जिम्मेदारी के बलपर विवाह और परिवार की रक्षा करनी होती है. कहना न होगा कि इस औदात्य की कमी होते जाने के कारण ही आज परिवार विखंडित और विघटित हो रहे हैं. यह कृति  पाठकों को परिवार से जुड़े उदार मूल्यों को अपनाने और अपने मानस को संस्कारित करने की सत्प्रेरणा दे सकेगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए.

तेलुगु के इस संक्षिप्त कथा-काव्य को हिंदी जगत के सम्मुख प्रस्तुत करने का स्तुत्य कार्य वरिष्ठ हिंदी-तेलुगु-हिंदी काव्यानुवादक डॉ. एम. रंगय्या ने अत्यंत निष्ठापूर्वक किया है. यह कृति मूल कवि और अनुवादक दोनों के लिए यशस्कारी हो, इसी शुभेच्छा के साथ ...
-         ऋषभदेव शर्मा
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गुरुवार, 23 मार्च 2017

(भूमिका) चुप रहूँ ... या बोल दूँ : प्रवीण प्रणव


चुप रहूँ ... या बोल दूँ / प्रवीण प्रणव/ गीता प्रकाशन, हैदराबाद/ 2017/ 149 रुपए/ पेपरबैक : 136  पृष्ठ 

भूमिका 

आपने कहा है तो मान जाता हूँ 
चलिए हामी में सर हिलाता हूँ 

दरिया मिलता है यूँ तो समंदर से 
मैं अश्कों को पानी में मिलाता हूँ ...

ज़रा मुश्किल तो है पर बच्चों को 
सूखी रोटी ख़्वाबों संग खिलाता हूँ 

बहुत खुश हैं सब कारखाने गिन के 
खेत ये सरसों के थे, मैं गिनाता हूँ

प्रवीण प्रणव अपनी इस नई काव्यकृति ‘चुप रहूँ.. या बोल दूँ’ के माध्यम से हमारे समय की बहुत सी चिंताओं के साथ-साथ व्यक्ति-मन की गहराइयों की खोज-खबर लेकर आ रहे हैं. इस कृति में मुख्य रूप से उन्होंने अपनी ग़ज़लों को शामिल किया है. साथ ही कुछ गीत और नज़्में भी हैं. हालाँकि वे इन विधाओं के परंपरागत अनुशासन का पूरी तरह पालन करने का कोई दावा नहीं करते, फिर भी इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि विभिन्न कव्यविधाओं के शिल्प पर उनकी अच्छी पकड़ है, और अगर कहीं वे कुछ तोड़-फोड़ करते दिखाई देते हैं तो उसका कारण अनुशासनहीनता नहीं बल्कि कथ्य को शिल्प से अधिक महत्त्व देने की ज़िद है. 

प्रवीण प्रणव के कथ्य का बड़ा हिस्सा उस द्वंद्व ने घेर रखा है जो बड़ी सीमा तक आज के भारतीय युवा मानस का द्वंद्व है – चुप रहूँ या बोल दूँ! हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब बहुत बार ऐसी इच्छा होती है कि सब कुछ बोल दिया जाए, चीख कर बोल दिया जाए, खुलेआम बोल दिया जाए; लेकिन उसी क्षण यह भी बोध होता है कि बोलने का कोई अर्थ नहीं रह गया है क्योंकि उसका कोई प्रभाव होने वाला नहीं. यह द्वंद्व वैयक्तिक संदर्भ में भी उतना ही सच है जितना सामाजिक संदर्भों में. प्रवीण प्रणव का यह द्वंद्व शायद हर रचनाकार का द्वंद्व हुआ करता है. कभी किसी महाकवि को यह शिकायत होती है कि मैं बाँहें फैला-फैला कर लोगों को आगाह किए जा रहा हूँ और लोग हैं कि सुनते ही नहीं. किसी अन्य कवि को यह विश्वास व्यक्त करना पड़ता है कि अनंत काल और असीम पृथ्वी पर कभी तो कहीं तो कोई मेरा समानधर्मा होगा और मेरी बात समझेगा. किसी और कवि को लगता है कि कविता का प्रभाव होने में पूरा जीवन निकल सकता है तो किसी अन्य को यह संतोष रहता है मैंने तो अपना संदेश दे दिया चाहे वह जहाँ तक पहुँचे. अभिप्राय यह है कि प्रवीण प्रणव अपने रचनाकर्म की सार्थकता और कृतार्थता तलाश रहे हैं. यह तलाश ही किसी रचनाकार को सक्रिय रचनाधर्मी बनाती है और वह निजता के कोनों-अंतरों में झाँककर; और जगत की विसंगतियों को उभारकर भी; ‘आज’ से बेहतर एक ‘कल’ की रचना करना चाहता है. कहना न होगा कि प्रवीण आज के अंधेरों से जूझकर कल के लिए किरणें खोज लाने की कोशिश करने वाले कवि हैं. 

जूझ और खोज की मनोवृति के कारण कवि प्रवीण प्रणव में एक ख़ास तरह की प्रश्नाकुलता दीखती है. वे जब यह पूछते हैं कि मैं खामोशी ओढ़े रहूँ या सारे रहस्यों पर से परदे उठा दूँ, तो लोकतंत्र का नाटक कर रही तानाशाही व्यवस्थाओं के बीच अभिव्यक्ति के संकट को बहुत सहज ढंग से व्यक्त कर देते हैं. यह न समझा जाए कि कवि किसी असमंजस में है या उसे कर्तव्य-अकर्तव्य की पहचान नहीं. दरअसल उसके प्रश्न लाक्षणिक रूप में उत्तर भी हैं. कवि जब प्रश्न करता है कि बच्चों को राजा-रानी की कपोलकल्पनाएँ दूँ अथवा यह बताऊँ कि भविष्य किस कदर धुंधला है, तो हमें समझ जाना चाहिए कि वह कल्पना के ऊपर यथार्थ को तरजीह देने वाला कवि है. जनता सीधे जवाब माँगती है और राजनीति गोलमोल जवाबों को प्राथमिकता देती है, इस द्वंद्व से हमें कवि का व्यंग्य समझ लेना चाहिए कि वह जनता का पक्षकार है, सत्ता का चाटुकार नहीं. दहशत और मासूमियत के बीच वह शिशुसुलभ सरलता को संभव बनाने वाला रचनाकार बनना चाहता है – नन्हें बच्चे हैं सिहरे हुए, बेचैनी हवाओं में है घुली हुई / काश कहीं से मासूमियत लाके, फिजाओं में मैं घोल दूँ. यह कवि की इच्छा भी है, संकल्प भी और कृतार्थता भी. इस कविता संग्रह की प्रथम रचना में अभिव्यक्त यह शिव-संकल्प वस्तुतः संपूर्ण कृति में परिव्याप्त है – पाठक इसे स्वयं महसूस करेंगे. 

कवि प्रवीण प्रणव राजनैतिक दुरभिसंधियों में घिरे जन-गण-मन की पीड़ा को अनेक प्रश्नों, उद्बोधनों, प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से रूपायित करते हैं. यद्यपि वे स्वयं सौंदर्य के चितेरे हैं, फिर भी उन्हें विश्वास है कि केवल सौंदर्य को देखना सचाई को आधा देखना है, पूरी सचाई को देखे बिना उस विद्रूपता का अंकन नहीं किया जा सकता जो किसी भी कलाकार के समक्ष चुनौती खड़ी किया करती है. यही कारण है कि कवि प्रवीण प्रणव बार-बार अँधेरे और मौत के इलाके में भी अपने पाठक को ले जाते है. इस इलाके में भूख, बेकारी और विनाश का ऐसा तांडव है कि साल भर की मेहनत के बावजूद कपास उगाने वाला किसान फाँसी की रस्सी तक के लिए तरस जाता है – अब मुट्ठी भर फसल हाथ में लिए सोचता है/ तन ढकने को कपड़ा तो बन न सकेगा इससे/ इतने में तो फाँसी की रस्सी भी न बनेगी/ एक और साल जीना पड़ेगा अब ठीक से मरने के लिए. 

‘ग़मे दौराँ’ तक ही महदूद नहीं है प्रवीण प्रणव की कविता की दुनिया. ‘ग़मे जानाँ’ को भी उन्होंने शिद्दत्त से, और बखूबी, बयान किया है. मीलों चले थे साथ हम, अब तन्हाइयों का सफ़र है ये/ दर्द से रिश्ता तेरा-मेरा एक सरीखा लगता है/ वो मुझसे दूर रहता तो शायद बावफ़ा रहता/ शब भर तेरी आँखों में सहर दिखता रहा मुझको/ गाँव के घर ने मुझे बड़ी हसरतों से पाला था/ हमसफ़र है कि नहीं खुलके बता तो दे/ कभी सोचा न था कि इश्क में ये दिन भी आएगा/ खामोश रह जाने की सज़ा ही पाई है तूने चकोर/ चाँद ने किया है वादा लौट के फिर आने का/ हँसता हूँ कि आइना टूटा हुआ न लगे/ कुछ तो राबता रख मुझसे, मोहब्बत न सही कुछ और सही / मैं पढ़ लूँ आखिरी कलाम फिर तुम चले जाना – जैसी अभिव्यक्तियाँ कवि की गहन निजी अनुभूतियों का पता देती हैं. 

‘चुप रहूँ.. या बोल दूँ’ के प्रकाशन पर मैं कवि प्रवीण प्रणव को हार्दिक बधाई देता हूँ और शुभकामना करता हूँ कि यह कृति उन्हें शुभ्र यश का भागी बनाए!


28.2.2017.                                                                                                          - ऋषभदेव शर्मा

मंगलवार, 21 मार्च 2017

प्रयास 2016 : हिंदी भाषा एवं शिक्षण : बीज भाषण






न्यू होराइजन कॉलेज, बेंगलूरु (कर्नाटक) में 29 जनवरी, 2016 को ''हिंदी भाषा एवं शिक्षण'' विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी हुई थी. 

मुझे उसमें बीज भाषण करने का अवसर मिला था. 

हिंदी विभाग की अध्यक्ष और संगोष्ठी संयोजक डॉ. नीलिमा दुबे के संपादकत्व में उस संगोष्ठी के सभी भाषण और शोधपत्र ''प्रयास 2016'' (आईएसबीएन - 9788191074840) के रूप में प्रकाशित हुए हैं. 

उन्होंने एक घंटे के मेरे बीज भाषण का सार-संक्षेप भी इसमें सम्मिलित किया है जो यहाँ साभार सहेजा जा रहा है.